मंगलवार, 1 सितंबर 2009

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भारत के विखंडन की चीनी सोच

चीन के एक लेखक की इस चाहत पर हर भारतीय का क्रोधित होना स्वाभाविक है कि चीन को भारत के 20-30 टुकरे कर देना चाहिए। चायना इंटरनेशनल इंस्टीच्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज के वेब साइट पर झान लू नामक इस लेखक ने लिखा है कि चीन अपने मित्र देशों पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल एवं भूटान की मदद से ऐसा कर सकता है। उनका कहना है कि अगर चीन हल्की कार्रवाई भी करता है तो तथाकथित भारतीय महासंघ को तोड़ा जा सकता है। उनके अनुसार तथाकथित भारतीय राष्ट्र का इतिहास में अिस्तत्व नही मिल सकता क्योंकि यह मुख्य रुप से अपनी एकता के लिए हिन्दू धर्म पर अवलंबित है। उनके ‘ाब्दों में भारत को एक हिन्दू धार्मिक राज्य कहा जा सकता है जो कि जातीय ‘ाोशण पर आधारित है और जो आधुनिकीकरण के रास्ते में आ रहा है। झान लू का मानना है कि जातीय पहचान को ध्यान में रखकर चीन को अपने हित मे और पूरे एशिया की प्रगति के उद्देश्य से विभिन्न राष्ट्रीयताओं असम , तमिल एवं कश्मीर स्थापित करने में समर्थन देना चाहिए। वे उल्फा को समर्थन का भी सुझाव देते हैं ताकि असम भारत से आजादी पा सके। इसी प्रकार चीन बंगलादेश का समर्थन करे ताकि वह भारतीय नियंत्रण से मुक्त होने के लिए बंगालियों को प्रोत्साहित करे एवं एक बंागली राष्ट्र का उदय हो। अगर ऐसा नहीं होता तो भारत के विस्तारवाद के उद्देश्य को रोकने एवं एक संयुक्त दक्षिण एशिया के गठन के रास्ते के खतरे को कमजोर करने के लिए बंगलादेश के एक पड़ोसी के रुप में स्वतंत्र बंगाली राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। झान कहते हैं कि चीन बंगलादेश को प. बंगाल की आजादी को समर्थन देने के लिए प्रोत्साहित करे और अरुणाचल प्रदेश में 90 हजार वर्ग किलोमीटर यानी दक्षिण तिब्बत को मुक्त कराए।जरा सोचिए इस प्रकार की विध्वंसकारी सोच पर किसी देश की सामान्य प्रतिक्रिया क्या हो सकती है! हम यहां इस बहस में नहीं पड़ना चाहते कि यह चीनी सरकार को सलाह देने वाली थिंक टैंक का अधिकृत वेबसाइट है या नहीं। यह इस बात का प्रमाण तो है ही कि वहां के बुद्धिजीवी अभी भी भारत के संदर्भ में कितना जहर पाले हुए हैं। हालांकि वे यह भूल जाते हैं कि आजादी के बाद भारत के टूट जाने संबंधी उतने सिद्धांत सामने नहीं आए हैं जितने चीन के। चीन के बिखरने के सिद्धांत और विचार लगातार सामने आते रहते हैं। 1990 के दशक में तो इसकी भरमार हो गई। चीन के बिखरने की भविश्यवाणी करने वालों मेें चीनी सरकार से असंतुष्ट मि से लेकर अन्य श्रेणी के लोग भी ‘ामिल हैं। ये चीन में क्षेत्रवाद के उदय एवं चीनी इतिहास में विखंडन के तत्वों की पहचान करके यह बताने की कोशिश करते रहे हैं कि चीन का विखंडन नििश्चत है। भले ये 20-30 टुकड़ों की बातें नहीं करें, किंतु इसके कई भागों में विभाजित होने का सिद्धांत तो दिया ही गया है। जापान में केनिची ओहमेइ (ामदपबीप वीउंम) ने लिखा है कि चीन के टूटने के बाद 11 गणराज्य पैदा हो सकते हैं जो एक ढीलाढाला संघीय गणराज्य कायम कर लेंगे। 1993 मेें दो विद्वानों ने यूगोस्लाविया से तुलना करते हुए चीन के संभावित टूट के प्रति आगाह किया। उसने केन्द्रीय सरकार के वित्तीय केन्दीकरण की नीति को यूगोस्लाविया के समान मानते हुए कहा कि इससे देश को एक रख पाना संभव नहीं होगा और जिस तरह यूगोस्लाविया खंड-खंड हो रह है वैसे ही चीन भी विभाजित हो जाएगा। सोवियत संघ एवं पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्ट ‘ाासन के ध्वंस के काल में अमेरिका के रक्षा विभाग ने चीन के भविश्य के आकलन के लिए एक 13 सदस्यीय पैनल का गठन किया, जिसमें बहुमत ने चीन के के विखर जाने की बात की। 1995 मेंं प्रो. जैक गोल्डस्टोन ने एक आलोख लिखा,` द कमिंग चायनीज कोलैप्स´। फॉरेन अफेयर्स मेंं प्रकाशित इस आलेख में उन्होंने कहा कि अगले 10 से 15 सालों में चीन के ‘ाासक वर्ग के सामने बड़ा संकट पैदा होगा। उनके अनुसार चीन में प्रत्येक संकेत एक संकट की ओर बढ़ रहे देश का मिल रहा है। आबादी मेें बुर्जुआओं की बढ़ती तादाद, भारी संख्या मेंं लोगों का प्रवर्जन, कर्मचारियों एवं किसानों का असंतोश एवं नेतृत्व के बीच मतभेद का संकट तथा वित्तीय कमजोरियों के कारण नेतृत्व की प्रभावकारी ‘ाासन करने की क्षमता में तेजी से हृास आदि का उन्होंने उल्लेख किया। गोर्डन चांग ने अपनी पुस्तक कमिंग कोलैप्स ऑफ चायना में कहा है कि चीन की आर्थिक संस्थाओं की कमजोरियों का विस्तृत विश्लेशण करते हुए कहा है कि विश्व व्यापार संगठन में उसका प्रवेश उसके ध्वंस का कारण बन जाएगा। ऐसे और भी उदाहरण सामने लाए जा सकते हैं। इसके पक्ष एवं विपक्ष में मत हो सकते हैं, किंतु कम से कम भारत के बारे में तो ऐसी भविश्यवाणियां नहंीं की गईं हैं। हालांकि 1962 में चीन से धोखा खाने तथा अरुणाचल पर उसके लगातार उदण्ड दाावे के बावजूद भारत का कोई नागरिक उसके विखंडित होने की कामना नहीं करता है। किंतु जब 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और उसके प्रभावस्वरुप दूसरे कम्युनिस्ट राज्य विखरने लगे तो सबकी नजर सबसे बड़े कम्युनिस्ट राज्य की चीन की ओर ही गया। यह प्रश्न उठाया जाने लगा था कि क्या इसके बाद चीन का ही नंबर आयेगा वैसे ताइवान पहले ही उसके नियंत्रण से मुक्त हो चुका है और उसके समर्थकों को चीनी नेता विखंडनवादी (िस्प्लटिस्ट) कहते हैं। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को चीनी भूभाग के विरुद्ध शडयंत्रकारी मानते हैं। पिछले वशZ मार्च में जब तिब्बतियों ने चीनी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध किया तो वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने दलाई लामा को एक ऐसा राक्षस बताया जिसका हृदय जंगली जानवर का है। शिंगकियांग के उइगुरों के विद्रोह को विदेशी ‘ाक्तियों का दुश्टतापूर्ण शडयंत्र कहा गया।चीनी नेतृत्व अपनी सबसे बड़ी अंत:शक्ति 82 प्रतिशत हान चीनियों को मानते हैं। यही जातीय कारक उसे पूर्व सोवियत संघ से भिन्न बनाता है जिसमें 50 प्रतिशत से ज्यादा रुसी नस्ल के लोग नहीं थे। 1 अरब 30 करोड़ की आबादी वाले देश मेें तिब्बत की करीब 30 लाख तथा शिंगकियांग की दो करोड़ आबादी बहुत महत्चपूर्ण नहीं लगती है। किंतु दोनोें का क्षेत्रफल चीन के पूरे भूभाग का करीब एक तिहाई है। तेल और गैस का प्रचुर भंडार यहीं है। यह भय चीन के अंदर हमेशा बना हुआ है कि कहीं शिंगकियांग के मुसलमान मध्य एशिया के साथ न मिल जाएं। रुस साइबेरिया को लेकर इसी प्रकार की आशंका से हमेशा ग्रस्त रहता है। हमने जुलाई में दंगों से झुलसते शिंगकियांग को देखा। 1989 के थ्यान मान स्क्वायर घटना के बाद पहली बार वहां भारी संख्या में लोगों की मौतें हुईं। चीनी नेतृत्व उइगुर विद्रोहियों को कृतघ्न मान सकते हैं। आखिर वहां की चमचमाती सड़कें, बाजारें, शिक्षालय, फैक्टिªयां आदि इन्हीं की देन हैं। यह उसी प्रकार की प्रतिक्रिया है जैसा एक समय पूर्वी तिमोर को लेकर इंडोनेशिया की होती थी। चीन दावा करता है कि तिब्बत एवं शिंगकियांग दोनों सदियों से उसके भाग रहे हैं। किंतु हम जानते हैं कि 20 वी सदी में ही शिंगकियांग में एक पूर्वी तुकीZस्तान गणराज्य का अस्तित्व था, जो कि 1949 में चीनी जन मुक्ति सेना (चायनिज पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) के दबाव में समाप्त हो गया। स्वतंत्र तिब्बत का इतिहास तो काफी पुराना है। किंतु 1912 से 1949 के बीच एक आजाद देश के रुप में तिब्बत के अस्तित्व से तो कोई इन्कार नहीं कर सकता। 1959 में तिब्बतियों के विद्रोह को कौन भूल सकता है। इस समय सामान्यत: यह माना जा रहा है कि तिब्बत या शिंगकियांग के विद्रोहियो की सफल्ता संभव नही। दलाई लामा तो आजादी की मांग भी अब नहीं कर रहे हैं, किंतु आजादी के समर्थकों की संख्या चाहे जितनी हो, चीन चाहे जितनी निश्ठुरता से भूभागीय अखंडता के विरुद्ध आवाज उठाने वालोें को कुचलने की स्थिति में हो, यह लौ बुझ नहीं सकती। आखिर बािल्टक गणराज्यों के मुट्ठी भर लोग ही तो सोवियत काल में देश से बाहर अलगावाद की आवाज उठाते थे। उन्हें एक खोए हुए सपने का पुरोधा मान जाता था, किंतु एक दिन वही सपना साकार हुआ। चीनियों को इससे सबक लेना चाहिए। एक नस्ल या जाति का बहुमत किसी देश की एकता का स्थायी आधार नहीं हो सकता। राज्य की निरंकुश सत्ता के प्रति असंतोश समान नस्ल एवं जातीयों में भी होता है और वे अपनी ही जाति और नस्ल की सत्ता के खिलाफ विद्रोह करते हैं। इसके उदहारण पूरी दुनिया में मौजूद हैं। चीन के ‘ाासन के खिलाफ पूरा पिश्चमी जगत है। वे तो चाहते हैं कि भारत चीन के खिलाफ खड़ा हो। अगर भारत उनके साथ खड़ा हो गया और तिब्बतियों से लेकर अन्य विक्षुब्धों को अलगावादी संघशोZं के लिए उसी तरह मदद करने लगा जैसा इस लेख में झाउ ने चीन सरकार को सुझाया है तो चीन के न जाने कितने टुकड़े हो जाएंगे। इसलिए चीनियों को भारत की ओर उंगली उठाने की जगह अपने बारे में विचार करना चाहिए।

रविवार, 12 जुलाई 2009

रेल बजट में ममता का ममत्व

यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि रेल मंत्री ममता बनर्जी ने संप्रग सरकार के अपने पहले रेल बजट में वाकई अपना ममत्व उड़ेलने की कोिशश की है। वैसे यह उनका तीसरा रेल बजट है और पूर्व में भी हमने उनके जनोन्मुखी योजनाओं को देखा है। किंतु हम इसमें ममत्व की वेदी पर व्यावहारिक व्यावसायिक नजरिए एवं प्रगति के कदमों और योजनाओं की बलि चढते नहीं देख सकते। दोनों के बीच एक गहरा और बेहतरीन संतुलन है। एक ओर आवश्यक जनोन्मुखी घोशणाएं और योजनाएं हैं तो दूसरी ओर रेलवे को अंतरराश्ट्रीय मानदंडों पर उतारने के साथ उसे और कार्यकुशल बनाने की नई पहल भी। वास्तव में रेल बजट बनाते समय ममता के सामने एक ओर यात्री सुविधाओं में इजाफा करने के साथ सुरक्षा व्यवस्था की चुनौती थी तो दूसरी ओर माल ढुलाई से अधिकाधिक व्यवसाय पाने एवं रेलवे को यात्री एवं माल दोनों यातायात की दृष्टि से सक्षम एवं आकर्षक बनाने की। उन्होंने इन दोनों कसौटियों पर खरा उतरने की कोिशश की है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की तरह यह लोकप्रिय घोषणा और अधिकाधिक मुनाफे पर केिन्द्रत बजट नहीं है। उन्होंने अपने बजट का लक्ष्य स्पष्ट करते हुए कहा भी कि `लोग बेहतर रेल सुविधाओं की अपेक्षा करते हैं। विकास केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। लोग देश में स्टेशनों के बीच बेहतर जुड़ाव चाहते हैं। मेरी प्राथमिकता यात्रियों को बेहतर सुविधाएं, रक्षा एवं सुरक्षा तथा अच्छी गुणवत्ता वाला खाना-पानी उपलब्ध कराना होगा।´ उन्होंने तथाकथित आर्थिक रुप से अव्यवहार्य किंतु सामाजिक तौर पर अपेक्षित प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन पर सलाह के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाने की राय प्रकट की।आप देखेंगे कि रेल बजट में यात्री सुविधाओं पर ज्यादा जोर दिया गया है। भाड़े में किसी प्रकार की बढ़ोत्तरी न करना इसका पहला सबूत है। जिस तत्काल योजना को पूर्व रेल मंत्री ने कमाई का जरिया बना दिया था, उसमें संशोधन कर केवल दो दिनों पूर्व तक तत्काल टिकट मिलने एवं इसका शुल्क 150 रुपया से घटाकर 100 रुपया करके उन्होेंने वाकई यात्रियों को राहत दिया है। इसे हर दृष्टि से तािर्कक कदम कह सकते हैं। यात्री सुविधाओं पर अलग से 1102 करोड़ रुपया खर्च करने की योजना है। इज्जत योजना के अंदर 25 रुपए में 100कि. मी, का पास, स्टेशनों पर जनता खाना उपलब्ध कराना, गरीबों के लिए गरीब रथ से भी सस्ता रेल उपलब्ध कराने का वायदा, युवाओं और छात्रों के लिए विशेश वातानुकूलित रेल और 299 रुपए पर 1500 कि. मी. एवं 399 रुपए पर 3000 कि. मी. की यात्रा, कोलकाता मेट्रो में 60 प्रतिशत तक की रियायत, मदरसा के छात्रों को भी छात्र रियायत योजना मेें शामिल करना, मेट्रो शहरों में केवल महिलओं के लिए विशेश गाड़ियां,... आदि को हम लोकप्रियतावादी कह सकते हैं, पर भारत में गरीबों की संख्या, कुल जनसंख्या में युवाओं की तादाद व भीड़ वाले समय में महिला यात्रियों की कठिनाइयों को देखते हुए इसे अवांछित नहीं कह सकते। इज्जत योजना के तहत असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों को इससे बचत होगी एवं उन्हें भागमभाग में टिकट के लिए लंबी कतार भी नहीं लगानी होगी। यह बात अलग है कि जिला कलक्टर एवं सांसदों से इसका प्रमाण पत्र लेने की कसरत उन्हें करनी होगी। रेल मंत्री को प्रमाण के ऐसे दूसरे तरीके इजाद करने चाहिए ताकि कलक्टर कार्यालय के चक्कर लगाए बगैर भी उनका काम चल जाए। यात्रियों की दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय रेलवे के इतिहास में पहली बार 12 नन स्टॉप यानी कहीं न रुकने वाली रेलें पहली बार चालाई जाएंगी। अनारक्षित टिकट मिलने की टर्मिनल संख्या बढ़ना, 5000 डाक घरों में अनारक्षित टिकटों की बिक्री, मोबाइल वेैनों पर टिकट और उनका ग्रामीण क्षेत्रों मेे जाना, लंबी दूरी की रेलों में डॉक्टर की उपलब्धता, 200 स्टेशनों पर टिकटों की स्वचालित वेंडिंग मशीनें, राजधानी रेलों में मनोरंजन की सुविधा,... यात्री सुविधाओं में वृद्धि ही तो करेंगे। इसके अलावा आप देखिए, इंटर सिटी स्तर में दो मंजिला वातानुकूलित रेल, तीर्थों से संबंधित 50 स्टेशनों का विशेश विकास, 50 स्टेशनों पर बजट होटल, 200 स्टेशनों पर यात्री निवास,यात्री आरक्षण केन्द्र, 50 स्टेशन को अंतर्राष्ट्रीय सुविधाओं के साथ विश्वस्तरीय स्टेशन में बदलने की योजना आदि जहां यात्री सुविधाओं की श्रेणी में हैं वहीं इससे उनकी आधुनिक सोच का भी पता चलता है। 375 में से 309 स्टेशनों के आधुनिकीकरण की योजना भी इसी श्रेणी में आएगी। इसके लिए धन की व्यवस्था कैसे होगी इसका उत्तर उन्होंने इनोवेटिव फायनांस एवं सार्वजनिक निजी क्षेत्र साझेदारी दिया। यह सुधारवादी दृष्टिकोण है। यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि ये शब्द प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ही हैं। उन्होंने रेल बजट पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में ठीक यही शब्द प्रयोग किया। प्रधानमंत्री ने कम समय में उच्चस्तरीय बजट के लिए ममता बनर्जी की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें कांग्रेस पार्टी के चुनाव घोशणा पत्र में यात्रियों की सुविधाओं के साथ सुरक्षा बढ़ाकर रेल यात्रा को आनंदमय बनाने का जो वायदा था उसे तो पूरा किया ही गया है साथ ही उसे उत्पादक एवं कार्यक्षम बनाने की नई पहल भी है। सुरक्षा के नजरिए से 140 संवेदनशील स्टेशनों की सुरक्षा बेहतर करने एवं इनके बीच समेकित प्रणाली लागू करने के साथ महिला कमांडों की संख्या बढ़ाने एवं जिन स्थानों पर महिलाएं ज्यादा यात्राएं करतीं हैं वहां महिला रेलवे सुरक्षा बल दस्ते की तैनाती आदि महत्वपूर्ण घोषनाओं में शामिल हैं। ठीक समय पर पटरी का नवीनीकरण, सिग्नलों का आधुनिकीकरण, त्रुटियों को पकड़ने के लिए डिजिटल अल्ट्रासोनिक मशीनों का प्रयोग यदि योजनानुसार क्रियािन्वत किए गए तो यकीनन इससे रेलवे के अंदर यात्रियों में सुरक्षित होने का अहसास घनीभूत होगा। पिछले साल के रेल बजट में टक्कर रोधी यंत्र लगाने की योजनाएं घोषित हुईं, पर एक भी यंत्र का आदेश संबंधित कंपनी को निर्गत नहीं हुआ। उम्मीद करनी चाहिए कि ममता बनर्जी के काल में ऐसा नहीं होगा। इसके लिए पिछले बजट मंें आवंटित रािश पड़ी हुई है जिसका पूरा उपयोग किया जाना चाहिए। ममता ने यह संकेत दिया भी है कि वे सुरक्षा एवं संरक्षा के मामले में तनिक भी रियायत नहीं देनेवाली। यद्यपि कुमारी बनर्जी ने साफ शब्दों में कहा कि रेलवे केवल आर्थिक व्यावहार्यता के आधार पर नहीं चल सकता, सामाजिक प्रतिबद्धता इसकी मूल बात है, लेकिन उनकी कार्यशैली से मतभेद रखने वाले सुधारवादी भी यह मानने को विवश हैं कि उन्होंने प्रगतिशील सोच वाला एक व्यावहारिक बजट पेश किया है। इसमें रेलवे को सभी दृष्टियों से सक्षम बनाने की कोिशश साफ दिखाई देती है। माल ढुलाई का लक्ष्य 88 करोड़ 20 लाख मेट्रिक टन बिल्कुल व्यावहारिक है। ममता ने कृषि उत्पादों विशेषकर फल, सब्जी एवं ग्रामीण हस्तकला, सूत एवं कपड़ा उत्पादों को उपयुक्त बाजार बाजार तक ले जाने के लिए विशेष रेल की घोशणा को आप कुछ क्षण के लिए पुरानी समाजवादी किस्म की सोच कह सकते हैं, लेकिन इससे कृिश अर्थव्यवस्था को कितना बल मिलेगा एवं रेल की भी आमदनी धीरे-धीरे कितनी बढ़ेगी इसकी कल्पना करिए। ये कृषि उत्पाद बरबाद न हों, इसके लिए शीतगृह निर्माण की ओर कदम बढ़ाकर ममता ने किसानों के बीच रेलवे को और लोकप्रिय बनाने की कोिशश की है। शीत गृह की व्यवस्था न होने से अरबों रुपए की फल सब्जियां यूं ही प्रतिवर्ष बरबाद हो जातीं हैं। पूर्वी और पिश्चमी माल गलियारों के साथ डिब्बों के नििश्चत समय सीमा में परिचालन के लिए प्रीमियम मालढुलाई सेवा का प्रस्ताव रखा है। गारंटीशुदा समय में पार्सल पहुंचाने की प्रीमियम पार्सल सेवा भी तीन रास्तों पर शुरु होंगी। ममता ने कहीं भी निजी क्षेत्र की सेवा लेने से परहेज नहीं किया है। बस, इतना सचेत रहने का संदेश अवश्य दिया है जिससे रेलवे के जन सेवा का चरित्र न बदल जाए एवं वह केवल एक व्यावसायिक संस्थान में तिब्दल न हो जाए। सैम पित्रोदा की देखरेख में रेलवे लाइनों के साथ फाइबर केबुल डालने के तौर-तरीके इजाद करने के लिए समिति की घोशणा उनकी आधुनिक सोच को ही प्रतिबििम्बत करती है।ल्ंाबे समय से रेलवे के लिए दूरगामी नजरिया अपनाने की मांग की जा रही थी। कुमारी बनर्जी ने पिछले पांच सालों के सांगठनिक, परिचालन और वित्तीय प्रदशZन पर आधारित तथा निकटवर्ती एवं दूरगामी रणनीतिक योजनाअों वाले दृिश्टकोण 2020 नाम से जो “वेत पत्र लाने की घोशणा की है वह काफी महत्वपूर्ण है। इससे हमेें रेलवे की वर्तमान अवस्था के साथ भविश्य की झलक मिलेगी। पूर्व रेल मंत्री ने रेलवे के वित्तीय कायापलट का जो प्रचार किया उसकी भी असलियत हमारे सामने आ जाएगी। इस बजट को तैयार करने के लिए उन्हें कम समय मिला था। यह बात तो कोई भी स्वीकार करेगा कि रेलवे को तात्कालिक नहीं, दूरदर्शी नजरिए से विकसित करने की आवश्यकता है और आगामी “वेत पत्र इसे पूरा करेगा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

