बुधवार, 31 दिसंबर 2008

कहां कम हुई महगाई

महंगाई का अंाकड़ा 13 दिसंबर के पूर्व के नौ महीने के न्यूनतम स्तर पर आ गया है। 6.61 प्रतिशत महंगाई इसके पहले सप्ताह से 0.23 प्रतिशत तो कम है ही, अगस्त के 12.91 प्रतिशत से करीब आधा है। इस नाते यह बहुत बड़ी गिरावट है। इसे देखते हुए कुछ विश्लेषक वित्त वषZ के अंत तक मुद्रास्फीति तीन प्रतिशत तक आ जाने की भी भविष्यवाणी कर रहे हैं। ऐसा हो जाए तो यह चमत्कार ही होगा। भारतीय रिजर्व बैंक मार्च के अंत तक महंगाई दर पांच प्रतिशत तक आ जाने की बात कह चुका है। इसके नीचे आने का अर्थ सरकार के कुशल आर्थिक प्रबंधन का नमूना माना जाएगा। सरकार इसे अपनी महत्वपूर्ण उपलब्धि के रुप में प्रचारित कर सकती है और आर्थिक विशेषज्ञ इस पर हामी भी भरेंगे। किंतु इनसे परे हटकर जरा आम बाजार का हालात देखिए। हमारे आपके लिए बाजार में बहुत बड़ा अंतर नहीं आया है। पेट्रॉल डीजल के दाम थोड़े घटे हैं, लेकिन अन्य उपभोक्ता सामानों की कीमतों में उतनी कमी का अनुभव नहीं है जितने की आंकड़ों के माध्यम से कल्पना की जा रही है। तो आंकड़ों और बाजार की हकीकत में इतना अंतर क्यों है? इसका कारण सूचकांकों की गणना में ऐसी चीजों का शामिल होना है जिनका हमारी आवश्यक दैनंदिन खरीदारी से कोई संबंध नहीं है। मसलन, इस्पात एवं सीमेंट। इस्पात इस समय बाजार में बेकार पड़े हैं। इनका खरीदार ही नहीं है। सीमेंट की हालत भी यही है। जब भवन निर्माण ठप्प हो जाएगा तो इनकी बिक्री पर असर पड़ेगा ही। भवनों के दाम आकाश से नीचे नहीं उतरने के कारण उनका ही खरीदार नहीं है और जब खरीदार नही ंतो भवन बनेंगे कैसे। इस प्रकार देखा जाए तो महंगाई का गिरता आंकड़ा हमारी अर्थव्यवस्था की रोगग्रस्तता का भी सबूत है। ऐसे दूसरे और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे यह साबित हो जाएगा कि मूल्यों में गिरावट दरअसल, बिक्री न होने या कम होने का प्रमाण है। सरकार भले इसे उपलब्धि बताए समग्र अर्थव्यवस्था की दृिष्ट से यह चिंताजनक है। यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि महंगाई दर में गिरावट का तर्क देकर सरकार फिर बैंकों के आरक्षित रािश के साथ रेपो एवं रिवर्स रेपो दर में कटौती कर सकती है। इससे बाजार में धन उपलब्ध होगा जिसे कम ब्याज दर पर कज्रZ लिया जा सकता है। यह मांग बड़े कारोबारियों एवं उद्योगपतियों की है। चूंकि उनकी बिक्री ठप्प है, इसलिए वे हर जुग्ग्त लगा रहे हैं। उन्हेंं लगता है कि बाजार में कम ब्याज दर पर कर्ज के लिए पर्याप्त रुपया उपलब्ध रहने के बाद उनकी बिक्री बढ़ेगी। कर्ज और बिक्री के इस चक्र से ही तो महंगाई बढ़ती है। जब महंगाई का आंकड़ा उछल रहा था तो यही लोग तर्क दे रहे थे कि जब विकास होगा, लोगों के पास खरीदने के लिए अधिक धन होगा तो महंगाई तो बढ़ेगी ही। जाहिर है, जिस प्रकार वह तर्क गलत था उसी प्रकार यह भी गलत है।

पश्चिम एशिया की हिंसा