गुरुवार, 4 जून 2009

Hafij freed

हाफिज की रिहाई


पाकिस्तान के लाहौर उच्च न्यायालय द्वारा हाफिज सईद एवं उसके साथी कर्नल नजीर अहमद की रिहाई से भारत को आघात लगना स्वाभाविक है। 26 नवंबर के मुंबई हमले की छानबीन में हाफिज मुख्य साजिशकर्ता के रुप में पाया गया है। कर्नल नजीर अहमद की साजिश के साथ आतंकवादियों को प्रिशक्षण देने में भी भूमिका रही है। पहली नजर में इनकी रिहाई मुंबई हमलों के मामले में पाकिस्तान की अगंभीरता का संदेश देता है। हालांकि पाकिस्तान सरकार इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय जा सकती है, किंतु उच्च न्यायालय के कथन से साफ है कि उसे कैद में रखने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं बनाया गया था। सईद किसी जेल में बंद नहीं था, उसे उसके घर में ही 11 दिसंबर 2008 को नजरबंद किया गया था। साफ है कि 2 दिसंबर 2008 को जमात-उद-दावा संगठन पर संयुक्त राश्ट्र द्वारा प्रतिबंध लगने तथा मुंबई हमलों के संदर्भ में भारतीय कूटनीति के दबाव में पाकिस्तान ने सईद को नजरबंद करने की औपचारिकता निभाई, पर उसके लिए जितना पुख्ता कानूनी आधार बनाने की आवश्यकता थी उसकी अनदेखी की। हाफिज लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापकों में शामिल है और 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद जब लश्कर प्रतिबंधित हुआ तो उसने जमता-उद-दावा नाम से उसी संगठन को रुपांतरित कर दिया। इसे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी तक ने स्वीकार किया है। सईद द्वारा अपनी नजरबंदी को चुनौती देनेवाली याचिका का जवाब देते हुए पाकिस्तान के महाधिवक्ता ने न्यायालय में कहा था कि सरकार के पास इस बात के प्रथमदृश्ट्या सबूत हैं कि जमात के अल कायदा के साथ रिश्ते हैं। आखिर पाकिस्तान सरकार ने अपने कथन को प्रमाणित करने के साक्ष्य न्यायालय के समक्ष क्यों प्रस्तुत नहीं किया? सईद ने रिहाई आदेश के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में जम्मू कश्मीर में संघशZ जारी रखने का ऐलान करके अपना इरादा बिल्कुल साफ कर दिया है। निश्चय ही उसकी रिहाई से भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न दूसरे नेताओं व संगठनों का साहस बढ़ेगा। इस प्रकार उसकी रिहाई से भारत की परेशानियां बढ़ गईं हैं। किंतु पाकिस्तान के अतीत को देखते हुए यह स्थिति कतई हैरत में डालनेवाली नहीं है। वैिश्वक आतंकवाद के खिलाफ संघशZ में पाकिस्तान सरकार वक्तव्यों में जैसी दृढ़ता प्रदिशZत करती है, कतृत्व में वैसा नहीं है। खासकर भारत के संदर्भ में उसका रवैया हमेशा दोहरे आचरण का परिचायक रहा है। सईद इसके पहले भी दो बार नजरबंद होकर रिहा हो चुका है। पाकिस्तान सरकार ने मुंबई हमलों के जो सबूत मांगे वे उसे दिए जा चुके हैं। उसको आधार बनाकर वह न्यायालय के सामने साक्ष्य प्रस्तुत कर सकती थी। जाहिर है, पाकिस्तान ने अपने दायित्व का ईमानदारी और गंभीरता से निर्वहन नहीं किया है। यह रवैया किसी तरह आतंकवाद से संघशZ में सहयोग का नहीं है। स्पश्ट है कि भारत की कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ गईं हैं। हमें पाकिस्तान को घेरने का कूटनीतिक अभियान तेज करना होगा।

General Motor bankrupt

दिवालिया जीएम

जेनरल मोटर्स को दुनिया की महाकाय वाहन निर्माता बहुराश्ट्रीय कंपनी का खिताब हासिल है। 1908 में स्थापित इस अमेरिकी कंपनी ने अगले साढ़े सात दशक तक विश्व की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी के रुप में अपना स्थान बनाए रखा। इसकी कैडिलेक और शेवरले जैसे ब्रांड आज भी कार के चहेतों की मुख्य पसंद है। ऐसी कंपनी अगर अमेरिका के दिवालिया न्यायालय में कानून के तहत बकायों की वसूल से संरक्षण के लिए याचिका दायर करती है तो यह निश्चय ही साधारण घटना नहीं है। यह कंपनी द्वारा अपने को दिवालिया घोशित करना है। यानी हमारे पास अब बकायों के भुगतान का सामथ्र्य नहीं है। इसे यदि कॉरपोरेट इतिहास में दिवालिया घोशित होने की बड़ी घटना मानी जा रही है तो यह उचित ही है। वास्तव में जीएम भी अब लेहमन ब्रदर्स एवं वािशंगटन म्युचुअल जैसी दिवालिया महाकाय कंपनियों की कतार में शामिल हो चुकी है। यह स्थिति तब हुई जब अमेरिकी सरकार सहायता पैकेज के रुप में इसे बचाने के लिए 20 अरब डॉलर की रािश दे चुकी है। जाहिर है, आर्थिक मंदी की मार ने जीएम को कहीं का नहीं छोड़ा है। 11 सितंबर की मार को झेलने वाली कंपनी का आर्थिक संकट को न झेल पाना यह साबित करता है कि संकट कितना गहरा है। तीन साल पहले तक नई नई योजनाओं से ग्राहकों को लुभाने वाली कंपनी की बढ़ते घाटे और घटती बिक्री ने चूल हिला दिया है। कंपनी ने मंदी से बचने के लिए हर संभव तरीके अपना लिए, लेकिन इसे बचाना मुिश्कल हो गया। यद्यपि जनरल मोटर्स की भारतीय ईकाई ने कहा है कि अमेरिका की घटना का उस पर असर नहीं होगा। अमेरिका में दायर दिवालिएपन के दावों के पक्ष में जो दस्तावेज पेश किए गए हैं उनमें जीएम इंडिया का परिचालन शामिल नहीं है एवं यह इस साल दो नए कार सामने लाने की भी घोशणा कर चुकी है। लेकिन हम जानते हैं कि इसका असर होगा। मातृ संस्था की छवि दिवालिया कंपनी की हो जाए और इसकी प्रशाखाएं बिल्कुल अप्रभावित रहें यह कैसे संभव है। वैसे भी आर्थिक मंदी का राक्षस केवल एक देश तक सीमित नहीं है। किंतु उम्मीद की सबसे बड़ी किरण यही है कि ओबामा प्रशासन जीएम को बचाना चाहती है। जीएम का बंद होना अमेरिका के लिए भी भारी नुकसानदायक होगा एवं इससे उसकी छवि खराब होगी सो अलग। संदेश यह जाएगा कि ओबामा प्रशासन आर्थिक संकट से निपटने में सक्षम साबित नहीं हो रहा है। इसलिए सरकार ने इसे बचाने का निश्चय किया है। दायर याचिका को सरकार का समर्थन हासिल है। उसने मदद की रािश देने के लिए हाथ अवश्य खड़े कर दिए हैं, किंतु वह पुनर्गठन कर इसका सबसे बड़ा हिस्सेदार बन सकती है। यदि वह कंपनी का 60 प्रतिशत हिस्सेदारी अपने पास रखती है तो इससे अतिरिक्त रािश मिल जाएगी एंव इसका पुन: परिचालन संभव हो पाएगा। लेकिन फिर अमेरिका राज्य नियंत्रणों से मुक्त जिस बाजार पूंजीवाद की वकालत करता है उसका क्या होगा?

Daughter and her boyfriend killed mother

प्रेम या वासना

राजधानी दिल्ली में एक बेटी द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिलकर मां की जघन्य हत्या का मामला किसी को भी हिलाकर रख देनेवाला है। अपनी ही बेटी की नृशंसता का िशकार होने वाली किरण कपूर नामक उस मां का क्या कसूर था? उसकी जगह कोई भी मां होती तो अपनी बेटी को प्रेमिका के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखकर वही करती जो किरण ने किया। लेकिन बेटी और उसके कथित प्रेमी को देखिए, शर्मिंदा होने और क्षमायाचक बनने की बजाय वे हिंसक हो गए। इसे कतई प्रेम नहीं कह सकते। प्रेम में कहां, हिंसा, कहां वासना, कहां भेदभाव! एक व्यक्ति से सच्चा पे्रम करने वाला किसी दूसरे से घृणा कर ही नहीं सकता है। प्रेम का आयाम तो इतना व्यापक है कि इसमें समस्त सृिश्ट समाहित कर दी जाए तब भी यह अनंत ही बना रहता है। वास्तव में लड़की साक्षी कपूर और उसके कथित प्रेमी सन्नी बत्रा के बीच सच्चा प्रेम न था न है। यह तो इस समय की विडम्बना है कि शारीरिक आकशZण एवं वासना को प्रेम मान लिया जाता है। फिल्मों से लेकर, टी. वी. , विज्ञापन आदि सब दो लिंगों के बीच खिंचाव को ही प्रेम बताते हैं और नई पीढ़ी उसी का अंध अनुसरण करती है। एक समय विवाह से पहले शारीरिक संबंध को पाप मानने की मानसिकता धीरे-धीरे लुप्त हुई है। धीरे-धीरे शारीरिक संबंध स्वाभाविक मान लिए गए हैं। जिस प्रेम की बात भारतीय वांगमय करता है उसमें शरीर गौण है, आत्मा प्रमुख है। लेकिन इस समय शरीर ही प्रधान हो चुका है। साक्षी एवं सन्नी शराब पीने के बाद यौनाचार में लिप्त होकर कौन सा प्रेम कर रहे थे! परिवार के सदस्यों की अनुपस्थिति में शराब लेकर ब्वायफ्रेंड का बुलाना और फिर अकेलेपन का लाभ उठाकर रंगरेलियां मनाने के पीछे केवल कामेच्छा की पूर्ति की ही भावना हो सकती है। ऐसा करने वाले साक्षी या सन्नी अकेले नहीं है। जिस समय ये दोनों एक दूसरे के आगोश में मदहोश थे उसी समय न जाने ऐसे या दूसरे तरीकों से कितने जोड़े उसी अवस्था में होंगे। प्रेम के नाम पर वासना का विस्तार और उसकी वेदी पर सारे संबंधों की बलि की ऐसी घटनाएं आए दिन समाचार माध्यमों में स्थान पाती रहतीं हैं। कहीं किरण की तरह अपनी बेटी के अध:पतन को न सहन करने वाली मां इसकी िशकार हो जाती हैं तो कई बार कोई दूसरा निशाने पर आ जाता है। काम हर जीव का स्वाभाविक धर्म है, गीता में श्रीकृश्ण ने स्वयं को काम कहा है-कामोअहम््। लेकिन उसकी वर्जनाओं और दुश्परिणामों से समाज को बचाने के लिए कुछ मर्यादाएं तय की गईं हैं। आधुनिकता के नाम पर दी जाने वाली िशक्षा और इससे जुड़ी जीवन शैली में भोग को सर्वाधिक महत्व मिलने से ये मर्यादाएं पिछड़ापन का प्रतीक मानी जाने लगीं हैं। इससे बचना है तो प्रेम के वास्तविक अर्थ के प्रचार के साथ साित्चक और नैतिक जीवन शैली को स्वाभाविक बनाने की कोिशश करनी होगी।

सोमवार, 25 मई 2009

Bank can't publicise defaulters

सम्मान से न खेलें बैंक

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग द्वारा बैंकों को कर्ज नहीं चुकाने वालों के नाम सार्वजनिक रुप से जारी करने पर रोक स्वागतयोग्य है। खुली अर्थव्यवस्था अपनाने के बाद देश में निजी व विदेशी बैंकों का व्यापार काफी तेजी से बढ़ा है, और आम उपभोक्ताओं की कुछ सुविधाएं भी बढ़ीं हैं। किंतु इससे उपभोक्ताओं की परेशानियों में भी इजाफा हुआ है। बैंक तो कई बार बिना मांगे क्रेडिट कार्ड भेज देते हैं और आप उसे स्वीकार नहीं करिए, फिर भी मासिक बिल एवं उससे संबंधित फोन आते रहते हैं। यह मामला इसी किस्म का था। सिटी बैंक ने बिना मांगे किस व्यक्ति को कार्ड भेजा और उसका प्रयोग न करने पर भी बिल भेजते रहे, उसका नाम इंटरनेट पर गबनकर्ता की सूची में डाल दिया जिस कारण दूसरे बैंकों ने भी उसे कर्ज देने से इन्कार किया। निजी एवं बहुराश्ट्रीय बैंकों के दुव्र्यवहार का एक नमूना है। ऐसे व्यवहारों की सजा बैंक को मिलनी चाहिए। उपभोक्ता आयोन के आदेश के बाद यदि बैंक किसी कर्ज न चुका पाने वाले का नाम सार्वजनिक करता है तो यह अवैध एवं संबंधित व्यक्ति के सम्मान को चोट पहुंचाने वाला माना जाएगा। आयोग ने बैंक पर मनासिक परेशानी के एवज में 50 हजार रुपया का जुर्माना लगाकर बिल्कुल उचित कदम उठाया है। बैंकों के काम करने के तौर तरीकों एवं व्यवहार को मर्यादित एवं गरिमापूर्ण बनाने की आवश्यकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ऐसे कई दिशा निर्देश जारी कर चुका है किंतु इनके व्यवहार में जितना सुधार होना चाहिए नहीं हो रहा है। न जाने कितनी बड़ी संख्या में लोग इनके रवैये से मानसिक यंत्रणा का िशकार हो रहे हैं। किसी कार्डधारक की मृत्यु के बाद बैंक उनके परिवार के सदस्यों को मानसिक रुप से परेशान करना शुरु करते हैं। लोगों के घरों पर वसूली के नाम पर बाहुबलियों तक के भेजने की घटनाएं हुईं हैं। किसी भी कानून के राज्य में काम करने का यह तरीका नहीं हो सकता। आखिर कितने लोग अदालतों तक पहुंचते हैं। बिना क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल किए ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है जिन्हें आने वाले फोन कॉल एवं धमकियों से बचने के लिए बैंकों का चक्कर लगाते देखा जा सकता है। एक बार आपने किसी को कर्ज न चुकाने वाला घोशित कर दिया तो उसे आवश्यकता होने पर दूसरे बैंक भी कर्ज नहीं देते। लोग बैंकों की किश्त समय पर अदा करें इसका प्रोत्साहन तो मिलना चाहिए, लेकिन कोई एक बैंक दूसरे को कैसे किसी को कर्ज देने से रोक सकता है। एक महाजन के साथ किसी कर्जदार का व्यवहार यदि अच्छा नहीं रहा तो उसके कई कारण हो सकते हैं एवं दूसरे महाजन के साथ भी उसका व्यवहार वैसा ही रहेगा यह आवश्यक नहीं है।

Accident claim includes allowences

सही फैसला

उच्चतम न्यायालय द्वारा परिजनों के मुआवजे में वेतन के साथ महंगाई भत्ता एवं आवास भत्ता शामिल किए जाने के फैसले को सही न्याय कहना होगा। अभी तक दुघZटनाओं से अप्राकृतिक मौत के मामले में मोटर वाहन दुघZटना प्राधिकरण प्राय: मुआवजे की रािश की गणना मूल वेतन के आधार पर ही करते हैं। मृतक के परिजन भत्तों के रुप में प्राप्त होने वाली रािश से वंचित हो जाते हैं। यह दृिश्टकोण पूर्ण न्याय के सिद्धांत को नकारता है। आखिर परिवार के लिए वेतन में मिलने वाली रािश का महत्व होता है। वह मूल वेतन के रुप में मिला या भत्ते के रुप में इससे कर्मचारी या परिवार को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए महत्व इस बात का है कि उनके हाथों अंतिम रािश कितनी आई। हम जानते हैं कि महंगाई भत्ता या आवास भत्ता आदि की अवधारणा कई कारणों से पैदा हुईं हैं, अन्यथा पहले एकमुश्त रािश ही वेतन के रुप में मिलती थी। यह आय का ही भाग है। उच्चतम न्यायालय ने यही तो कहा है कि इसे भी आय में शामिल करना चाहिए। एक तो परिवार के आय का स्रोत चला गया और ऊपर से आप उसे मिलने वाली रािश में काट छांट कर देते हैं। क्या कर्मचारी को जिन मदों मेें भत्ते के नाम पर रािश मिलती हैं मृतक के परिजनों के लिए उन मदों की प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है? न तो उनके लिए महंगाई अप्रासंगिक होता है और न आवास का किराया ही। इसलिए इस रािश को काट लेना अन्याय है। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद मुआवजे के संदर्भ में वशोZं से चली आ रही यह विसंगति दूर हो जाएगी। आखिर स्थापित मानक के प्रभाव में ही तो मध्यप्रदेश की िशक्षिका की मृत्यु के मामले में पहले निचली अदालत ने भत्तों को आय मानने से इन्कार कर दिया एवं उच्च न्यायालय तक ने इसकी पुिश्ट कर दी। निश्चय ही अदालतों की सोच इससे बदलेगी और केवल महंगाई एवं आवास भत्ता नहीं, अन्य जो भी भत्ते मृतक को प्राप्त होते थे उन सबको आय मानकर मुआवजे की रािश में शामिल किया जाएगा। दुघZटना से मृत्यु के मामले में ऐसी कई विसंगतियां हैं जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। जिस मामले में यह फैसला दिया गया वह नवंबर 2002 का है। यानी परिजनों को मुआवजे की रािश पाने के लिए करीब साढ़े छ: वशZ प्रतीक्षा करनी पड़ी। यदि परिवार में एक ही व्यक्ति अर्जन करने वाला हो तो उसकी क्या दशा होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। 50 हजार की अंतरिम रािश में कितने दिन काम चलेगा। इसलिए ऐसे मामले में फैसले की समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। दूसरे, मृतक के उत्तराधिकारी को पेंशन के साथ दोबारा शादी न करने की शत्तZ नत्थी है और इसे आधार बनाते हुए न्यायालयों ने कई फैसलों में मुआवजे की रािश लेने के साथ यही शत्तZ लगा दिया है। यह भी उचित नहीं है। इस शत्तZ को भी समाप्त करना चाहिए।

टीम मनमोहन

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ शपथ लेने वाली 19 सदस्यीय मंत्रिमंडल को बहुत हद तक जाने-पहचाने, अनुभवी, कसौटी पर खरे उतरे और राजनीतिक दृिश्ट से परिपक्व लोगों का समूह कहा जा सकता है। इसलिए मंत्रिमंडल की औसत उम्र 67 वशZ हो गई है। जिन विभागों की घोशणाएं हो गईं हैं उनमें भी अनुभव एवं योग्यता ही पैमाना बनाया गया है। अगर पी. चिदम्बरम के पास गृह मंत्रालय का प्रभार रहने दिया गया है तो उसका कारण उनके द्वारा मुंबई हमले के बाद अपनी नियुक्ति को सार्थक साबित करना ही है। इसी प्रकार प्रणब मुखजीै को यदि वित्त मंत्रालय का नेतृत्व दिया गया तो उसके पीछे प्रधानमंत्री का यह विश्वास ही है कि वे उनके साथ मिलकर आर्थिक समस्याओं से जूझती दुनिया से भारत को बचाकर बाहर निकालने में सक्षम होंगे। ए. के. एंटनी को भी रक्षा मंत्री के रुप में अपने बेहतर काम का इनाम मिला है। प्रधानमंत्री ने आतंकवाद से संघशZ एवं अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने को अपना प्रमुख उद्देश्य घोशित किया है। यह राहुल गांधी के युवा तर्क वाला मंत्रिमंडल नहीं है, लेकिन अभी आगे विस्तार होना है और उसमें निश्चय ही युवा चेहरे भी हमें दिखाई देंगे। वैसे भी मंत्रिमडल में अनुभवी एवं नए चेहरे के बीच संतुलन होना चाहिए। देश को सक्षम और संवेदनशील सरकार चाहिए जो कि सामने खड़ी चुनौतियों का मुकाबला कर उससे हमें बाहर निकाल सके। इसमें उम्र कहीं बाधा नहीं है। मंत्रियों ने जो कुछ कहा है उससे यह उम्मीद बनी है कि ये देश के लिए बेहतर काम करने का प्रयास करेंगे। लोकसभा का गणित भी इस बार प्रधानमंत्री का साथ दे रहा है जिसमें साथी दलों के अनावश्यक दबाव एवं धमकियों की संभावनाएं क्षीण हैं। हालांकि पहले चरण के शपथ ग्रहण में केवल कांग्रेस, राश्ट्रवादी कांग्र्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों के शामिल होने के कारण देश के सामने विखंडित राजनीति की कमजोरियों का अहसास बना रहा, लेकिन यह राजनीतिक गणित ही है, जिस कारण कांग्रेस बगैर द्रमुक के ही ऐसा करने का साहस कर पाई। वर्तमान मंत्रिमंडल को सोनिया गांधी द्वारा नया कांग्रेस कहना अनुपयुक्त नहीं है। आखिर ये दोनों पार्टियां कांग्रेस से ही निकली है। अगर द्रमुक एवं नेशनल कॉन्फ्रेंस के मंत्री भी शामिल होते तो निश्चय ही यह कांग्रेस परिवार का शपथ ग्रहण नहीं माना जाता। अच्छा हो द्रमुक जनादेश का संदेश समझते हुए शीघ्र बातचीत में मध्यमार्गी रुख अपनाए एवं सरकार में शामिल हो जाए। आखिर मतदाताअों ने राजनीतिक सौदेबाजी के दौर के अंत के लिए तो कांग्रेस एवं उसके साथियों के पक्ष में ऐसा जनादेश दिया है। मंत्रिमंडल में किसे लेना और नहीं लेना है यह प्रधानमंत्री का विशेशोधिकार होना चाहिए। साथी दल के नाते द्रमुक अपनी ओर से नाम दे सकता था, लेकिन नेतृत्व प्रधानमंत्री के हाथों हैं इसलिए वे किसे और कितने को साथी बनाएं इसे आरोपित नहीं किया जाना चाहिए।

14 Lok Sabha ends

14 वीं लोकसभा का उत्तराधिकार

मंत्रिमंडल की अंतिम बैठक के बाद प्रधानमंत्री द्वारा इस्तीफा सौंपने एवं लोकसभा भंग करने की सिफारिश के साथ 14 वीं लोकसभा एवं संप्रग सरकार का औपचारिक अंत हो गया। दूसरी ओर चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव में विजेताओं की सूची सौंपने के साथ 15 वीं लोकसभा के गठन की प्रक्रिया भी आरंभ हो गई। 14 वीं लोकसभा की नींव पर खड़ी हो रही नई लोकसभा उसके प्रभावों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती। इस लोकसभा के राजनीतिक समीकरणों का जनता के मनोविज्ञान पर यकीनन प्रभाव पड़ा और उसकी परिणति हमने एक स्थिर सरकार के जनादेश के रुप में देखा है। 14 वीं लोकसभा पहली लोकसभा थी जिसमें कोई कम्युनिस्ट अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचा और अंतिम अवधि में उसे पार्टी का आदेश न मानने पर निश्काशित किया गया। अध्यक्ष और विपक्ष के बीच सीधा टकराव का वाकया भी इसी लोकसभा ने देखा। इसके पहले कभी अध्यक्ष के रवैये से नाराज होकर विपक्ष ने बहिर्गमन नहीं किया था। 11 सांसदों को उनके कार्यकाल में बखाZस्त करके भी इस लोकसभा ने अभूतपूर्व कदम उठाया। सांसदों की खरीद-फरोख्त के आरोप के साथ रुपए के बंडल सदन के पटल पर लहराने का कारनामा भी इसी लोकसभा में हुआ। ये ऐसे वाकये हैं जिनकी पुनरावृत्ति कोई नहीं चाहेगा। हमारी उम्मीद भी है और दुआ भी कि 15 वीं लोकसभा ऐसे शर्मनाक वाकयों से मुक्त होकर लोकतंत्र के पवित्र मंदिर की छवि पुनस्थाZपित करने में सफल हो। देश का एक-एक नागरिक यही चाहेगा कि 14 वीं लोकसभा की तरह कार्यवाही के निर्धारित समय में से 423 घंटे हंगामें एवं बहिर्गमन की भेंट न चढ़े। इस संसद ने अपनी निर्धारित बैठकों में से करीब एक चौथाई यानी 24 प्रतिशत समय व्यर्थ गंवा दिया। हमारे राजनेता यदि देश में अपने रवैये के खिलाफ बढ़ रही जुगुप्सा को समझेंगे तो यकीनन उनका रवैया बदला होगा। 15 वीं लोकसभा इस मायने में अपने पूर्वज से भिन्न होगी कि इसमें बहुमत के लिए सरकार को बाहर से किसी के समर्थन की अपरिहार्यता नहीं है। साथ ही सरकार को बनाए रखने के लिए बहुत ज्यादा दलों को मंत्रिमंडल का अंग बनाने की भी आवश्यकता नहीं। ऐसे मेें सरकार बचाने की विवशता में किसी अवांछित कदम की संभावना यूं भी नहीं है। पूर्व की तुलना में सदन का संचालन ज्यादा आसान होगा। विपक्ष को भी पराजय के आघात से सीख मिली होगी। ऐसे कई सांसद इस लोकसभा में नहीं होंगे जो कि हंगामों के लिए जाने जाते थे। लेकिन संसदीय मर्यादा का पालन करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चन्द्रशेखर तथा विरोध को भी मर्यादित शब्द देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी इस लोकसभा में नहीं होंगे। युवा एवं नए चेहरों की काफी संख्या वाली इस लोकसभा में हमें उम्मीद है कि सांसदों का व्यवहार बदला होगा और हमें उत्कृश्ट संसदीय कार्यव्यवहार देखने को मिलेगा।

रविवार, 24 मई 2009

Jajiya on sikh in Pak

जजिया का फरमान आधुनिक सभ्यता का अंत करने की सोच से पैदा हुई है
यह हिन्दुस्तान के लिए उठ खड़े होने का समय है