इजरायल द्वारा गाजा पट्टी पर लगातार बमबारी से वहां जो कोहराम मचा है वह यकीनन चिंताजनक है, पर इसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। इस समय इस्राइल हमलावर दिख रहा है और उसकी निंदा भी हो रही है। हमले के कारण सैंकडों लोग मारे जा चुके हैं और घायलों की संख्या इतनी अधिक है कि उनका उपचार तक संभव नहीं हो पा रहा है। कुल मिलकार पूरी तस्वीर भयावह है। लेकिन पिछले कई महीनों से हमस के चरमपंथी इस्राइल पर रॉकेटों से हमला कर रहे थे और वे किसी के आग्रह को सुनने तक को नहीं थे। हमला और बातचीत एक साथ नहीं चल सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के लिए जाते-जाते पश्चिम एिशया की यह हिंसा ऐसी टीस दे रहा है जिसे भूल पाना उनके लिए आसान नहीं होगा। किंतु वहां की स्थिति कितनी जटिल है इसका आभास हम सबको है। फिलीस्तीन में इस समय दो गुटों हमस एवं फतह में बंटा है और यह निष्कषZ निकालना कठिन है कि वाकई कौन उसका प्रतिनिधि है। हमस का नियंत्रण गाजा पट्टी पर है तो फतह का पश्चिमी किनारे पर। इससे फिलीस्तीनियों की समस्याएं बढ़ीं हैं। सच कहा जाए तो स्वतंत्र फिलीस्तीन राज्य के सपने को ध्वस्त करने के लिए ये दो समूह अब ज्यादा दोषी हैं। हमस इस्राइल के अस्तित्व को ही स्वीकर करने को तैयार नहीं है। जब वह इस्राइल का अस्तित्व स्वीकारेगा ही नहीं तो उससे बातचीत कैसे हो सकती है। वस्तुत: हमस आतंकवादी विचारधारा का संगठन है, लेकिन चुनाव परिणामों में उसे सफलता मिली। इससे मामला उलझ गया है। अमेरिका के सामने प्रश्न यही था कि ऐसे समूह से बातचीत की जाए या नहीं। एक ओर आतंकवाद के खिलाफ युद्ध एवं दूसरी ओर किसी आतंकवादी संगठन के साथ बातचीत को बुश प्रशासन ने अस्वीकार कर दिया है। वैसे भी हमस लगातार युद्ध की भाषा बोल रहा था। वह इस्राइल को नेस्तनाबूद करने का एलान करते हुए उस पर हमला कर रहा था और इसमें पश्चिमी एिशया में शांति की संभावना दफन हो रही थी। अब इस्राइल ने हमले की समस्या के अंत के नाम पर हमला किया है। वह आसानी से पीछे नहीं हट सकता है। घटनाएं क्या मोड़ लेंगी कहना कठिन है, लेकिन हमस जेहाद के नाम पर जो कुछ कर रहा था उसका भी शमन आवश्यक है। आखिर इस्राइल के सामने चारा क्या है? या तो वह हमस की इच्छा का पालन करते हुए एक राष्ट्र के रुप में अपना अंत कर ले या फिर उसके नाश के लिए हमलावर समूह से मुठभेड़ करे। युद्ध से किसी का भला नहीं होनेवाला इस्राइल का भी नहीं। इसका अंत पश्चिम एिशया एवं दुनिया दोनों के हित में है। किंतु क्या दुनिया में ऐसी कोई शक्ति या संस्था है जो प्रभावी हस्तक्षेप कर इसका अंत करा सके? दुर्भाग्य से कुछ देशों में इस्राइल के खिलाफ प्रदशZन हो रहे हैं तो कहीं लड़ने का आह्वान हो रहा है, पर शांति के लिए हमस को तैयार करने का कोई प्रयास नहीं। क्या ये प्रदशZन करने वाले इजरायल के एक राष्ट्र के रुप में अिस्तत्व समाप्त कर वहां हमस की कल्न्पना के अनुसार वाकई उग्र इस्लामी राज्य की स्थापना के पक्ष में हैं? ऐसी बात तो केवल सिरफिरे जेहादी समूह ही कर सकते हैं।

Politics on anti terror law and national agency

ऐसे अहंकार और दर्प के रहते देश की सुरक्षा सुनििश्चत नहीं हो सकती


नििश्चत रुप से पूरा परिदृश्य बदल हुआ दिख रहा है। 