ओराकजाई पाकिस्तान के पिश्चमोत्तर इलाके के उन सात स्वायत्त क्षेत्रों में ‘ाामिल है जिसे मिलाकर फाटा यानी फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया या संघ प्रशासित कबिलाई क्षेत्र बना है। सरदार कल्याण सिंह के पूर्वज ओराकजाई के फीरोजखेल की विहंगम घाटी मेें न जाने कब बस गए। विभाजन के बाद भी उन लोगों ने उस क्षेत्र को छोड़ा नहीं। पाकिस्तान के बारे में आम सोच चाहे जो हो, कल्याण सिंह जैसे दूसरे सिख परिवारों को पिछले छ: दशकों में कभी मजहबी आधार पर भेदभाव नहीं झेेलना पड़ा। उस क्षेत्र के पख्तूनों ने उनके सहित दूसरे सिखों का पूरा ख्याल रखा। लेकिन 45 वशZ की आयु में उनके लिए सब कुछ बदल गया है। तहरीक-ए-तालिबान के प्रमुख बैतुल्ला मेहसूद के सहयोगी हकीमुल्ला मेहसूद ने यहां इस्लामी राज्य की घोशणा कर दी एवं उनके आतंक से सिख परिवारों को पेशावर भागना पड़ा। कल्याण सिंह ने फिर भी अपने पूर्वजों का घर नहीं छोड़ा। उन्हें विश्वास था कि ओराकजाई कबिलाओं के साथ वे पूर्णतया सुरक्षित हैं। किंतु एक दिन हकीमुल्ला स्वयं अपने लड़ाकों के साथ वहां उपस्थित हुआ एवं सिख समुदाय के सदस्यों को एकत्रित होने का आदेश दिया। उन्हें हुक्म सुनाया गया कि तुम सब गैर इस्लाम मजहब के हो, इसलिए या तो तुम जजिया कर दो या फिर इस्लाम कबूल करो। जजिया की रािश दस करोड़ बताई गई। कल्याण सिंह को तालिबान उठाकर ले गए, उन्हें दस दिनों तक कब्जे में रखा, यातनाएं दीं। बीच-बचाव एवं मिन्नत के बाद इन लोगों ने जजिया की रािश घटाकर 4 करोड़ एवं फिर डेढ़ करोड़ किया। कल्याण सिंह को रािश जुटाने के लिए रिहा किया गया, लेकिन उनके एवं अन्य 50 सिख पुरुश महिलाओं को जमानत के रुप में बंधक बनाकर रखा गया इस धमकी के साथ यदि तुमने भागने की कोिशश की तो इनका कत्ल कर दिया जाएगा या इन्हें मुसलमान बना दिया जाएगा। कल्याण सिंह अभी पेशावर में है और धन जुटाने की कोिशश कर रहे हैं। केवल अराकजाई नहीं, पूरे पिश्चमोत्तर क्षेत्र में जो करीब 10 हजार सिख रहते हैं उनके लिए इतनी बड़ी रािश अदा करना आसान नहीं है। ये मुख्यतया पेशावर में ही बसे हैं। इनमें कुछ तो अफगानिस्तान में मुजाहिद्दीनों एवं तालिबानों के आतंक के राज्य से बचकर यहां पहुंचे और कुछ पहले से ही हैं। ये मुख्यतया कपड़े के व्यापारी हैं या फिर कॉस्मेटिक्स के व्यापार में लगे हैं। ओराकजाई एवं ख्ौबर के सिख स्थानीय कबिलाओं की तरह हशीश का कारोबार करते हैं। हालांकि उलेमाओं की पंचायत यानी जिरगा की अपील के बाद उन परिवारों को रिहा किया गया लेकिन ‘ार्त यही कि ये 1.3 करोड़ जजिया अदा करें।भारत में बैठकर हम निश्चय ही पिश्चमोत्तर पाकिस्तान में सिखों की स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते। किंतु इस विवरण मात्र से जो तस्वीर हमारे-आपके जेहन में उतरती है उससे सिहरन तो पैदा होता ही है। जजिया इस्लामी ‘ाासन में गैर इस्लामी निवासियों जिन्हें इस्लामी कानून में धिम्मी कहा गया है, पर लगाया जाने वाला कर है। मध्यकालीन अरब एवं भारत के इतिहास में जजिया एक आतंकित करने वाला शब्द था। हालांकि हाल के वशोZं में कुछ विद्वानों ने जजिया की एक सामान्य कर के रुप में भी व्याख्या की है एवं यह बताने का प्रयास किया है कि इस्लाम के अनुसार जकात भी एक कर है जो कि मुसलमानों को देना पड़ता है। इसलिए गैर मुसलमानों पर यदि जजिया लगाया गया तो यह कतई अन्यायपूर्ण नहीं था। ऐसी दलीलों से सहमति कठिन है। ए.एस. ट्रिट्टन, मैिक्सम रौडिन्सन, बाट ये... जैसे विख्यात पिश्चमी इतिहासकारों ने यह बताया है कि आरंभिक इस्लामी साम्राज्यों मिस्र, सीरिया ... में इस्लाम धर्मावलंबी राज्य के खजाने में कुछ देते ही नहीं थे, क्योंकि उसमें विजीत धिम्मी ईसाइयों की भारी आबादी थी, जिनसे वसूले गए जजिया से पूरा खर्च चलता था। रॉडिन्सन ने तो मोहम्म्द साहब की जीवनी में यह लिखा है कि कई बार इस्लाम में धर्मांतरण इसलिए निशिद्ध किया गया है, क्योंकि इससे कर का आधार कमजोर होता है। वास्तव में जजिया की जकात से कोई तुलना नहीं थी। मध्यकाल में करों पर काम करने वालों ने इसके काफी विवरण दिए हैं। बेन शेमेश की टैक्सेशन इन इस्लाम, जा फर की किताब अल-खराज के अलावा के.एस. लाल की थ्योरी एंड प्रैिक्टस ऑफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया आदि से हमें इनकी पूरी जानकारी मिल जाती है। इसके अनुसार जकात अनिवार्य नहीं था, उसकी दर कम थी, भारत में संपत्ति पर ढाई प्रतिशत तक था, इसमें दाता को स्वयं अपनी संपत्ति या आय के बारे में बताना था और उसे स्वीकार किया जाता था। जकात कई बार केवल सीमा शुल्क के रुप में लिया जाता था। इसके विपरीत जजिया मनमाने ढंग से और जबरन वसूला जाता था। इसके साथ अपमान और उत्पीड़न जुड़ा था। मध्यकालीन शासकों ने न जाने कितने दूसरे मजहब के लोगों को जजिया न देनेे के कारण इस्लाम कबूलने को विवश किया। जाहिर है, जब तालिबान ने अफगानिस्तान के शासन पर कब्जा किया तो वहां इस्लामी कानून के नाम पर यही किया और स्वात में पाकिस्तान सरकार द्वारा शरीया कानून लागू करने को मान्यता देने के बाद इन्होंने यही करने की कोिशश की। जजिया न देने पर हकीमुल्ला मेहसूद के आदेश में कई घरों एवं दूकानों को ध्वस्त कर दिया गया। भारत द्वारा सिखों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करने के बाद पाकिस्तान का बयान है कि सिख उनके नागरिक हैं जिनकी रक्षा उसकी जिम्मेवारी है एवं भारत उसकी चिंता न करे। अगर पाकिस्तान वाकई रक्षा करने के काबिल होता तो उनकी ऐसी दुर्दशा ही नहीं होती कि उन्हें गुरुद्वारों में शरण लेनी पड़ती। क्या पाकिस्तान सरकार ने जब कट्टरपंथियों के साथ समझौता कर शरीया कानून लागू करने की बात मानी तब उसे इस बात का इल्म नहीं था कि वहां गैर इस्लामी लोगों के साथ ये पागल मुजरिमाना बर्ताव कर सकते हैं? जाहिर है, असली दोश तो पाकिस्तान की सरकार का है, जिसने आतंकवादियों के सामने घुटने टेके। अब स्वात क्षेत्र में हालांकि सेना आतंकवादियों के साथ युद्ध कर रही है और यह सही दिशा है। एक राज्य के भीतर दो कानून कैसे चल सकता है? किंतु उन्हें यहां तक पहुंचना ही एक राज्य के रुप में पाकिस्तान की विफलता है। हम जानते हैं कि कट्टरपन्न, आतंकवाद आदि के प्रति पाकिस्तानी सत्ता प्रतिश्ठान का नजरिया दुविधापूर्ण रहा है। इस्लाम के नाम पर भारत से टूटकर अलग हुआ यह मुल्क वास्तव में इसी कारण अपना कोई नििश्चत स्वरुप बना ही नहीं पाया। आधुनिक राज्य व्यवस्था का कोई दूसरा मुल्क मजहबी कानून की कतई इजाजत नहीं देता। इन्होंने केवल सिखों पर अत्याचार नहीं किया, स्वयं मुसलमानों में पढ़े-खिले आधुनिक सोच वाले भी इनका क्रूर िशकार हुए हैं। लड़कियों के विद्यालयों को ध्वस्त करना, लड़कियों के विद्यालय जाने पर निशेध, महिलाओं के अकेले बाहर निकलने की मनाही... और इसका उल्लंघन करने पर कठोर सजा। सजा के जो वाकये हमारे सामने आए हैं वे दिल दहलाने वाले हैं। इनकी तो घोशणा है कि पिश्चम के लोकतंत्र अपनाने के कारण पाकिस्तान नामक देश ही गैर इस्लामी हो चुका है जिसे पूर्ण इस्लामिक बनाना है। पाकिस्तान के नेताओं ने गैर इस्लामी कृत्य किया है। इस प्रकार ये केवल गैर इस्लामी समुदायों के ही नहीं, पूरी मानवी सभ्यता के दुश्मन हैं। जजिया का फरमान इस सभ्यता को नश्ट करने की उनकी सोच का ही अंग है। ओराकजाई कबिले के लोग जो स्वयं मुसलामान हैं, ने इनका विरोध किया। एक जिरगा में इनके विरोध की रणनीति पर बैठक बुलाई गई और तालिबानों न उसे ही उड़ा दिया जिसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए। उसके बाद ये भयवश खामोश हो गए। इसी प्रकार फीरोजखेल के बगल में कलाया है जहां के िशया तालिबान से लड़ रहे हैं। तालिबानों ने सबसे ज्यादा निशाना तो मुसलमानों को ही बनाया है। इस समय स्वात से घरबार छोड़कर कई लाख मुलसमान अपने ही देश में ‘ारणार्थी बन चुके हैं। कल्पना करिए, अगर इनका विस्तार हो गया तो ये किस प्रकार कोहराम मचाएंगे। इस प्रकार यह लड़ाई पूरी दुनिया की है। हिन्दुस्तान इससे सीधा प्रभावित है, इसलिए इसे इसके खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए।

Election Verdict

इस जनादेश से नये राजनीतिक युग की नींव पड़ी है
वाह रे जनादेश! सारे आकलन और अनुमान एकबारगी धाराशायी। 15 वीं लोकसभा चुनाव परिणाम का सबसे बड़ा निश्कशZ यही है कि देश की जनता राश्ट्रीय स्तर पर स्पश्ट निर्णायक जनादेश की पहल कर चुकी है। यह कहा जा सकता है कि 1989 के साथ राश्ट्रीय राजनीति में जो चक्र आरंभ हुआ वह अब पूरा हो रहा है। संप्रग का अकेले बहुमत के करीब पहुंचना एवं अपने पूर्व साथियों के साथ स्पश्ट बहुमत पाना समस्त कल्पनाओं से परे है। कांग्रेस अपने साथी दलों के साथ सबसे ज्यादा स्थान पाएगी यह तो साफ था लेकिन सारे विश्लेशकों का मानना यही था कि उसे अंतत: वामदलों व तीसरे मोर्चे के नाम से एकत्रित दलों से समर्थन की दरकार पड़ेगी। इसी सोच के तहत बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विचार-विमशZ के केन्द्र में आ गए थे। मायावती, जयललिता, चन्द्रबाबू नायडू, देवेगौड़ा सबका राजनीतिक महत्व इतना बढ़ गया था कि इनके बगैर किसी सरकार की कल्पना तक नहीं की जा रही थी। चुनाव परिणामों ने इन सबको राश्ट्रीय राजनीति के हािशए में पटक दिया है। बिहार में जनदा दल-यू एवं भाजपा के गठबधन का अच्छा प्रदशZन भी राजग के काम नहीं आया और उन्हें विपक्ष में ही अपनी भूमिका निभानी होगी। कांग्रेस ने 1991 के बाद पहली बार इतनी अधिक सीटें जीतीं है और उसने भाजपा के 1998 1999 के आंकड़े को भी पार कर दिया है। देश की राजनीति जितनी विखंडित हो गई थी उसमें स्वयं कांग्रेस भी इतनी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं कर रही थी। इसका प्रमाण उसका स्वयं का चुनाव बाद सर्वेक्षण परिणाम था जिसमें 161 सीटें मिलने का आकलन था। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक वामदलों का रिझाने वाले वक्तव्य दे रहे थे। इस प्रकार यह मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि कुछेक स्थानों को छोड़कर बहुसंख्य मतदाता ने लंबे समय की चलायमान राजनीति से उबकर देश की राजनीति को स्थिर करने के लिए मतदान किया है। चुनाव परिणामों का कई प्रकार से विश्लेशण किया जा सकता है, लेकिन अंतिम अंकगणित को कोई नकार नहीं सकता। गहराई से देखेंगे तो इस चुनाव में राजनीतिक अस्थिरता के लिए जिम्मेवार ज्यादातर दलों को जनता ने नकार दिया है। इसमें सबसे पहला स्थान वामदलों का आएगा। पिश्चम बंगाल एवं केरल का लाल दुर्ग दरक चुका है। इन दोनों राज्यों में माकपा न अकेले सबसे बड़ी पार्टी रही और न उसके नेतृत्व वाला मोर्चा। मनमोहन सिंह सरकार से 18 जुलाई 2008 को समर्थन वापसी के बाद से इनका दावा था कि ये अगले चुनाव में गैर कांग्रेस एवं गैर भाजपा सरकार बनाएंगे। आज ये एक ताकतवर विपक्ष की भूमिका निभाने की हालत तक में नहीं है। यह भारतीय राजनीति की बहुत बड़ी घटना है। दोनों राज्यों में कांग्रेस एवं उसके सहयोगी तृणमूल द्वारा वामदलों के स्थानापन्न का राश्ट्रीय महत्व बिल्कुल स्पश्ट है। निस्संदेह, प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस गठजोड़ की विजय के स्थानीय कारण हैं और इसका सेहरा ममता बनर्जी के सिर जाएगा, किंतु यह भी साफ है कि जनता ने वामदलों विशेशकर माकपा के हाथ से राश्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका का सूत्र छीन लिया है। यह 1989 के बाद पहली बार होगा जब माकपा दोनों में से किसी पक्ष में प्रभावी भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं होगी। कांग्रेस के भीतर जो नेता वामदलों के साथ मेलमिलाप कर चुनाव में उनके साथ उतरने के हिमायती थे वे गलत साबित हुए। वास्तव में कोई पार्टी जनता के अंतर्मन को पूरी तरह भांपने मे सफल नहीं रही। साफ है कि देश और दुनिया जिस अवस्था से गुजर रही है उसमें लोग केन्द्र में एक स्थिर सरकार चाहते थे। जयललिता, चन्द्रबाबू नायडू.... आदि का तीसरे मोर्चा के नाम से वामदलों के साथ एकत्रित होने से जनता के बीच विपरीत संदेश गया। तमिलनाडु एवं आंध्रप्रदेश का परिणाम हमारे सामने है। सारे अनुमानों में जयललिता का गठजोड़ आगे था और करुणानिधि के द्रमुक कांग्रेस गठजोड़ के सूपड़ा साफ होने की बात की जा रही थी। परिणाम ऐसा नहीं आया। अन्नाद्रमुक की 2004 के शून्य के मुकाबले लोकसभा में प्रतिनिधित्व हुआ, लेकिन राजनीति को प्रभावित करने की दृिश्ट से उनका होना और न होना बराबर है। आंध्र में कांग्रेस ने रिकॉर्ड जीत हासिल की और तीसरा मोर्चा धाराशायी हो गया। ध्यान रखने की बात है कि कांग्रेस के पक्ष में ऐसा ही परिणाम आंध्र विधानसभा चुनाव में नहीं आया। जाहिर है वहां सत्ता विरोधी रुझान था, किंतु केन्द्र में राजनीतिक अस्थिरता दूर करने की जन मन:स्थिति लोकसभा चुनाव में सब पर भारी पड़ गई। जम्मू कश्मीर में पीडीपी का सफाया एवं कांग्रेस नेशनल कांफ्रेंस गठजोड़ की सफलता को इसी सोच की परिणति मानी जाएगी। आखिर पीडीपी ने प्रदेश में सरकार से समर्थन वापस लिया था। इस जन मनोविज्ञान के रास्ते मायावती जैसी नेत्री की महत्वाकांक्षा भी बाधा बन रही थी। जिस प्रकार उनके समर्थकों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना दिया था, निश्चय ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की आशातीत सफलता के पीछे उसकी बहुत बड़ी भूमिका है। इसे हम कांग्रेस के रुप में विकल्प उपलब्ध होने के कारण मुसलमान, दलित एवं ब्राह्मण मतों का आंिशक धु्रवीकरण की परिणति कह सकते हैं। यह सही भी है कि कांग्रेस के ये परंपरागत मतदाता उसके अकेले मैदान में उतरने के कारण उ. प्र. एवं बिहार दोनों जगह उसकी ओर मुड़े हैं। बिहार में भले राजग की लहर में उसे सीटें नहीं मिलीं, लेकिन उसके मतों में कई गुणा बढ़ोत्तरी हुई है। ये मतदाता पिछले लंबे समय से विकल्प उपलब्ध न होने के कारण दूसरे दलों को मत देकर देश में राजनीतिक अस्थिरता का कारण बनते थे। इन्होंने अब अपना इरादा बदलने का संकेत दे दिया है। अगर कांग्रेस इसे आगे अपनी राजनीतिक रणनीति से सुदृढ़ करने में सफल रही तो निश्चय ही वह अकेले बहुमत पाने की स्थिति में पहुंच जाएगी। उसके परपंरागत मताधार पर राजनीति की जमीन खड़ी करने वाली पार्टियों के लिए यह खतरे की घंटी है। तो परिणाम के सबक साफ है। राश्ट्रीय पार्टियां छोटे दलों के दबाव में आए बगैर अपनी राजनीति करें। चुनाव परिणाम का सतही विश्लेशण भी साबित कर देता है कि ज्यादातर जगहों पर आम मतदाता ने अपने नजरिए से बेहतर राश्ट्रीय विकल्प का वरण किया है। उसे दोनों प्रमुख राश्ट्रीय धुरी में से जिसमें भी राजनीतिक स्थिरता की संभावना निहित लगी उसे समर्थन दिया है। बिहार एवं झारखंड में भाजपा-जद यू, या कर्नाटक, हिमाचल...आदि में भाजपा की सफलता भी राश्ट्रीय राजनीति में स्थिरता लाने का ही द्योतक है। हां, वहां यदि तीसरे चौथे विकल्प को समर्थन मिलता तो अवश्य इसका दूसरा राजनीतिक अर्थ होता। बिहार एवं झारखंड में लोजपा, राजद, के सफाए की क्या व्याख्या होगी? लालू यादव तक सारण से अंतिम समय में किसी प्रकार विजीत हुए, लेकिप राम विलास पासवान उस हाजीपुर सीट से हारे जहां से उन्होंने सबसे ज्यादा मतों से विजय का रिकॉर्ड बनाया था। यह कोई साधारण घटना नहीं है। इसी प्रकार झारखंड में झामुमो भी राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक बन चुकी थी। कर्नाटक में देवेगौड़ा एवं उनका जद-सेक्यूलर राजनीतिक स्थिरता का प्रतीक नहीं बन पाया था। उड़ीसा को छोड़कर तमाम परिणामों का एक ही स्वर है। कांग्रेस एवं भाजपा को यह स्वर सुनना चाहिए। इस चुनाव परिणाम ने दो ध्रुवीय राजनीति की ठोस नींव एवं दीवार खड़ी कर दिया है, जिसे सुदृढ़ करना राश्ट्रीय दलों का दायित्व है। आखिर सारी आशंकाओं के विपरीत दोनों मुख्य पार्टियों को करीब सवा तीन सौ सीटें तथा इनके गठजोड़ को करीब सवा चार सौ सीटें मिली हैं। इस प्रकार 15 वीं लोकसभा चुनाव से जिए नए चक्र की शुरुआत हुई है उसे मुकाम तक पहुंचाने की चुनौती दोनों प्रमुख दलों के सामने है। तो क्या ये इस चुनौती को स्वीकार कर युगांतकारी भूमिका निभाने को तैयार हैं? यह ऐसा प्रश्न है जिससे उत्तर पर देश की राजनीतिक नियति निर्भर करता है।

शुक्रवार, 15 मई 2009

Nitish Modi handshake

रैली बड़ी या नीतीश मोदी मिलन?

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की लुधियाना महारैली में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से हाथ मिलाना सबसे बड़ी खबर थी या रैली का आयोजन एवं उसमें नेताओं के एकजुट रहने का भाषण ? देश के आम नागरिक के लिए इसका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है, रैली एवं नेताओं की एकजुटता। किंतु, राजनीति एवं मीडिया ने इस सवाल को उलझा दिया है। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और मीडिया के कुछ हलकों की सुिर्खयों के अनुसार तो नीतीश मोदी का एकता प्रदशZन ही सबसे महत्वपूर्ण बात थी। क्यों? इस सवाल के जवाब के लिए यह देखना जरुरी होगा कि नीतीश मोदी के हाथ मिलाने को मुद्दा बनाने वाले हैं कौन? इसका सबसे तीखा विरोध लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान एवं राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की ओर से हुआ है। इन्होंने नीतीश कुमार को धोखेबाज तक कह दिया है। हम आप सब जानते हैं कि इन दोनों पार्टियों ने पिछला लोकसभा में चुनाव गुजरात दंगा और नरेन्द्र मोदी को सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया था। हालांकि 2005 के विधानसभा चुनाव में भी इन्होंने मोदी एवं दंगे को मुद्दा बनाया, किंतु इन्हें लोकसभा चुनाव के अनुसार सफलता नहीं मिली। भाजपा के संदर्भ में मुसलमानों की भयग्रंथि को घनीभूत बनाए रखने में ही लालू की रजनीति का तानाबना टिका है। पासवान तो अपने सेक्युलर चरित्र का सबूत ही यह कहकर देते हैं कि उन्होंने गुजरात दंगों के विरुद्ध ही राजग का दामन छोड़ा था। ऐसी राजनीति और मीडिया की कृपा से मोदी सक्रिय मुसलमानों के बीच आतंक बन चुके हैं। नीतीश ने बिहार मुसलमान वोट बैंक को दरकाकर वैसे भी इनको कमजोर किया है। जाहिर है, इनके लिए नीतीश पर तीखा हमला अस्वाभाविक नहीं है। हालांकि यह बात सही है कि नीतीश एवं जद-यू के अध्यक्ष शरद यादव राजग में होते हुए भी मोदी के साथ एक मंच पर आने से अब तक बचते रहे हैं। नीतीश के आग्रह पर ही भाजपा की सबसे ज्यादा चुनावी सभाएं संबोधित करने वाले मोदी न 2004 में बिहार गए, न 2005 में एवं न इस बार। पिछले दिनों एक टी। वी. साक्षात्कार में जब नीतीश से यह पूछा गया कि वे मोदी के साथ मंच पर आएंगे तो उन्होंने इसका जवाब दिया, नहीं, जरा भी नहीं। इस परिप्रेक्ष्य में लुधियाना की तस्वीर उनके पूर्व रवैये के विपरीत दिखती है। किंतु हम यह न भूलें कि लुधियाना में राजग की रैली थी और उसका एक घटक होने के नाते नीतीश की वहां उपस्थिति लाजिमी थी। निश्चय ही इस रैली के पीछे भाजपा की ही भूमिका थी लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल मेजबान थे और उनके प्रकट आमंत्रण पर ही सारे नेताआंें ने िशरकत किया। जब वहां राजग के सभी मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति तय थी तो फिर मोदी आएंगे या नहीं ऐसी कयास ही बेमानी थी। विरोधियों की इच्छानुसार यदि नीतीश या दूसरे नेता वहां नहीं जाते तो इससे राजग में अनेकता का संदेश जाता और यही लोग उसका उपहास उड़ाते। लोकसभा चुनाव में यदि ये एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं तो इनके बीच एकता दिखनी ही चाहिए थी। लालू, पासवान या अन्य विरोधियों की इच्छा से तो जद-यू एवं भाजपा का गठबंधन नहीं बना हुआ है। यह गठबंधन ही इन सारे विरोधियों के विरुद्ध है। मंच पर यदि मोदी का हाथ बढ़ा तो क्या सामने वाला यह कहकर हाथ खींच लेगा नहीं मैं आपसे हाथ नहीं मिला सकता? आखिर केन्द्र सरकार द्वारा आहूत बैठकों में मोदी आते हैं और जिनसे वे चाहते हैं हाथ मिलाते हैं। प्रधानमंत्री सहित जिन मंत्रियों की उनमें उपस्थिति अनिवार्य होती है वे वहां रहते हैं और उनसे भी सहज ढंग से मोदी मिलते हैं। मीडिया के जिस वर्ग ने छाती पीटने का माहौल बनाया हुआ है उनके पत्रकार भी बाजाब्ता मोदी से हाथ मिलाते हैं। कहा जा सकता है कि दोनों हाथ मिलाने में अंतर है। किसी सामान्य मुलाकात में हाथ मिलाने एवं चुनावी रैली में हाथ मिलाकर एकता प्रदशZन करने का संदेश बिल्कुल अलग जाता है। रैली में जिस प्रकार मोदी ने नीतीश से हाथ मिलाते हुए उन्हें उठाया एवं जनता के बीच एकता दशाZयी उसका संदेश वाकई अलग था। यह भी साफ था कि सब कुछ मोदी की ओर से ही हुआ और उन्होंने पूर्व योजना के अनुसार भूमिका अदा की। किंतु यह जिन्हें भी अजूबा एवं आपत्तिजनक लगा उनकी अपनी मानसिकता के कारण। मोदी को हौव्वा एवं तथाकथित सेक्यूलर दुनिया में अछूत बनाने वालों ने बिल्कुल अव्यावहारिक तरीके का माहौल बनाया हुआ है। ऐसा लगता था मानो मोदी और नीतीश के मंच पर आने से कुछ अजूबा घटित हो जाएगा। जिस भाजपा के नेतृत्व में राजग गठित है उसके मोदी बड़े नेता हैं, पार्टी का एक वर्ग तो उन्हें अगला प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तक बना रहा है। कोई पार्टी या नेता भाजपा के साथ रहते हुए मोदी के साथ अछूत का बर्ताव करता रहे यह संभव ही नहीं है। इस प्रकार नीतीश का पूर्व रवैया ही गलत था। यदि उन्हें भाजपा स्वीकार है तो मोदी भी स्वीकार्य होना चाहिए। दोनों बातें एक साथ चल भी नहीं सकतीं। यह तो हमारे युग का नैतिक पतन है कि मोदी को खलनायक बनाकर अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ लिया गया है। मुसलमानों का हितैशी साबित करने का मतलब मोदी का आक्रामक विरोध या उनसे घोशित दूरी। आपको और कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं है। मुसलमानों के अंदर भयगं्रंथि पैदा करके राजनीति करनेे वाले बुनियादी सवालों से बचने के लिए हमेशा ऐसा कोई प्रतीक ढूंढते हैं, जिनसे उन्हें बरगलाया जा सके। किंतु इनके अनुसार यदि राजनीति संचालित हो तो न भाजपा के साथ कोई दल होना चाहिए और न आम जनता का मत ही उसे मिलना चाहिए। ये दोनों बातें नहीं हो रहीं हैं। किसी को चाहे जितना नागवार गुजरे लुधियाना में एक मंच पर नौ दलों का इकट्ठा होना चुनाव प्रक्रिया के अंतिम दौर की सबसे बड़ी घटना थी। अगर संप्रग एवं तीसरे मोर्चे से तुलना करें तो इस रैली के बाद राजग सबसे बड़ा गठजोड़ है। ये दोनों घटक चाहकर भी चुनाव के बीच कोई रैली नहीं कर सके। इनकी सारी उम्मीदें चुनाव बाद के समीकरण पर है। कल तक तीसरे मोर्चे का भाग माने जाने वाले तेलांगना राश्ट्र समिति के प्रमुख चन्द्रशेखर राव का राजग के साथ आना तो वामदलों के लिए भी तगड़ा झटका है। राजग के नजरिए से यह शत-प्रतिशत रैली थी। इससे दोनों समूहों का तिलमिलाना स्वाभाविक है। निश्चय ही कुछ लोग इस सफलता से ध्यान हटाने के लिए भी नीतीश मोदी मिलन को मुद्दा बना रहे हैं। नीतीश तो सुिर्खयां ही इसलिए बने, क्योंकि कांग्रेस एवं वाममोर्चा दोनों ने उनकी ओर दाना डाला था। माहौल ऐसा बनाने की कोिशश की गई थी मानो नीतीश अपना सेक्यूलर चरित्र प्रमाणित करने के लिए भाजपा से अलग होने को मजबूर हो जाएंगे। माकपा नेता एवं प. बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने सार्वजनिक भाशण में यह कहा कि नीतीश से हमारी बातचीत चल रही है और वे भी भाजपा को छोड़कर आ जाएंगे। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने तो भावी साझेदारों के रुप में नीतीश का विशेश तौर पर उल्लेख किया। इस एक रैली ने इन आशाओं पर तुशारापात कर दिया। जब हमारी कामना ही गलत होगी तो उसका परिणाम मनोनुकूल कैसे आ सकता है। हालांकि सबसे बड़े समूह के रुप में होने का प्रमाण देने के बावजूद यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि इस रैली से राजग के लिए सत्ता की दावेदारी पुख्ता हो गई है। वास्तव मेें किसी को बहुमत न मिलने की संभावनाओं के बीच इससे अगली सरकार को लेकर अनिश्चय बढ़ा है। बहुमत न मिलने की स्थिति में भी यदि राजग के ये घटक अपनी घोषणा के अनुरुप एकजुट रहते हैंं तो फिर दूसरे समूहों के लिए भी बहुमत के लिए साथी कम पड़ जाएंगे। यह नहीं भूलिए कि कांग्रेस की प्रतिक्रिया काफी सधी हुई है। पहले पार्टी प्रवक्ता अभिशेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह सवाल नीतीश से ही पूछना चाहिए। कांग्रेस के दूसरे प्रवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि यह राजनीति है और लुधियाना की रैली में नीतीश का जाना अपेक्षित था। कांग्रेस और उनके पर्व साझेदारों नीतीश एवं पासवान की प्रतिक्रिया में ऐसे अंतर को समझना कठिन नहीं है। कांग्रेस चुनाव बाद के समीकरण को ध्यान में रखकर बयान दे रही है, जबकि लालू पासवान की नजर बिहार में अपने चरमराते जनाधार की ओर है।

communist politics

कामरेड, आपकी राजनीति क्या है


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) या माकपा फिर राष्ट्रीय राजनीति की धूरी बनकर उसे अपने अनुसार आकार देने की रणनीति में लगी है। माकपा नेता लगातार संदेश दे रहे हैं कि भाजपा या कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनने की कोई संभावना नहीं है। जहां तक कांग्रेस की बात है तो वे बार-बार कह रहे हैं कि वामदल किसी सूरत में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन नहीं दे सकता। जाहिर है, इसके बाद तीसरा मोर्चा ही बचता है। माकपा द्वारा तीसरा मोर्चा के नाम से इकट्ठा किए गए 10 दलों के बीच दरार पड़ चुकी है। बावजूद इसके उसका दावा है कि उसने भाजपा एवं कांग्रेस के बीच सिमटी दो ध्रुवीय राजनीति को धक्का देकर त्रिध्रुवीय बनाने में सफलता पा ली है एवं चुनाव बाद इस धु्रव के नेतृत्व में ही गैर कांग्रेस गैर भाजपा सरकार बनेगी। वास्तव में पिछले दो दशक से वाममोर्चा का नेतृत्व करने वाली माकपा की मुख्य भूमिका यहीं तक सीमित है। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन देने के साथ जो प्रक्रिया आरंभ हुई वह 1996 में संयुक्त मोर्चा के गठन के साथ परवान चढ़ी। माकपा यद्यपि संयुक्त मोर्चा का भाग नहीं थी और सरकार में शामिल नहीं हुई, लेकिन ऐसा लगता था मानो मोर्चा एवं सरकार की मुख्य नियंता वही हो। राष्ट्रीय राजनीति में उसकी हैसियत एवं अहमियत 1996 में जिस प्रकार सुस्थापित हुई उसके मनोवैज्ञानिक असर से वह कभी मुक्त नहीं हो पाई। 1998 एवं 1999 में राजग की सरकार होने के कारण सत्ता समीकरण में उसकी हैसियत नहीं थी लेकिन विपक्षी समीकरण में उसका रुतबा कायम रहा। इसका परिणाम 2004 में भाजपा विरोधी संप्रग सरकार के गठन के रुप में आया। इससे सत्ता प्रतिष्ठान में माकपा सहित शेष वामदलों की जो हैसियत थी उसे बताने की आवश्यकता नहीं है। यह उस हैसियत का ही असर था कि बार-बार कांग्रेस एवं सरकार की नीतियों से मतभेद उभरने के बावजूद उसने चार वशZ दो महीने तक अपना समर्थन बनाए रखा। माकपा अपनी नीति को जो नाम दे वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी हैसियत बनाए रखने की कोिशश कर रही है। चुनावी अंकगणित में वामदलों की ऐसी ताकत नहीं है कि वे अपनी बदौलत सत्ता या विपक्ष की दिशा-दशा निर्धारित कर सकें। पिछले 2004 के लोकसभा चुनाव में माकपा ने 19 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में कुल 69 उम्मीदवार उतारे जिनने 43 स्थानों पर विजय प्राप्त की। इसे कुल 2 करोड़ 20 लाख 70 हजार 614 मत मिले जो कि कुल मतदान का 5.66 प्रतिशत था। इसे सबसे ज्यादा मत तीन राज्यों त्रिपुरा (68.80 प्रतिशत), प. बंगाल (38.57 प्रतिशत) एवं केरल (31.52 प्रतिशत) में प्राप्त हुआ। दो प्रतिशत से ज्यादा मत केवल एक राज्य तमिलनाडु (2.87 प्रतिशत) एवं केन्द्रशासित अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह (2.71 प्रतिशत) में आया। भाकपा ने कुल 34 उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से 10 विजयी हुए। इसे कुल 54 लाख 84 हजार 111 मत प्राप्त हुए जो कि कुल मत का मात्र 1.41 प्रतिशत था। इसमें मणिपुर में एक स्थान पर उम्मीदवार खड़ा करने के कारण उसे सबसे ज्यादा 10.11 प्रतिशत मत मिला था। उसके बाद केरल के उसके चार उम्मीदवारों ने 7.89 प्रतिशत, प. बंगाल में उसके 3 उम्मीदवारों ने 4.01 प्रतिशत, झारखंड के उसके एक उम्मीदवार ने 3.80 प्रतिशत, तमिलनाडु मे उसके दोनों उम्मीदवारों ने 2.97 प्रतिशत, पंजाब में उसके एक उम्मीदवार ने 2.55प्रतिशत, गोवा के उसके दो उम्मीदवारों ने 2.17 प्रतिशत, असम में उसके एक उम्मीदवार ने 1.66 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश के उसके एक उम्मीदवार ने 1.34 प्रतिशत, बिहार में उसके छ: उम्मीदवारों ने 1.17 प्रतिशत मत पाया। जिन 15 राज्यों में उसने उम्मीदवार खड़े किए उनमें पांच राज्यों में उसे 0.50 प्रतिशत से भी कम मत मिला। ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक ने पांच राज्यों में 10 उम्मीदवार मैदान में उतारे जिनमें से 3 प. बंगाल से विजयी हुए। इसे कुल 13 लाख 65 हजार 55 मत मिले जो कि कुल मतों का 0.35 प्रतिशत था। इसे केवल प. बंगाल में ही 3.66 प्रतिशत मत मिला, अन्यथा अन्य चार राज्यों में इसे 0.25 प्रतिशत से कम मत मिले। रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने तीन राज्यों में छ: उम्मीदवार खड़ा किया जिसमें से तीन जीते। इसने कुल 16 लाख 89 हजार 794 मत पाए जो कुल मतों का 0.43 प्रतिशत था। असम और उड़ीसा में इसे सामन रुप से 0.11 प्रतिशत मत मिला। भाकपा के 34 में से 18 उम्मीदवारों के जमानत जब्त हो गए। माकपा के जमानत जब्त होने वाले प्रत्यािशयों की संखा 15 थी। वामदलों का कुल मत प्रतिशत था 7.85 प्रतिशत। इसमें करीब दो प्रतिशत मत तो उम्मीदवार खड़ा करने के कारण मिल गया। तमिलनाडु में द्रमुक गठजोड़ का भाग होने से इन्हें मत एवं जीत नसीब हुई। इस समय प. बंगाल, केरल एवं त्रिपुरा तथा झारखंड के एक क्षेत्र को छोड़कर वामदलों का मजबूत जनाधार कहीं नहीं है। इन तीनों राज्यों में कुल 78 लोकसभा स्थान हैं। इनमें झारखंड के 14 हैं। इनमें से एक हटा दीजिए तो इनका प्रभाव क्षेत्र 65 स्थानों तक सीमित है। तमिलनाडु एवं आंध्र में ये बगैर सहयोगी कुछ करने की स्थिति में भी नहीं हैं। यह तो भारतीय राजनीति की विडम्बना है कि इतने कम स्थानों पर जनाधार रखने वाले चार दलों का वामोर्चा माकपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय राजनीति की तस्वीर बदलने पर उतारु है। वैेसे इन चारों दलों में पूर्ण वैचारिक एकता भी नहीं है। फारवर्ड ब्लॉक एवं आरएसपी तो माकपा के खिलाफ प. बंगाल में ऐसे अनेक आंदोलनों की अगुवाई कर रही है जैसा विपक्ष शासक दल के खिलाफ करता है। इनके बीच हत्या तक के दर्जनों मुकदमे चल रहे हैं। 2004 इनके लिए चुनावी सफलताओं का ऐतिहासिक वर्ष था। इसने 59 स्थानों पर विजय प्राप्त किया। जिस नीति पर ये चल रहे हैं उसमें इनकी सीटों एवं मतोें में और कमी ही आनी है। सारे आकलन 2009 के चुनावों में इनकी सीटों में कमी के संकेत दे रहे हैं। राश्ट्रीय राजनीति की जोड़तोड़ में उलझे रहने के कारण प. बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल ने इनके जनाधार को दरका दिया है। तो सीमित जनाधार और उसमें भी साफ दिख रहा क्षरण, अपने मोर्चे के भीतर उग्र द्वंद्व, यह इस समय वाममोर्चा की वस्तुस्थिति है। ऐसा लगता है कि सत्ता एवं विपक्ष की इस राजनीति में उलझे रहने के कारण वे अपना मूल राजनीतिक लक्ष्य भी हािशए में धकेल चुके हैं। आर्थिक एवं सामाजिक समानता के लिए वाममोर्चा का कोई आंदोलन अभियान आपको दिखाई नहीं देगा। माकपा सहित वामदल इस वैचारिक क्षरण को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं तो इसे विडम्बना ही कहा जाएगा। राश्ट्रीय राजनीति की हैसियत भी संख्याबल पर निर्भर करता है। संख्याबल के अभाव में ही वामदल ऐसे दलों का कुनबा खड़ा करने की कोिशश करते हैं जिनकी कोई राजनैतिक नैतिकता या नििश्चत राजनीतिक विचारधारा नहीं है। उनकी आर्थिक विचारधारा तक वामदलों के बिल्कुल उलट हैं। आखिर चन्द्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, मायावती, देवेगौड़ा, जयललिता..आदि की आर्थिक एवं सामाजिक नीतियां वामदलोंं की मूल सोच से कैसे मेल खा सकती है? ऐसी ओैर भी बातें हैं जो वामदलों के प्रयासों को सिद्धांतहीन सिद्ध करती हैं। फिर ऐसे प्रयोगों में राजनीतिक अस्थिरता अवश्यंभावी रुप से निहित हो जाता है। कांग्रेस एवं भाजपा को परे रखकर किसी सरकार के गठन का अर्थ ही है उसका असमय पतन। इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि कामरेड, आपकी राजनीति क्या है? आप देश की राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