16 दिसंबर को राष्ट्रीय जांच एजेंसी एवं गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के आतंकवाद विरोधी प्रावधानों में संशोधन को मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली और 17 दिसंबर को यह लोकसभा एवं 18 दिसंबर को राज्यसभा में पारित हो गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की तरह इसके लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन भी नहीं बुलाना पड़ा,क्योंकि विपक्षी भाजपा एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने इसका समर्थन किया। तो 2002 एवं 2008 में इतना अंतर आ गया है। उस समय आतंकवाद निरोधक कानून या पोटा राज्य सभा मेंं पारित नहीं हुआ था एवं हारकर सरकार को संयुक्त अधिवेशन में इसे पारित कराना पड़ा था। ऐसा कांग्रेस एवं वामपंथी दलों सहित इस समय संप्रग के ज्यादातर साझेदारों के विरोध के कारण ही हुआ था। शासन में आते ही पोटा को निरस्त कर दिया गया। यह भी सत्य है कि सरकार अपने साढ़े चार वषोZं से ज्यादा के कार्यकाल में पोटा की तीखी आलोचना करते हुए आतंकवाद विरोधी विशेष सख्त कानून को अनावश्यक साबित करती रही। जाहिर है, मुंबई हमलों के बाद देश भर में निर्मित माहौल के कारण उसे अपना रवैया बदलना पड़ा है। इस पृष्ठभूमि में यह कहना बिल्कुल सही होगा कि जो कुछ अब हुआ है वह पहले भी हो सकता था।लगातार आतंकवादी हमला झेलने के साथ सरकार को यह समझ आने लगा था कि उसे कुछ न कुछ नया करना होगा। 2006 से ही प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री संघीय जांच एजेंसी के गठन का प्रस्ताव रखने लगे थे। लेकिन इसकी कोई रुपरेखा सरकार ने नहीं रखी। हमेशा राज्यों के बीच सहमति न बनने का बहाना सामने आता गया। सरकार यदि वाकई गंभीर होती तो नजारा दूसरा होता। जिस तरीके से दो सप्ताह के भीतर इसकी पूरी रुपरेखा बन गई उसके बाद यह स्वीकारने में आपत्ति नहीं है कि सरकार ने पहले कभी गंभीरता से पहल की ही नहीं। बस, केवल औपचारिकता पूरी की गई। इसका अर्थ यही है कि चाहे राजनीतिक दबाव में या फिर आतंकवाद के वास्तविक खतरे का अहसास न कर पाने के कारण,इसे जितना महत्व देना चाहिए था संप्रग सरकार ने नहीं दिया। भाजपा सहित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन पहले भी संघीय एजेंसी के पक्ष में था और इसे आसानी से पारित कराया जा सकता था। कम्युनिस्ट पार्टियोंं ने संसद में राष्ट्रीय एजेंसी का तो समर्थन किया लेकिन कानून का नहीं। इस कारण मत विभाजन कराना पड़ा। नििश्चत रुप से तब सरकार इनके समर्थन पर टिकी थी और इनकी इच्छा के विपरीत जाने का साहस मनमोहन सिंह नहीं दिखा सके। इससे दुनिया भर में भारत की छवि आतंकवाद के खतरे के समक्ष एक अत्यंत ही नरम देश की बनी। यह भारत की मजबूत होती छवि के विपरीत था। एक देश जिसके पास आधुनिकतम सैन्य उपकरण हों, दुनिया में सम्मान की नजर से देखीजानी वाली सेना हो, पुलिस एवं अन्य सुरक्षा बलों का इतना विशाल तंत्र हो, वह आतंकवाद के सामने ऐसा बेवश दिखे यह समझ से परे था।लेकिन अब जितनी तेजी से आतंकवाद विरोधी तंत्र खड़ा हो रहा है उसका एकमात्र निष्कषZ यही है कि सरकार एवं समग्र रुप में राजनीतिक तंत्र द्वारा इच्छाशक्ति प्रदिशZत न करने के कारण ऐसी दुर्दशा हुई। संप्रग सरकार बस राजग सरकार पर पोटा का दुरुपयोग कर अल्पसंख्यकों को उत्पीड़ित करने का आरोप लगाती हुई अलग से किसी कठोर कानून की आवश्यकता को नकारती रही। आतंकवाद जैसे मामले पर इतना तीखा राजनीतिक विभाजन देश के लिए चिंताजनक था, लेकिन नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। अब सरकार भूल सुधार कर रही है और इससे बेहतर परिणाम आने की उम्मीदें बलवती होनी चाहिए। लेकिन यह मानना गलत होगा कि वाकई इस समय भी राजनीतिक एकजुटता कायम हो चुकी है। वामदलों ने ही गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम में आतंकवाद के विरुद्ध सख्त प्रावधान डालने पर कहा कि संप्रग सरकार भाजपा के साथ मिलकर पोटा को ही दूसरे नाम से ले आई है। भाजपा सहित राजग ने यद्यपि इसका संसद में समर्थन किया लेकिन लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार पर जब आरोप लगाया कि कुंभकर्ण की तरह उनकी निद्रा इतना कुछ गंवाने के करीब दस साल बाद खुली है तो इसे सहन करना सरकार के मंत्रियों तक के लिए संभव नहीं हुआ। गृहमंत्री ने यह साबित करने में ज्यादा समय लगाया कि यह कानून पोटा से कैेसे अलग है। तो लालू यादव एवं कपिल सिब्बल भाजपा पर शब्दों के गोले बरसाते रहे। आडवाणी ने कहा कि यद्यपि उनकी पार्टी समर्थन कर रही है, लेकिन सुबह का भूला शाम को घर आ जाए वाली कहावत यहां चरितार्थ नहीं होती, क्योंकि इस दौरान कई अनर्थ हो गए। सिब्बल या अन्य मंत्रियों की भूमिका विपक्ष का समर्थन पाने की होनी चाहिए, किंतु वे नए अधिनियम पर बोलने की बजाय आडवाणी पर निशाना लगाते रहे। विपक्ष का रवैया समझ में आनेवाला है, क्योंकि पोटा कानून को संप्रग सरकार ने निरस्त कर दिया। क्या आडवाणी की यह अपेक्षा गलत थी कि आतंकवाद के विरुद्ध सख्त कानूनी प्रावधान अपनाने के बाद पोटा को अब अल्पसंख्यक विरोधी नहीं कहा जाएगा? क्या यह सत्य नहीं है कि संप्रग अभी तक के कार्यकाल में पोटा को अल्पसंख्यक विरोधी बताती रही है? लेकिन इस मामले में सरकार का रवैया नहीं बदला। क्या ऐसे माहौल में जब राजनीतिक एकता की बात हो रही है, कंधार विमान अपहरण कांड, गोधरा आदि की तीखे शब्दों में चर्चा गैर जिम्मेदार रवैये का परिचायक नहीं था? सिब्बल ने यह कहकर आडवाणी को ही कठघरे में खड़ा कर दिया कि आपने कंधार विमान अपहरण के बाद जिस मसूद अजहर को छोड़ा उसी ने जैश-ए-मोहम्मद का गठन किया जो कि संसद पर हमले के लिए जिम्मेवार है। लालू यादव तो कारगिल युद्ध तक चले गए। उन्होंने कहा कि आप सोते रहे और वे कारिगल तक घुस आए। इतने तीखे हमलों के बाद स्वाभाविक एकता संभव ही नहीं है। आतंकवादी हमलों की इतनी बड़ी ट्रेजेडी के गमगीन माहौल में मंत्री ऐसी भाषा का प्रयोग करें तो उनके बारे में आम धारणा क्या बनेगी? यहीं न कि आम लोगों के मरने का इन्हें कोई गम नहीं है। हालांकि सिब्बल का यह दावा आम आदमी के लिए भी हास्यास्पद था कि आप तो छ: सालों तक संघीय जांच एजेंसी पर विचार ही करते रह गए और हमने दो हते में ही ऐसा कर दिया। सभी को पता है कि मुंबई हमले की विनाशलीला ने सारे कदमों के लिए इन्हें मजबूर किया, अन्यथा ये कहां जागने वाले थे। इस समय तो आपने एजेंसी का अधिनियम बनाने के पहले राज्यों से नहीं पूछा। तो पहले राज्यों की असहमति क्यों सामने आ जाती थी? राज्योेंं द्वारा इसे विधानसभाओं में पारित कराने की अनिवार्यता तो आज भी है।कुल मिलाकर पूरा राजनीतिक परिदृश्य अभी भी चिंताजनक है। स्पष्ट है कि समग्र रुप में सरकार ईमानदारी से आत्ममंथन कर अपनी भूलों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। हालांकि स्वयं प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री मुंबई हमलों से देश की रक्षा न कर पाने के लिए क्षमा तक मांग चुके हैं। लेकिन लगता है क्षमा याचना अंतर्मन से नहीं किया गया था। मंत्रियों के अंहकार और दर्प से भरे तेवर इसके प्रमाण हैं। ऐसे गैर ईमानदार इरादों के रहते आतंकवाद