BJP Jately Rajnath on Mittal

यह आडवाणी के बाद कौन की लड़ाई है

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के अशोक मार्ग स्थित आवास से अरुण जेटली के निकलते और दोनों को हाथ मिलाते देखकर किसी को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि इनके बीच वाकई मेल-मिलाप हो गया। वास्तव में जिन मूल कारणों से द्वंद्व बढ़ा और सार्वजनिक सतह पर आया उसमें मेल-मिलाप की संभावना पैदा करने के लिए पार्टी के व्यवहार और उसकी आंतरिक संरचना में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। मीडिया की सुिर्खयां बनते रहने के बावजूद यदि अरुण जेटली केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठकों में आने के लिए तैयार नहीं हुए तो यह कोई मामूली मतभेद नहीं हो सकता। आखिर जेटली को इतनी समझ तो है ही कि इससे देश भर में गलत संदेश जा रहा है और इसका असर चुनावी प्रदशZन पर पड़ सकता है। बावजूद इसके उनका अख्खड़ बना रहना इस बात का प्रमाण है कि पार्टी के ‘ाीशZतम व्यक्तित्वों के बीच निजी स्तर पर एक दूसरे के प्रति कितना द्वेश है। वास्तव में सतह पर भले तनाव की जड़ केवल सुधांशु मित्तल दिखाई देते रहे और तात्कालिक कारण यह बना भी किंतु भाजपा का अंदरुनी संकट और दूसरी पीढ़ी के नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा ही इस बहाने ‘ार्मनाक तरीके से सामने आया है।कहा जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष ने सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का प्रभारी बनने से पहले जेटली को विश्वास में नहीं लिया, अन्यथा ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती। किंतु जेटली मित्तल के नाम पर कभी तैयार नहीं होते। स्व. प्रमोद महाजन के नजदीकी होने के कारण मित्तल के व्यवहार को जेटली ने कभी पसंद नहीं किया। हालांकि राजनाथ सिंह ने उन्हें पूर्वोत्तर का प्रभारी बनाने के लिए लालकृश्ण आडवाणी की सहमति प्राप्त कर ली। राजनाथ के लिए यह ऐसा संबल है जिसकी बदौलत वे जेटली के समर्थन में मीडिया द्वारा बनाई जा रही हवा का सामना करते रहे। यदि जेटली मीडिया के कुछ बड़े नामोंं के पंसदीदा चेहरा नहीं होते तो मामला इतना तूल नहीं पकड़ता। छात्र नेता के रुप में जेटली कभी धरातल से जुड़े रहे होंगे, लेकिन पिछले एक दशक से वे भाजपा में यदि ‘ाीशZ स्तर पर हैं तो इसमें मीडिया संबंधों का महत्वपूर्ण योगदान है। जेटली ही क्यों, रविशंकर प्रसाद जैसे नेता भी इसी श्रेणी के हैं। इन्हें पार्टी में इनके विरोधी चैनल ब्वॉय कहते हैं। मीडिया में प्रतिदिन दिखने के कारण इनका कद इतना बड़ा हो गया है कि इनसे सीधे टकराने की हिम्मत कोई जुटा नहीं पाता। क्या जेटली का केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक में न जाना इतनी बड़ी घटना थी जिसे लगातार देशवासियों को अवगत कराया जाना चाहिए था? जेटली से ज्यादा इस लड़ाई को उनके मीडिया के मित्र लड़ रहे थे। इन लोगोंं ने उन्हें चुनाव का `की स्ट्रेटेजिस्ट´ बना दिया है। जेटली या उन जैसे लोगोंे की चुनाव प्रबंधन में उपयोगिता को कोई नकार नहीं सकता, लेकिन यह गलतफहमी किसी को नहीं होनी चाहिए कि केवल पीछे के प्रबंधन और रणनीति से चुनाव जीता जा सकता है। ऐसा होता तो 2004 का चुनाव भाजपा नहीं हारती। किंतु भाजपा जैसी पार्टी का दुर्भाग्य यह है कि केन्द्रीय स्तर पर उसके जो नेता दिखते हैं उनमें ज्यादातर नेपथ्य प्रबंधन एवं रणनीति के ही तथाकथित विशेशज्ञ है। गांवों, गली-कूचों की राजनीति से रिश्ता न होने और उस राजनीति से सीधा संबंधित होने वाले नेताओं की अनुपस्थिति मेें ये अपने को ही पार्टी का नियंता मान चुके हैं। अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए अपने विश्वास के लोगों को आगे बढ़ाने की होड़ चल रही है। इसमें कोई पार्टी या देश की नहीं सोचता। बस, अपनी ताकत बनाए रखने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही है। सबके सामने आडवाणी के बाद कौन का प्रश्न है। चुनाव के बाद अध्यक्ष का भी निर्वाचन होना है। सब इसकी तैयारी कर रहे हैं। इन्हें लगता है कि पार्टी में पदों पर जितने ज्यादा लोग अपने होंगे उतनी ही इनकी दावेदारी मजबूत होगी। इसलिए गलत-सही की चिंता किए बगैर जहां भी खाली जगह है वहां अपने लोगों को बिठा देने की कोशिश चल रही है। इससे कोई वंचित नहीं है। राजनाथ सिंह से लेकर वेंकैया नायडू, सुशमा स्वराज...सब इसमें ‘ाामिल हैं। ‘ाह-मात का खेल चल रहा है। उमा भारती इसी दांव मेें राजनाथ सिंह के लिए जेटली के विरुद्ध प्रबल हथियार बनकर सामने आ गईं। अगर विवाद नहीं होता तो आडवाणी को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन वाला उमा भारती का पत्र राजनाथ स्वयं सार्वजनिक तौर पर पढ़कर उनका ‘ाुक्रिया अदा नहीं करते। उमा का नाम ही अरुण जेटली के साथ कईयों की की धड़कन बढ़ानेवाला है। उनके पार्टी में आगमन की आशंका से ही इनकी नींद उड़ जाती है। कल्पपा करिए, उमा भारती के संबंध में राजनाथ का बयान, उनका स्वयं दो बार आडवाणी से मिलना, फिर पत्रकार सम्मेलन बुलाकर अरुण जेटली से पुराने गिले-शिकवे भुलाकर आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए मिलकर काम करने का उमा का अनुरोध...आदि ‘ाह-मात का दांव ही तो है। प्रदेश स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी इस स्थिति को समझ लिया है, इसलिए वे भी किसी एक नेता को संरक्षक बनाकर काम करने के लिए इनकी जी हुजूरी करते हैं। विचारधारा और बड़े लक्ष्यों से दूर हो जानेवाली पार्टी की ऐसी ही दुश्परिणति होती है। बहरहाल, भाजपा में कुछ लोगों को इस बात की प्रसन्नता है कि राजनाथ सिंह ने दिल्ली के सत्ता-मीडिया-बुद्धिजीवियों-सोशियलाईट के प्रतिनिधि की इच्छा के विपरीत जाने और उसकी नाराजगी के बावजूद खडा़ रहने का साहस तो दिखाया। गांवों एवं छोटे ‘ाहरों-कस्बों की लंबे समय से राजनीति करने वाले इससे प्रसन्न हैं। किंतु कुछ लोग कहते हैं कि राजनाथ जिस व्यक्ति के लिए अड़े उसका व्यक्तित्व कैसा है? संसदीय राजनीति में पार्टी की स्थिति का आकलन करने वाले अफसोस जताते हैंं कि काश,जेटली पार्टी के ‘ाहरी चेहरे तथा राजनाथ ग्रामीण चेहरे के तौर पर संगठित रहते तो इसका लाभ मिलता। इन नेताओं ने भाजपा को जिस अवस्था में ला दिया है उसमें ऐसे प्रश्न ही बेमानी हैं। विचारधारा से परे जाकर पार्टी और देश के ऊपर निजी स्वार्थ आच्छादित करने के कारण भाजपा गहरे संकट में धंस चुकी है। अगर भाजपा विचारधारा से आबद्ध बड़े लक्ष्यों के लिए सक्रिय होती तो उसका नेतृत्व भी वैसे ही लोगों के हाथों आता और किसी पद पर नियुक्त किए जाने का कोई मापदंड भी होता। इस समय कौन लोग पार्टी चला रहे हैं? कुछ नाम सामने हैं, लेकिन कुछ पर्दे के पीछे हैं और उनकी भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण है। जिन्ना प्रकरण के बाद सुधीन्द्र कुलकणीZ ने पार्टी के सचिव पद से त्यागपत्र दे दिया था, पर आडवाणी के साथ काम करते रहे और अभी आडवाणी के नाम पर समानांतर पार्टी चला रहे हैं। उनके साथ एक और पत्रकार हैं। ये दोनों भाजपा को क्या दिशा देंगे? फिर दूसरे नेताओं-कार्यकर्ताअों पर इसका कितना उल्टा असर हुआ है और इससे संदेश क्या गया है? पार्टी के लोग ही कहते हैं कि सुधांशु त्रिवेदी की सलाह पर अध्यक्ष जी एवं कुलकणीZ की सलाह के अनुसार आडवाणी अपना रुख तय कर रहे हैं। इन कारणों से भाजपा में सच्चे नेतृत्व वाले व्यक्तिव के लाले पड़ गए हैं। वाजपेयी जीवन के अंतिम दौर में सक्रिय राजनीति से दूर हैं। आडवाणी के कद का भी कोई दूसरा व्यक्ति भाजपा में नहीं है जिसकी जनता के बीच में भी पहचान हो। भाजपा के नेता बने लोग चाहे जितना दंभ करें, इनमें से ज्यादातर की आम जन के बीच कोई कद नहीं है। सुशमा स्वराज को जन नेत्री कहा जाता है। जन नेत्री को विदीशा जैसा सुरक्षित सीट क्यों चाहिए? हालांकि इस अवस्था के लिए आडवाणी एवं वाजपेयी ही दोशी हैं, लेकिन अब तो यही पार्टी की दशा है। राजनाथ बनाम जेटली बनाम नायडू बनाम नरेन्द्र मोदी बनाम सुशमा बनाम..पता नहीं इस सिलसिले में पार्टी की क्या दशा होगी। संसदीय लोकतंत्र में एक प्रमुख पार्टी की ऐसी दुर्दशा देश के लिए चिंताजनक है।

lok sabha election UPA divided in Tamilnadu

तमिलनाडु में यूपीए बिखराव राष्ट्रीय निहितार्थ बहुत बड़ा है
संप्रग वाकई बिखर गया है। चुनाव की घोषणा के बाद ऐसा लग रहा था कि संप्रग एकजुट होकर मैदान में उतरेगा। लेकिन पहले उत्तर प्रदेश में सपा कांग्रेस के बीच सीटों पर तालमेल न हो सका, उसके बाद बिहार का नंबर आया, फिर झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ लंबी बातचीत के बाद बना-बनाया गठजोड़ दरक गया और अब तमिलनाडु में पीएमके छिटक गया। इनमें पीएमके का बिखरना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि यह अब संप्रग से बाहर चला गया है। शेश पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ते हुए भी स्वयं को कांग्रेस नेतृत्व वाले संप्रग का घटक कह रही है। ये न कांग्रेस की आलोचना कर रहे हैं और न प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की। इस समय की परिस्थितियों में ऐसा लगता भी है कि ये चुनाव के बाद संप्रग में ही बने रहेंगे। हां, यदि चुनाव परिणाम कंाग्रेस के लिए प्रतिकूल रहा तो ये क्या करेंगे कहना कठिन है। किंतु इस समय ये केवल चुनाव अलग लड़ रहे हैं, कांग्रेस या संप्रग से इनका स्थायी विलगाव नहीं हुआ है। इसके समानांतर पीएमके का अन्नाद्रमुक के साथ जाना राश्ट्रीय स्तर पर संप्रग के लिए बहुत बड़ी क्षति है। जयललिता यद्यपि अभी तक स्वयं तीसरे मोर्चे के सम्मेलन में नहीं गईं, लेकिन उन्होंने अपने प्रतिनिधि को भेजकर भावी राजनीतिक दिशा का संकेत दे दिया। हालांकि एक समय उन्होंने कांग्रेस के नेताओं से अपने रिश्ते की बात कहते हुए उसे द्रमुक से अलग होने का भी सुझाव दिया, किंतु कांग्रेस ने द्रमुक के साथ दृढ़ता से बने रहने का बयान दे दिया। वस्तुत: जयललिता इस समय कांग्रेस विरोधी खेमे की अंग हैं यह मानने में कोई संकोच नहीं है।वैसे पीएमके का तमिलनाडु के अन्नाद्रमुक गठजोड़ में जाना बिल्कुल तय था। पिछले साल ही पीएमके प्रदेश मेे द्रमुक नेतृत्व वाले गठजोड़ से अलग हो चुकी थी। हां, केन्द्र सरकार में वह बनी हुई थी। स्वयं करुणानिधि ने भी कह दिया था कि अगर वह केन्द्र सरकार में बनी रहती है तो इससे उन्हें कोई समस्या नहीं है। केन्द्र की मजबूरी थी कि पांच लोकसभा सदस्यों वाले पीएमके को वह अलग नहीं कर सकती थी। खासकर वामदलोें द्वारा समर्थन वापसी के बाद जहां एक-एक सांसद का महत्व बढ़ गया था उसके लिए किसी प्रकार का जोखिम उठाना संभव ही नहीं था। इस प्रकार पीएमके के अंबुमणि रामदोस को मंत्री बनाए रखना उसकी मजबूरी थी। कहा जा सकता है कि पीएमके को भी केवल चुनाव की प्रतीक्षा थी एवं अन्नाद्रमुक की जयललिता द्वारा लोकसभा चुनाव में सात स्थान एवं एक राज्य सभा सीट के साथ समझौता हो गया। अन्नाद्रमुक और पीएमके का साथ आना दोनों के लिए लाभकारी है। अन्नाद्रमुक अगर तमिलनाडु के दक्षिण में मजबूत है तो पीएमके का उत्तर एवं मध्य में जनाधार है। वनियार समुदाय का इसका आधार ऐसा है जिसका लाभ अन्नाद्रमुक को मिल सकता है। इस परिवर्तन के बाद तमिलनाडु में अब संप्रग के रुप में केवल द्रमुक एवं कांग्रेस है। तमिलनाडु में 2004 को लोकसभा चुनाव पूरी तरह द्रमुक नेतृत्व वाले संप्रग के पक्ष में गया था। उसने सभी 39 स्थानों पर कब्जा कर लिया था। अन्नाद्रमुक की बुरी पराजय हुई एवं उसे एक भी स्थान नहीं मिला था। तब द्रमुक नेतृत्व वाले संप्रग में कांग्रेस, एमडीएमके, पीएमके, भाकपा एवं माकपा शामिल थी। यह अन्नाद्रमुक के खिलाफ एक व्यापक गठजोड़ था। द्रमुक ने 24.60 प्रतिशत एवं 16 स्थान, कांग्रेस ने 14.40 प्रतिशत मत एवं 10 स्थान, पीएमके ने 6.71 प्रतिशत मत एवं पंाच स्थान, एमडीएमके ने 5.85 प्रतिशत मत एवं चार स्थान, भाकपा ने 2.97 प्रतिशत मत एवं दो स्थान तथा माकपा ने 2.87 प्रतिशत मत एवं दो स्थान पाए थे। यानी इस गठजोड़ ने कुल 57.40 प्रतिशत मत प्राप्त किया। साफ है कि इनकी एकता के कारण इनके मताधार का भी धु्रवीकरण हुआ था। ऐसे ध्रुवीकरण के बाद अन्नाद्रमुक-भाजपा का सूपड़ा साफ होना ही था। अन्नाद्रमुक को केवल 29.77 प्रतिशत मत मिल तो भाजपा ने 5.07 प्रतिशत मत पाए। यानी कुल 34.84 प्रतिशत। इस प्रकार द्रमुक गठजोड़ 22.56 प्रतिशत के भारी अंतर से आगे था। लेकिन विधानसभ चुनाव में स्थिति काफी बदली। द्रमुक नेतृत्व वाले गठजोड़ को 234 में से 163 स्थान मिला तो जयललिता के नेतृत्व वाले गठजोड़ ने भी 61 स्थानों पर जीत दर्ज करा ली। एमडीएमके उस समय द्रमुक गठजोड़ में नहीं, बल्कि अन्नाद्रमुक के साथ था। इसने छ: तथा दलित पैंथर्स ने दो स्थान जीते। 234 सीटों वाले विधानसभा में द्रमुक को केवल 96 स्थान मिले जो कि बहुमत से 22 कम हैं। यानी लोकसभा चुनाव का माहौल बदल चुका था एवं दोनोेंं समूहों के बीच संघशZ काफी निकट का था। मतों की गणना यह बताती है कि विधानसभा चुनाव में केवल 4.75 प्रतिशत मतों के अंतर ने समीकरण बदला। द्रमुक गठजोड़ को 44.58 प्रतिशत तथा अन्नाद्रमुक गठजोड़ को 39.83 प्रतिशत मत आए। कहां 22.56 प्रतिशत और कहां 4.75 प्रतिशत। जाहिर है, पीएमके के निकलने के बाद मतों के मामले यह गठजोड़ आगे निकल चुका है।वास्तव में तमिलनाडु का राजनीतिक परिदृश्य काफी रोचक हो गया है। एमडीएमके किसी गठजोड़ में शामिल नहीं है। एमडीएमके, पीएमके, माकपा एवं भाकपा का लोकसभा चुनाव अनुसार कुल 18.40 प्रतिशत मत घट जाने तथा इसमें पीएमके का मत अन्नाद्रमुक के साथ जुड़ जाने से इसका पलड़ा भारी लगता है। विधानसभा चुनाव में प्राप्त मतों को आधार बनाकर अन्नाद्रमुक मेें पीएमके का मत जोड़ दें तो यह 46.56 प्रतिशत हो जाता है जो कि द्रमुक गठजोड़ से 7.56 प्रतिशत ज्यादा है। इसका असर पड़ना तय है। अभिनेता विजयकांत की पार्टी देसिया मुर्पोक्कु द्रविदर कजगम यानी डीएमडीके भी चुनाव मैदान मेें है। उसने विधानसभा चुनाव में पहली बार अपनी ताकत का परीक्षण किया एवं उसे 8.33 प्रतिशत मत मिला। अगर विजयकांत जयललिता वाले गठजोड़ में शामिल हो जाते तो विधानसभा चुनाव का परिणाम बदल जाता। इसकी बढ़त हो जाती। हालांकि विजयकांत की पार्टी पुन: सबसे अलग है। लोकसभा चुनाव में इसके प्रति जनता का रुख क्या होगा कहना कठिन है, किंतु विजयकांत भी शासन के खिलाफ असंतोश को ज्यादा हवा देने की कोिशश कर रहे हैं। केन्द्र एवं प्रदेश दोनों सरकारों के सत्ता विरोधी रुझान भी चुनाव में अपनी भूमिका निभाएंगे। एमडीएमके अपने प्रभावक्षेत्र में वैसे दोनों का मत काटेगा लेकिन इसमें द्रमुक का हिस्सा ज्यादा होगा। उसके नेता वाइको श्रीलंका सरकार के खिलाफ एवं लिट्टे के पक्ष मेंं जो अभियान चला रहे हैं वह केन्द्र एवं प्रदेश सरकार के भी विरुद्ध है। जाहिर है, इनकी ओर जो मत आएगा उसमें इनका बड़ा भाग शामिल होगा। पीएमके यदि द्रमुक के साथ रहती तो शायद ये कारक कुछ हद तक संतुलित होते। किंतु उसका अन्नाद्रमुक के साथ जाना संतुलन को भी मोड़ने वाला साबित हो सकता है। तमिलनाडु में संप्रग यदि चुनावी अंकगणित में फिसली, जिसकी संभावना बढ़ गई है तो इससे संसद में संप्रग का अंकगणित बुरी तरह गड़बड़ा जाएगा।