के खिलाफ देश की सुरक्षा सुनििश्चत नहीं हो सकती। निश्चय ही चारों ओर इससे अत्यंत ही बुरा संदेश गया है। भाजपा यह कहने की हालत में है कि मंत्रियों द्वारा तमाम प्रकार की निंदा को झेलते और उकसावे को सहन करते हुए भी उन्होंने वैसे अधिनियम का समर्थन किया जिनको वे पूरी तरह सख्त नहीं मानते। कल्पना करिए आडवाणी एवं भाजपा पर मंत्रियों ने जितने तीखे हमले किए उनसे बौखलाकर यदि विपक्ष विरोध कर देता तो क्या होता? राजग एवं वामदलों के विरोध के बाद यह पारित ही नहीं होता। इतना बड़ा जोखिम रहते हुए सरकार का यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाएगा। साफ है कि देश की सुरक्षा के लिए दलीय राजनीति से बाहर आने की कितनी भी घोषणा की जाए ये संकुचित राजनीति से बाहर नहीं निकले हैं। किसी प्रकार का सुरक्षा ढांचा, कोई कानून, कोई एजेंसी अपने-आप सब कुछ ठीक नहीं कर सकती। अंतत: राजनीतिक नेतृत्व के रवैये के अनुसार ही सम्पूर्ण तंत्र संचालित होगा। सरकार यदि सहनशीलता प्रदिशZत करती तो इसका वाकई देश में एवं बाहर भी सकारात्मक संदेश जाता। अब लोग यह मानने को विवश हैं कि मजबूरी में ही सरकार भी ठोस निर्णय कर रही है और विपक्ष उसका समर्थन, अन्यथा ये देश की सुरक्षा के लिए भी एकजुट नहीं होने वाले हैं।

year 2008 Indian politics review

संवत 2008 के प्रयाण एवं 2009 के आगमन की वेला में भारतीय राजनीति
तस्वीर धुन्धली है
साल 2008 के कैनवास पर भारतीय राजनीति का रंग यकीनन जिस प्रकार विचित्र ढंग से बिखड़ा है उसमें 2009 के लिए कोई नििश्चत तस्वीर उकेरना जोखिम भरा है। किंतु यह कैनवास ही उसकी आधारभूमि है जिस पर अगले साल की राजनीतिक तस्वीर बनेगी-बिगड़ेगी। एक रंग आतंकवाद विरोधी युद्ध मेें राजनीतिक एकता का है। वषोZं बाद भारतीय राजनीति में एकजुटता के कर्णप्रिय स्वर सुनाई पड़े हैं जिसका अर्थ यह है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। राजनीतिक दलों एवं नेताअों के बड़े वर्ग में राष्ट्रनिष्ठा एवं सद्विवेक का इतना अंश मौजूद हैं कि संकट की घड़ी में वे हाथ मिला सकते हैं। 2008 का यह संदेश सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। किंतु दूसरी ओर इस एकजुटता के रहते एक दूसरे पर राजनीतिक हमला की प्रवृत्ति राजनीति की आम विकृत छवि को ही प्रस्तुत करती है। साल 2009 में आम राजनीतिक व्यवहार इन्हीं दो विपरीत एवं भारतीय राजनीति की दृिष्ट से स्वाभाविक प्रवृत्तियों से संचालित होगी। वैेसे भी एकजुटता केवल आतंकवाद विरोध पर है, अन्यथा तीखा राजनीतिक विभाजन एवं इसके आधार पर उभरते और तिरोहित होते राजनीतिक समीकरणों का अनुक्रम पूर्वानुरुप ही हैं। सिंहावलोकन किया जाए तो साल 2008 भारी राजनीतिक परिवर्तनों का साल नजर आएगा। मायावती का केन्द्र सरकार से समर्थन वापसी, कांग्रेस बसपा के बीच तीखी जुगलबंदी, तमिलनाडु में द्रमुक नेतृत्व से पीएमके का अलग होना, प. बंगाल में वाममोर्चा के घटक फारवर्ड बलॉक के साथ माकपा का सीधा संघशZ, जम्मू कश्मीर सरकार से पीडीपी का समर्थन वापसी एवं गुलाम नबी आजाद सरकार का पतन, फिर केन्द्र सरकार से वामदलों की समर्थन वापसी, विश्वास मत प्रस्ताव पर दलीय निष्ठा के परित्याग के कारनामे आदि 2008 के कैनवास पर निश्चय ही बदरंगी तस्वीर उभारते हैं। साल 2009 की समग्र तस्वीर इससे भिन्न नहीं हो सकती।