बुधवार, 28 जनवरी 2009

Former President Venkataraman dead

वेंकटरमन के रुप में एक विरासत का अंत
पूर्व राश्ट्रपति आर. वेंकटमरन का 98 वें वशZ में निधन वैसे तो स्वाभाविक घटना है, लेकिन उनके साथ भारतीय आजादी के आंदोलन से लेकर संविधान निर्माण में सक्रिय एक ऐसी विरासत का अंत हुआ है जिसने एक आदशZ भारतीय राश्ट्र-राज्य की कल्पना के साथ राजनीति में कदम रखा। भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में यह ऐसी विरासत है जो एक-एक कर समाप्त होती जा रही है। ढूंढने से भी अब ऐसे व्यक्तित्व का मिलना कठिन है। किंतु सोचने वाली बात है कि जुलाई 1992 में राश्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद देश में उनकी क्या उपयोगिता थी! आखिर संविधान सभा के कितने सदस्य इस समय देश में जीवित बचे हैं? एक व्यक्ति जो उस पीढ़ी से निकलकर प्रदेश एवं देश की स्वातंत्र्योत्तर राजनीति में सक्रिय रहा, जो योजना आयोग के उपाध्यक्ष, वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री एवं उप राश्ट्रपति पद को सुशोभित करते हुए राश्ट्रपति पद तक पहुंचा हो उसकी तो देश को ज्यादा जरुरत होनी चाहिए थी। राश्ट्रपति की जिम्मेवारी से मुक्त होने के बाद सत्ता या दलीय राजनीति में सक्रिमया यथेश्ट नहीं हो सकती लेकिन राजनीति ऐसे व्यक्ति के अनुभवों और दृिश्टकोणों का लाभ न ले पाए इससे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है? खासकर देश पिछले डेढ़ दशकों से ज्यादा समय से जिन संवैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामजिक और सभ्यतागत प्रश्नों का सामना कर रहा है उसमें वेंकटरमन जैसे व्यक्तित्व से मार्ग दशZन पाने की कहीं ज्यादा जरुरत थी। किंतु हमारे राजनीति के कर्णधारों के पास इसकी फुरसत कहां कि उनसे मार्गदशZन पाने की कोिशश करे। ये तो स्वयं ही सर्वज्ञ हैं। वेंकटरमन ऐसे समय राश्ट्रपति बने जब तत्कालीन राश्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह एवं प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच मनभेद सार्वजनिक हो चुका था। कई प्रकार की अफवाहें सत्ता के गलियारों में प्रतिदिन उड़तीं रहतीं थी। वेंकटरमन के आने के साथ ही अफवाहें बंद हुईं और प्रधानमंत्री कार्यालय एवं राश्ट्रपति भवन के बीच परंपरागत संतुलन कायम हुआ। उनके राश्ट्रपति बनने के साथ ही एक दल के बहुमत का दौर समाप्त होने लगा था। उन्हें चार प्रधानमंत्रियों को शपथ दिलवानी पड़ी लेकिन वे विवादों में नहीं फंसे। 1989 के चुनाव में कांग्रेस को बहुमत न होते हुए भी उन्होंने राजीव गांधी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जो सबसे बड़े दल के नेता को पहले बुलाने की परंपरा का निर्वाह था। उनके इन्कार करने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह को शपथ दिलवाई। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने देश की दशा एवं राजनीतिक विखंडन को देखते हुए राश्ट्रीय सरकार बनाने की अपील की। आज पूरा देश यह महसूस कर रहा है कि अगर कोई राश्ट्रीय सरकार बन जाए तो मुंह बाए चुनौतियों से आसानी से निपटा जा सकेगा। बाद में उन्होंने संविधान की समीक्षा कर इसे समयानुसार नया स्वरुप देने की भी वकालत की। एक संविधान सभा के सदस्य द्वारा संविधान की समीक्षा एवं उसमें बदलाव की मांग को जितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए न लेना कतई उचित नहीं था।

Sri Ram Sena attacks pub

यह कैसा आचरण
श्रीराम सेना का तरीका गलत लेकिन मुद्दा सही है
कर्नाटक पुलिस ने पब में लड़कियों-महिलाअों पर हमला करने वाले श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं को गिरतार कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई ‘ाुरु कर दिया है। प्रदेश के गृहमंत्री ने भी निश्पक्ष कार्रवाई का बयान दिया है। किसी भी मामले में कानून अपने हाथ में लेने का समर्थन नहीं किया जा सकता। खासकर हिंसक तरीके से किए किए विरोध का संदेश काफी नकारात्मक जाता है भले कारण कितना भी वाजिब क्यों न हो। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गलत तरीके से विरोध करने मात्र से वह कारण सही हो गया। यह मामला पब में लड़कियों के शराब पीने का है। प्रश्न किया जा सकता है कि जब पब में पुरुशों के शराब पीने पर पाबंदी नहीं है तो महिलाओं पर क्यों होनी चाहिए? आखिर हमारा संविधान एवं कानून पुरुश महिला के बीच भेद नहीं करता। एक पब के लिए दोनों उपभोक्ता हैं और जब सरकार ने लाइसेंस दिया है तो उसके ग्राहकों को रोकने का अर्थ एक मान्य व्यवसाय के रास्ते आपराधिक तरीके से बाधा खड़ी करना है। जितनी कम संख्या में ग्राहक वहां जाएंगे व्यापार उतना ही कमजोर होगा एवं सरकार को कर भी उसी अनुपात में कम मिलेंगे। इस दृिश्ट से विचार करने वाले यह मानेंगे कि श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं ने वाकई अपराध किया है और उन्हें उसकी सजा मिलनी चाहिए। किंतु यहां श्रीराम सेना को कुछ समय के लिए गौण कर इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखिए। महात्मा गांधी से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे मनीशियों ने भारत को शराब मुक्त देश बनाने की कल्न्पना की थी। वे जिस महान और आदशZ भारत की कल्पना करते थे उसमें नशा, पशु हत्या आदि का कोई स्थान नहीं था। उस समय से आज तक देश में शराबबंदी आंदोलन किसी न किसी स्तर पर चल रहा है। क्या यह सत्य नहीं है कि भारत में बहुसंख्य हिसंक अपराधों के पीछे शराब की भूमिका है? यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्वयं लड़किया-महिलाएं कई बार शराब की पार्टी के बाद दुश्कर्म का िशकार होती हैं। अगर शराब इतना ही स्वीकृत पेय है तो फिर शराब पीकर गाड़ी चलाने को क्यों अपराध माना जाता है? इसके खिलाफ क्यों प्रचार किया जाता है? कोई शराब पीकर यदि सार्वजनिक स्थान पर उन्मुक्त व्यवहार करने लगे तो हम-आप क्या करेंगे? या फिर प्रशासन वहां क्या करेगा? क्या लैेंिंगक समानता का अर्थ पुरुशों की तरह ही लड़कियों का शराब पीना है? हम यह भूल रहे हैं कि घर में शराब के कारण सबसे ज्यादा संकट महिलाओं पर ही आती है। जिन राज्यों में शराब की दूकाने या ठेके बंद होने के विरुद्ध आंदोलन व्यापक हुआ उनमें महिलाओं की ही संख्या सर्वाधिक रही है। श्रीराम सेना ने जिस तरीके से विरोध किया वह गलत था। अगर किसी को लगता है कि शराब पीना उसका अधिकार है तो लोकतंत्र में यही अधिकार उसका विरोध करने वालों को भी है। हां, यह विरोधी पूरी तरह अहिंसक होना चाहिए। ऐसे विरोध की नैतिक शक्ति भी अधिक होती है।

श्री

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

अब विप्रो प्रतिबंधित
सत्यम् के बाद देश की तीसरी बड़ी सॉटवेयर कंपनी विप्रो के साथ तीन अन्य कंपनियों मेगासॉट कंसलटेंट्स, नेक्टर फर्मास्यूटिकल्स, गैप इंटरनेशनल एवं एक व्यक्ति को विश्व बैंक द्वारा प्रतिबंधित करने पर भारतीय उद्योग जगत में खलबलाहट देखी जा रही है। कुछ लोगों ने विश्व बैंक को ही निशाने पर ले लिया है। अपने कर्मचारियों को कंपनी के शेयर खरीदने का विकल्प देकर भारत मेेंं नई कॉरपोरेट संस्कृति की अग्रदूत बनी विप्रो की छवि एक पारदशीZ एवं कार्यकुशल कंपनी की है। विश्व बैंक के कर्मचारियों को अनुचित लाभ देने के आरोप से निश्चय ही विप्रो की छवि पर बट्टा लगा है। सत्यम पर भी यह आरोप था। उद्योग संगठनों द्वारा आगे आकर दुनिया भर में भारतीय कंपनियों की बिगड़ती छवि को बचाने की कोिशश स्वाभाविक है। संभव है विश्व बैंक के इस कदम के पीछे भारतीय एवं अंतरराश्ट्रीय कॉरपोरट घरानों की प्रतिस्पर्धा हो, या फिर स्वयं विश्व बैंक की अुदरुनी लड़ाई का भी यह परिणाम हो। विप्रो ने अपने बयान मेंं इसे महत्व न देते हुए कहा है कि विश्व बैंक के साथ उसका कारोबार इतना छोटा है कि इससे कोई अंतर नहीं आएगा। मेगासॉट ने भी 2004 से विश्व बैंक के साथ कोई कारोबार न होने का बयान दिया है। ये बातें अपनी जगह ठीक हैं। किंतु हम जानते हैं कि व्यापार की दुनिया में विश्व बैंक का क्लाइंट होने मात्र से कंपनी के प्रोफाइल की कद बढ़ जाती है। यह नहीं भूलना चाहिए कि विप्रो पर प्रतिबंध जून 2007 में लगाया गया जिसकी जानकारी कंपनी छिपाए रखी। क्यों? एक कर्मचारी को 72 हजार डॉलर के 1750 शेयर कंपनी के मिले यह सत्य है। यह बात अलग है कि विप्रो इसे कंपनी नियमों के अनुरुप बता रही है। यह नजरिए का अंतर है। आश्चर्य की बात है कि भारत में आम भ्रश्टाचार की बात स्वीकारने वाले भी विश्व बैंक के कदम पर आंखे तरेड़ते हुए विप्रो सहित भारतीय कंपनियों को सत्यनिश्ठ एवं ईमानदार साबित करने पर तुले हैं। कौन सी कंपनी है जो अपना काम निकालने के लिए घूस नहीं देती है। भारत में नीचे से ऊपर तक हर कंपनियों के हर काम के लिए घूस की रकम तय है। क्या यह संभव है कि हमारी जो कंपनियां अपने देश में अनुचित लाभ पहुंचाकर अपना काम निकलवाती हैं वो विदेशों मेंं ऐसा करने से परहेज करती होंगी। कॉरपोरेट के साथ जो ऊपरी चमक-दमक दिखती है उसके अंदर उतना ही कालिख है। इसमें हमें-आपको पड़ने की आवश्यकता नहीं है। हम यह भूल रहे हैं कि विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष पॉल वोल्फोवित्ज को वित्तीय अनियमितता के कारण पद से हटना पड़ा, भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद व्यापक जांच पड़ताल हुई जिनमें ऐसी अनेक अनियमितताएं सामने आईं। यह कहना भी गलत है कि केवल भारत की कंपनियां ही प्रतिबंधित हो रही हैं। अमेरिका,ब्रिटेन, रुस, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, इंडोनेिशया की कंपनियां भी विश्व प्रतिबंध के दायरे में आईं हैं।
राजू की गिरफ्तारी से आगे
सत्यम् कम्प्युटर्स के संस्थापक बी रामलिंग राजू और उनके भाई रामा राजू को हिरासत में लेने के अलावा कानूनी एजेंसियों के पास कोई विकल्प नहीं था। जो व्यक्ति स्वयं यह स्वीकार कर रहा हो कि वह बाजार में अपना वैल्यू बनाए रखने के लिए अपनी आमदनी के गलत आंकड़े प्रस्तुत कर रहा था उसे यूं ही छोड़ा नहीं जा सकता। इसमें आम निवेशकों का कितना धन डूबा और सत्यम ने झूठ और फरेब के बल पर कितना माल बाजार से प्राप्त किया इसका वास्तविक हिंसाब मिलने में समय लगेगा। सरकार ने सत्यम के निदेशक मंडल को भंग कर नया निदेशक मंडल नियुक्त करने का फैसला किया है। कई स्तरों से जांच शुरु हो गई है। जाहिर है, अगले कुछ दिनों में सत्यम का वास्तविक जुगुप्सापूर्ण चेहरा ज्यादा खुलकर हमारे सामने होगा। लेकिन सत्यम का मामला केवल गिरतारी एवं जांच तक ही सीमित नहीं है। इसके साथ नए दौर में व्यापार, रोजगार आदि के कई अहम् प्रश्न जुड़े हैं। भारत में ऐसे लोगों की तादाद बहुत बड़ी है जो यह मानते हैं कॉरपोरेट जगत में खातों की ऐसी हेराफेरी करके अरबों रुपयों के घपले हो रहे हैं। आखिर सॉटवेयर कंपनियों में घाटे या मंदी का असर अकेले सत्यम पर तो नहीं होगा। इसलिए केवल सत्यम नहीं, अन्य कंपनियों के खातों की गहरी निगरानी एवं छानबीन का कुशल तंत्र तुरत सक्रिय होना चाहिए। सत्यम के फरेब के बाद सरकार कह रही है कि इससे भारतीय कंपनियों की विश्व बाजार में साख धूमिल हुई है। इसके पहले सत्यम् को भारतीय कपंनियों में नगीना के तौर पर पेश किया जाता रहा है। भूमंडलीकरण के बाद कंपनियों के लिए अपने व्यापार के साथ विश्व बाजार में अपनी सशक्त छवि बनाए रखने की विवशता उत्पन्न हो गई है। इस विवशता में कंपनियां शेयर बाजारों में अपनी कीमत ऊंची रखने के लिए कई प्रकार के तिकड़म करने को मजबूर भी होतीं हैं। क्या कोई ऐसा रास्ता निकल सकता है जिससे कंपनियां ऐसी मजबूरी से मुक्त हो सकें? वह अपने मूल व्यापार तक सीमित रहे तो ऐसी नौबत नहीं आएगी। तीसरे, नए दौर में चकाचौंध, चमचमाहट और अपने कर्मचारियों के वेतन-भत्ते अन्यों से बेहतर देने की भी होड़ चली है। इसके आधार पर भी कंपनियों की रैंकिंग होती है। हालंाकि इसका लाभ सभी कर्मचारियों को नहीं मिलता, लेकिन इसमें कपंनियों का खर्च औकात से ज्यादा होने लगता है। जब खर्च और आय के बीच संतुलन नहीं होगा तो ऐसी ही दुर्दशा होगी जैसी सत्यम की हुई है। चौथे, देश में ऐसे चार्टर्ड आकाउंटेड फर्म हैं जो कंपनियों की इच्छा के मुातबिक उनका बैलेंस शीट बना देतीं हैं। आईसीएआई ने सत्यम् मामले में ऑडिट फर्म प्राइसवाटर हाउसकूपर्स को सत्यम् मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इसमें जिन लोगों ने सत्यम् का अंकेक्षण किया उनको भले सजा मिल जाएगी, जिसका अत्यंत ही सीमित असर होगा। सरकार को अपनी कर नीति पर भी विचार करने की जरुरत है कि आखिर कोई कंपनी या व्यक्ति गलत बैलेंस शीट बनाने को मजबूर क्यों होता है।
सत्यम या असत्यम
भारत की चौथी एवं दुनिया की प्रमुख सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी में शुमार होनेवाली सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज की ऐसी दुर्दशा की कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी। लेकिन जब कंपनी के प्रोमोटर एवं प्रबंध निदेशक रामलिंगा राजू स्वयं बोर्ड को लिखे 7 जनवरी 2009 के पत्र में यह स्वीकार कर चुके हैं कि पिछले सितंबर में उन्होने बिक्री एवं मुनाफे के जो आंकड़े दिए वे झूठे हैं तो फिर सामान्य तौर पर किसी के लिए कुछ कहने को रह ही नहीं जाता। राजू की स्वीकारोक्ति अचंभित करने वाली है। क्या यह सोचा भी जा सकता है कि बैलेंस शीट में से पांच हजार करोड़ रुपया कंपनी के पास था ही नहीं? या फिर 649 करोड़ का मुनाफा गलत बताया गया? या कर्जदारों पर कर्ज की ज्यादा रकम दिखाकर इसे वित्तीय दृष्टि से काफी मजबूत बताया जाता रहा है? अब यह भी साफ हो गया है राजू ने कंपनी को कुछ बड़ी निवेशक कंपनियों के हाथों 502 करोड़ में अपने सारे शेयर बेच दिया है जिसका अर्थ यही है कि यह कंपनी उन खरीदारों के पास गिरवी है। कुल मिलाकर 40 अरब रुपए के फर्जीबारे का यह भारतीय कॉरपोरेट जगत के भ्रश्टाचार में एक शर्मनाक रिकॉर्ड की तरह दर्ज हो गया है। राजू का नाम तो काले अक्षरों में आ गया, लेकिन इसकी तो जांच होनी चाहिए कि आखिर किन परिस्थितियों में ये सारी गड़बड़ियां हुईं?आखिर किस हालत में राजू को कंपनी के अपने शेयर बेचने को मजबूर होना पड़ा? क्यों उसे झूठे बैलेंस शीट बनाने पड़े? इसकी जांच से दूसरी कंपनियों के बारे में भी अनुमान लगेगा। शेयर बाजार में इसका असर बुरा होना ही था। कुछ ही दिनों पहले जब विश्व बैंक ने सत्यम को घूस देकर आंकड़े चुराने का मामला प्रकाश में आने के साथ उसे काली सूची में डाला तो उसके समर्थन करने वाले भी सामने आ गए थे। इससे पूरे कॉरपोरेट जगत को संदेह की नजर से देखा जाने लगा है। पता नहीं कितनी कंपनियों घाटे में जाने के बाद खाता बही में घपले करके शेयर बाजार में अपनी मजबूती बनाए रख रही होंगी। सरकार को इससे सबक लेते हुए शेयर बाजार एवं कॉरपोरेट के बारे में रवैया बदलना चाहिए। कौरपोरेट जगत अपने प्रभाव का प्रयोग कर ऐसी घपलेबाजी करते रहते हैं। इन पर टिका शेयर बाजार भी इसका िशकार होता है और सरकार हमेशा बाजार को बचाने के लिए धन भी झोंकती है। क्या सरकार के पास ऐसी मशीनरी है कि वह एक-एक कंपनी की अंदरुनी माली हालत का मूल्यांकन कर सके? ऐसी मशीनरी होनी तो चाहिए जो कि सख्ती से उनकी निगरानी कर सके। इन टिप्पणियों में भी बार-बार यह सुझाव दिया जा रहा है कि शेयर बाजार में जिन कंपनियों के भाव एक समय तेजी से चढ़े और जिनके तेजी से गिरे उन सबकी गहराई से जांच होनी चाहिए। सत्यम का मामला अकेला नहीं हो सकता।

शनिवार, 3 जनवरी 2009

Assaam explosion 1 Jan 2008

गुवाहाटी विस्फोट
नए साल के पहले दिन गुवाहाटी में धमाका करने आतंकवादियों ने अपना इरादा जता दिया है। ये विस्फोट यद्यपि ज्यादा विनाशकारी नहीं थे, लेकिन समय और स्थान के हिंसाब से देखने पर इसके अर्थ काफी बड़े दिखाई देते हैं। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के गुवाहाटी पहुंचने के कुछ ही समय पहले विस्फोट किया गया। वे पुलिस, अर्धसैनिक बल एवं सेना के एकीकृत कमान तंत्र या यूनिफाइड कमांड स्ट्रक्चर की बैठक में शामिल होने के साथ सुरक्षा जायजा लेने गए हैं। भूतनाथ क्षेत्र से उन्हें गुजरना था और वहां साइकिल पर विस्फोटक रखकर विस्फोट किया गया। प्रधानमंत्री भी िशलॉंग में इंडियन साइंस कॉन्ग्रेस का उद्घाटन करने के पहले वहां पहुचंने वाले थे। जाहिर है, विस्फोट करने वालों ने गृहमंत्री एवं प्रधानमंत्री दोनों की यात्राओं को ध्यान में रखते हुए ही धमाका किया है। स्पश्टत: वे यह जताना चाहते थे कि नई सुरक्षा व्यवस्था के सामने उन्हें कमजोर एवं शांत नहीं मान लिया जाए। यानी वे सरकार की सारी व्यवस्थाओं को नकारते हुए हमला कर सकते हैं। इस प्रकार उन्होंने इस धमाके से प्रदेश व केन्द्र सरकार दोनों को सीधी चुनौती दी है। मुंबई हमले के बाद से देश में आतंकवादी खतरों के मद्दे नजर समग्र सुरक्षा तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करने का जो कदम उठाया जा रहा है एवं चिदम्बरम गृहमंत्रालय संभालने के बाद जितनी सघनता से कार्य कर रहे हैं कम से कम असम में इसे अवश्य चुनौती दी गई है। इन धमाकों का संबध बंगलादेश चुनाव में शेख सहीना की भारी विजय से भी है। हसीना ने अपनी भूमि का आतंकवादी गतिविधियों के लिए उपयोग नहीं होने देने की घोशणा की है। बंगलादेश में जेहाद के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले संगठन शेख हसीना के खिलाफ हैं। उनके दिशा निर्देश पर या उनके साथ मिलकर काम करने वाले उल्फा ने इन विस्फोटों के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया है। पुलिस का मानना है कि इस धमाके में उल्फा 709 बटालियन की भूमिका है। हालांकि इस समय उल्फा व दूसरे उग्रवादी संगठन विभक्त हैं। बंगलादेश स्थित आकाओं के निर्देश पर काम करने वाले सरकार के साथ बातचीत के विरुद्ध में हैं तो उनसे अलग होने वाले पक्ष में। उल्फा के दो समूहों अल्फा एवं चालीZ कंपनीज ने नेतृत्व से विद्रोह कर जून में ही युद्ध विराम घोशित कर दिया था। बंगलादेश स्थित उल्फा नेतृत्व उसके खिलाफ है। निश्चय ही इन विस्फोटों के द्वारा उन्होंने संघशZ विराम का भी विरोध किया है। जाहिर है, पूर्वोत्तर के संदर्भ में आतंकवादी विरोधी नीति बनाते समय हमें इस सारे पहलुओं का ध्यान रखना होगा। बंगलादेश पूर्वोत्तर सहित सम्पूर्ण भारत में आतंकवादी गतिविधियों का प्रमुख स्रोत बन चुका है। शेख हसीना के आने से इस स्थिति में परिवर्तन की जो संभावना दिख रही है उसे वास्तविकता में परिणत करना आवश्यक है। इसलिए आंतरिक सुरक्षा में चुस्ती के साथ बंगलादेश के साथ मिलकर अभियान चलाने के लिए बातचीत आंरभ की जानी चाहिए।

गाँधी साहित्य कॉपीराइट से मुक्त हुआ


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की रचनाओं से नवजीवन ट्रस्ट का कॉपीराइट समाप्त हो गया है। 1957 के भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अनुसार गांधी जी की मृत्यु के 60 साल बाद यह अवश्यंभावी था। इसमें किसी लेखक की मृत्यु के बाद कॉपीराइट उस साल के अगले साल से लेकर 60 साल तक रहता है। गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी और उसके अनुसार 1 जनवरी 2009 से कोई भी प्रकाशक गांधी जी की रचनाओं को नवजीवन ट्रस्ट को बिना रॉयल्टी शुल्क दिए या अनुमति के बिना प्रकाशित कर सकता है। इसे दो नजरिए से देखा जा सकता है। एक नजरिया यह है कि गांधी साहित्च की ओर विश्वव्यापी अभिरुचि को देखते हुए कुछ प्रकाशक इसे व्यावसायिक तरीके से छापकर लाभ कमाने की कोिशश करेंगे। गांधी जी ने अपनी रचनाओं को व्यावसायिकता की होड़ से बचाने के लिए ही सारे कॉपीराइट नवजीवन ट्रस्ट को दे दिया था। उन्होने अपने परिवार के किसी सदस्य को इसकी रॉयल्टी का हकदार नहीं बनाया। जाहिर है, गांधी रचना के संदर्भ में स्वय गांधीजी की चाहत के अंत का खतरा है। लेकिन दूसरी ओर इससे गांधीजी के विचारों के प्रसार का आयाम काफी विस्तृत हो गया है। नवजीवन ट्रस्ट ने इसी नजरिए को अपनाते हुए इसका समर्थन किया है। अब दुनिया भर में जो चाहेगा किसी भी भाशा में छापकर उसका जैसे चाहे उपयोग कर सकता है। पहले की बंदिश में यह संभव नहीं था। जो लोग गांधी विचारों में दुनिया का भविष्य देखते हैं उन्हें खतरे की ओर देखने की बजाय इस अवसर का लाभ उठाने पर ध्यान देना चाहिए। गांधी जी लिखित मूल पांच पुस्तकों के अलावा हरिजन, यंग इंडिया, नवजीवन आदि में लिखे उनके लेखों को मिलाकर एक सौ से ज्यादा पुस्तके हैंं। किसी प्रकाशक के लिए इनमें से सबसे उपयुक्त पुस्तकों का चयन काफी कठिन है। निश्चय ही वे नवजीवन ट्रस्ट या गांधी साहित्य से वाकिफ लोगों की मदद लेना चाहेंगे। गांधी विचार से जुड़ी संस्थाएं समय की आवश्यकता देखते हुए उनमें से कुछ विशेश पुस्तकों की अनुशंसा कर सकती हैंं। इससे उनका काम आसान हो जाएगा। यह संभव है कि व्यावसायिकता की दृष्टि से अन्य प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का मूल्य ज्यादा होगा। किंतु हमारे पास इस सच को स्वीकार करने के अलावा चारा क्या है। इससे चिंतित होने वालों को नवजीवन की सीमाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। नवजीवन चाहकर भी पूरी दुनिया में सारी रचनाओं को पहुंचाने में सक्षम नहीं था। कम से कम व्यवसाय करने वाले प्रकाशक या अन्य संस्थानएं जहां हैंं वहां तो इनका प्रसार करेंगे। भले व्यावसायिकता के लिए गांधी साहित्य छापा जाए लेकिन अंतत: उसमें सामिग्रंयां तो वही होंगी। इसलिए इसमें चिंता की कोई बात नहीं। नवजीवन ट्रस्ट पहले के समान गांधी साहित्य के प्रचार-प्रसार में लगा रहेगा। हां, रॉयल्टी बंद होने से इसकी आय पर असर पड़ेगा। इसकी भरपाई कैसे हो एवं पुस्तकें सस्ते मूल्य पर उपलब्ध हों इसके लिए अवश्य कुछ किया जाना चाहिए।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

नए साल में सुरक्षा व्यवस्था की नई शुरुआत
सरकार ने साल के पहले दिन से गैर कानूनी गतिविधि निवारण संबंधी कानून एवं राष्ट्रीय जांच एजेसी की औपचारिक शुरुआत कर आतंकवाद के खिलाफ कठोर रुख का संदेश दिया है। साल 2008 के अंतिम दिन इसकी घोषणा करने के पीछे गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की मंशा को समझना बहुत आसान है। यानी पीछे जो कुछ भी हुआ उसे भूलकर नए साल में सरकार आतंकवाद को परास्त करने के दृढ़ संकल्प के साथ हर मुमकिन प्रयास करेगी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी को शीघ्र ही नया महानिदेशक मिल जाएगा एवं वह तुरत पहले मुकदमे के साथ सक्रिय होगा। खुफिया ब्यूरो के बहु एजेंसी केन्द्र मैक का पुनर्गठन भी काफी महत्वपूर्ण कदम है। यद्यपि इसका गठन राजग सरकार के दौरान दिसंबर 2001 में किया गया था, लेकिन अब इसे कानूनी ताकत देकर सभी संबंधित एजेंसियों के साथ खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान अपरिहार्य बना देने से इनके बीच बेहतर तालमेल हो सकेगा। इससे आतंकवाद संबंधी खुफिया रिपोर्ट केन्द्र एवं राज्यों की सभी एजेंसियों को तुरत उपलब्ध हो जाएगी। मैक के चौबीस घंटा सक्रिय रहने से यह उम्मीद की जा सकती है कि अब आतंकी अपराध या ऐसे अन्य गंभीर आपराधिक घटनाओं की साजिशों पर गहरी खुफिया नजर होगी एवं इसका विश्लेषण पहले से काफी बेहतर होगा। आतंकवादी हमलों के संदर्भ में खुफिया विफलता भारत की सबसे बड़ी टीस बनती रही है। मैक के साथ इस घातक दुर्बलता का अंत हो यही देश की कामना है। चार शहरों में एनएसजी का गठन एवं सेना के साथ उसका प्रिशक्षण, विद्रोह रोधी एवं आतंकवाद विरोधी 20 महाविद्यालयों की स्थापना, तटीय कमान बल का गठन आदि सारे कदम इसी बात के सबूत हैं कि सरकार आतंकवाद के खिलाफ पूर्ण सुरक्षित-संरक्षित ढांचों के रुप में अब नया अवतार ले रही है। वास्तव में जेहादी आतंकवाद भारत को जिस प्रकार हर कुछ अंतराल पर लहूलुहान कर रहा है उसमें उसके निरोध एवं मुकाबले से संबंधित सभी पहलुओं को समाहित करते हुए समग्र ढांचा की आवश्यकता हर कोई महसूस करता रहा है। इसमें एहतियात बरतने एवं हमले के पूर्व उनको निष्फल करने से लेकर हमला होने के बाद प्रभावी मुकाबले तक के ढांचे शामिल हैं। नाभिकीय व रक्षा संस्थानों सहित अनेक ऐसे स्थानों के उपर से हवाई उड़ानों पर प्रतिबंध, कुछ क्षेत्रों को गैर उìयन क्षेत्र घोषित करना आदि एहतियातन कदम हैं। मैक का नया स्वरुप हमले की साजिशों को निष्फल कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। हमें एक साथ साल 2009 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी मिल गई तो उसकी जांच एवं कानूनी प्रक्रिया को बल देने के लिए कठोर कानून। इससे छानबीन एवं दोषियों को सजा दिलवाना पहले से ज्यादा आसान हो जाएगा। खुफिया गतिविधियों को सशक्त, सुलभ एवं तीक्ष्ण बनाने की मांग भी पूरी हुई तो हमले के बाद मुकाबले के लिए पर्याप्त कमांडो की आवश्यकता भी। महाविद्यालयों में प्रिशक्षित युवा भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करेंगे। इस प्रकार भारत भी धीरे-धीरे आतंकवाद के खिलाफ एवं आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में सशक्त आधारभूत संरचना वाले देशों की श्रेणी में शामिल होने की ओर अग्रसर हो गया। इन व्यवस्थाओं को राजनीतिक नेतृत्व का सही मार्गदर्शन मिला तो भारत यकीनन दुनिया के सर्वाधिक सुरक्षित देशों की कतार में शामिल हो जाएगा। हम सब यही दुआ करेंगे कि यह सपना किसी तरह सच हो जाए।