नाभिकीय समझौते की राजनीति ने सत्तारुढ़ संप्रग के साथ चार साल से कायम समीकरण को बदल दिया। साल के आरंभ में ही साफ हो गया था कि कांग्रेस के लिए समझौता एवं वामदलों के समर्थन में से एक चुनना होगा। प्रधानमंत्री ने जून में यह कहकर कि नाभिकीय करार राजनीति का िशकार हो गया है लेकिन वे निराश नहीं है साफ कर दिया कि वे आगे बढ़ने का मन बना चुके हैं। सरकार ने वामदलों के विरोध के बावजूद आणविक एजेंसी में जाने का संकेत दिया। कांग्रेस ने कहा कि के वे समझोैते की ओर बढ़ रहे हैं और समय का चयन वे स्वयं करेंगे। 30 जून को प्रधानमंत्री का वक्तव्य आ गया एवं माकपा ने समथर्न वापसी का एलान कर दिया। लेकिन 8 जुलाई को औपचारिक समर्थन वापसी से किसी प्रकार का राजनीतिक धमाका नहीं हुआ क्योंकि तब तक कांग्रेस के लिए वामदलोंं पर निर्भरता की विवशता का अंत हो गया था। सपा का समर्थन कांग्रेस को मिल चुका था। वास्तव में इससे संप्रग सरकार ही नहीं भाजपा इतर भारतीय राजनीति का वर्णक्रम बदल गया। सपा की पहल पर निर्मित संयुक्त राष्ट्रीय प्रगतिशील गठबंधन या यूएनपीए जिसे भविष्य का तीसरा मोर्चा कहा जा रहा था, दफन हो गया। इसके पूर्व माकपा के नेतृत्व में वामदलों ने यूएनपीए के साथ मिलकर गैर कांग्रेस गैर भाजपा राजनीतिक विकल्प के गठन पर काम करना आरंभ कर दिया था। इस प्रकार सशक्त तीसरे विकल्प की संभावना नाभिकीय समझौते पर वामदलों की अड़ियल राजनीति का िशकार हो गया।हालांकि कांग्रेस-सपा नजदीकियों का संकेत संप्रग सरकार के चार साल पूरा होने के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए रात्रि भोज में मिल गया जब स्वयं प्रधानमंत्री ने अमर सिंह को विशेश महत्व दिया। लोकसभा में विश्वास मत के दौरान अंदर एवं बाहर सरकार का मुख्य संकटमोचक सपा ही बनी। यह एक नई राजनीतिक एकता थी जिसका स्वरुप में हमें लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में अवश्य दिखाई देगा। दूसरी ओर यह माकपा के लिए विशेश धक्का था, क्योंकि मार्च के अंत में कोयम्बटूर में अयोजित पार्टी के 19 वें महाधिवेशन में महासचिव प्रकाश करात ने राजनीतिक समीकरण के संभावित दलों में केवल सपा का ही उल्लेख किया था। माकपा के साथ भाकपा ने भी हैदराबाद में आयोजित 20 वीं राष्ट्रीय कांग्रेस में गैर भाजपा गैर कांग्रेस राजनीतिक समीकरण का प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद यूएनपीए एवं वाम एकता संसद के भीतर भी दिखा था। इसके बाद माकपा के सामने तीसरे विकल्प के लिए नए सिरे से कोिशश की विवशता आ गई। करात केवल अन्नाद्रमुक की जयललिता को ही आगामी गठबंधन के लिए तैयार कर पाए हैं। यह कहना मुिश्कल है कि वाकई यह एकता लोकसभा चुनाव एवं उसके बाद कायम रहेगा। यह साल किसी एक दल के प्रभाव के सबसे ज्यादा क्षरण वाला साबित हुआ तो वह माकपा है। नंदीग्राम एवं सिंगूर ने माकपा की पिछले 12 सालों से तीसरी धारा के बीच कायम उसकी धाक को तोड़ दिया है। वाममोर्चा के उसके साथी दलों तक ने उसकी खिलाफत की। स्थानीय निकाय के चुनावों में उसे कई जगह तृणमूल के हाथों पराजय मिली। समर्थन वापसी के कारण संप्रग के तीसरे मोर्चे के दल भी उससे नाराज होकर उसके विरुद्ध बयानवाजी की। इसका असर 2009 में अवश्य दिखाई पड़ेगा। फारवर्ड ब्लॉक एवं आरएसपी माकपा के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं। त्रिपुरा में एक भी स्थान न जीतने के कारण फारवर्ड ब्लॉक का स्वर धीमा हुआ है, लेकिन अकेले चुनाव लड़ने का कदम ही वाम एकता के कमजोर होने का प्रमाण था।कांग्रेस एवं भाजपा के लिए 2008 अगले साल की पूर्वपीठिका तैयार कर गया है। सोनिया गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष के रुप में दस साल पूरा करने को जिस प्रकार ऐतिहासिक बताया गया उससे साफ हो गया कि वे जब तक चाहेंगी इस पद पर बनी रहेंगी। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के योग्य बताने के वरिष्ठ नेता अजुZन सिंह के अभियान का करारा प्रत्युत्तर पार्टी की ओर से दिया जाना इस बात का संकेत था कि निकट भविष्य में मनमोहन सिंह के नेतृत्व को चुनौती नहीं है। लोकसभा चुनाव पार्टी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ेगी। राहुल गांधी ने दलितों, आदिवासियों, किसानों, छोटे िशल्पकारों आदि के बीच जाने का जो सिलसिला शुरु किया वह अगले साल भी जारी रहेगा भले चुनाव परिणाम जो भी हो। अमरनाथ जमीन विवाद पर पहले किंकर्तव्यविमूढ़ कांग्रेस ने बाद में जिस प्रकार इसका हल निकाला उससे उसकी परिपक्वता साबित हुई। इसी प्रकार मुंबई हमले के बाद स्वयं को संभालने तथा आतंक विरोधी कदमों का राजनीतिक रणनीति के रुप में प्रयोग कर कांग्रेस ने अपनी गिरती साख को जिस तरह थामा है उसका असर जनमानस पर पड़ा। कर्नाटक चुनावों में पराजित पार्टी की साल का अंत आते-आते दिल्ली में लगातार तीसरी बार वापसी एवं राजस्थान में बहुमत के निकट पहुंचने के चुनाव परिणाम ने उसमें जिस आशावाद का संचार किया है उससे लोकसभा चुनाव में उसकी भाव-भंगिमा निर्धारित हो गई है। भाजपा में इस साल अटलबिहारी वाजपेयी के शीषZ पर विराजमान रहने के युग का अंत एवं लालकृष्ण आडवाणी युग का आरंभ हो गया। जनवरी में भाजपा कार्यकारिणी एवं राष्ट्रीय परिषद का समापन पहली बार आडवाणी के भाषण से हुआ। राष्ट्रीय परिषद ने नेता के रुप में उनके नाम का अनुमोदन कर उनके एकल वर्चस्व की पुिष्ट कर दी। 2009 का लोकसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा जाना तो सुनििश्चत हुआ ही, यह भी स्पष्ट हो गया कि चुनाव परिणाम चाहे जो हो, उनके सक्रिय रहने तक पार्टी की रीति-नीति का अंतिम सूत्र उनके हाथों ही होगा। आडवाणी ने मेरा जीवन मेरा देश आत्मकथा के माध्यम से अपनी सोच से देश को अवगत कराने की कोिशश की। भाजपा के लिए कर्नाटक विजय से दक्षिण में अपनी बदौलत सरकार बनाने की ऐतिहासिक घटना हुई। इससे केवल उत्तर तक सीमित पार्टी की छवि टूटी। लेकिन दूसरे राज्यों में इसका कितना प्रभाव होगा यह कतई साफ नहीं है। समग्र राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो संप्रग की एकता बहुत हद तक कायम है एवं वह राजग से ज्यादा विस्तृत है। किंतु बसपा की नीति, माकपा द्वारा कांग्रेस नीत चुनावी गठबंधन में शामिल नहीं होने के एलान, आंध्र में चिरंजीवी के रुप में तेलुगू देशम के समानांतर एक नई शक्ति का उदय, प. बंगाल में तृणमूल का अनिश्चय भरा तेवर आदि से भावी राजनीति की धुंधली तस्वीर ही बनती है।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

गोलमा का लोकतंत्र
राजस्थान में राज्य मंत्री बनने वाली गोलमा देवी निरक्षर हैं। इस कारण शपथ सामरोह के दौरान न वे लिखा हुआ शपथ पढ़ सकीं और न हस्ताक्षर ही कर सकीं। इसमें दोष किसका है? गोलमा का? हमारी राजनीति का जिसमें चुनाव जीतने के लिए कोई आदशZ मापदंड नहीं है? या फिर हमारे देखने के नजरिए में दोष है? वस्तुत: पढ़े-लिखे एवं संभ्रांत वर्ग के लिए यह भारतीय लोकतंत्र का उपहास है जहां कोई अनपढ़, गंवार भी जाति, वर्ण, संप्रदाय आदि का लाभ उठाकर चुनाव जीत सकता है। यह सही है कि अगर गोलमा देवी किरोड़ीमल मीणा की पत्नी नहीं होतीं तो न वे चुनाव लड़तीं और न मंत्री बनतीं। किरोड़ीमल को भाजपा का विरोधी बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह दांव खेला है। किंतु क्या शैक्षणिक डिग्री एवं संभ्रांत शैली ही किसी के जनप्रतिनिधि होने की कसौटी हो सकती है? देश आज जिन दुरवस्थाओं का िशकार है उसमें पढ़े-लिखे लोगोें की ही तो भूमिका है। किसी के िशक्षित होने का मापदंड केवल अक्षर ज्ञान कैसे हो सकता है? अगर किसी किसान को खेती के बारे में पूरी जानकारी रखता है तो अक्षर ज्ञान का उसके लिए क्या उपयोग हो सकता है? यह तो हमारी व्यवस्था का दोश है कि हमने अक्षर ज्ञान को िशक्षा का ही मापदंड नहीं बना दिया, पूरे तंत्र को अक्षर ज्ञान वालों के हाथों सिमटने की स्थति बना दी। इसमें सामान्य किसानों से लेकर छोटे िशल्पकारों के नीति-नियमों और उनके सहयोग की योजनाएं तक उन्हें श्रवण शैली में पहुंचाने की व्यवस्था नहीं है। इसलिए दोष उनका नहीं जो निरक्षर हैं, उनका है जिन्होेेंने निरक्षर को विजातीय बना देने की व्यवस्था खड़ी की और उसे सशक्त कर रहे हैं। गांधी जी कहते थे कि िशक्षा का मापदंड अक्षर ज्ञान नहीं हो सकता। उनके अनुसार अक्षर ज्ञान की भूमिका शरीर पर आभूषण सदृश ही होनी चाहिए। यानी वह ज्ञान का श्रृंगार या अलंकार ही हो सकता है। हमने इसके विपरीत मापदंड बना लिया जहां गोलमा जैसी महिला के शपथ ग्रहण के दौरान शमीZंदगी उठानी पड़ती है। आखिर शपथ की एक ही भाषा वह भी लिखी हुई क्यों होनी चाहिए? शपथ तो कर्तव्यों के प्रति वचनबद्धता की याद दिलाने के लिए है। अगर गोलमा को यह सिखा दिया जाता कि आप अपको ईश्वर का नाम लेकर यह शपथ लेना है कि आप अपनी जिम्मेदारी का पालन ईमानदारी पूर्वक करेंगी तो वे अपनी स्थानीय बोली में आसानी से ऐसा कर देेतीं। लेकिन नौकरशाही तंत्र पर निर्भर हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में स्वाभाविक लचीलापन का लोप हो चुका है जिसकी परिणति गोलमा शपथ प्रकरण है। अगर अक्षर ज्ञान ही िशक्षा की कसौटी है और सरकार ने निरक्षरता उन्मूलन का लक्ष्य तय किया हुआ है तो फिर गोलमा जैसी एक महिला जो कि प्रदेश के एक कद्दावर नेता की पत्नी है, साक्षर क्यों नहीं हो सकी? इसका दोष तो सरकारी तंत्र के सिर ही जाएगा।

बुधवार, 24 दिसंबर 2008

यह है जवाब
आतंकवादी हमलों के एक महीने के भीतर ट्राइडेंट और ताज का फिर से खुल जाना भारत के खिलाफ साजिश रचने वालों को करारा जवाब है। जिन आतंकवादी आकाओं ने इन होटलों को ध्वस्त करने का मंसूबा बनाया होगा वे यह दृश्य देखकर निश्चय ही निराश होंगे। ताज समूह के अध्यक्ष रतन टाटा ने इस अवसर पर बिल्कुल ठीक कहा कि हम घायल हो सकते हैंं, लेकिन पराजित नहीं हो सकते। बेशक, ये दोनों व्यावसायिक संस्थान हैं और इनका ज्यादा दिनों तक बंद रहना इनके स्वामियोें के लिए काफी नुकसानदायक हो सकता था, इसलि उन्होंने दिन रात एक करके इसे फिर से पूर्व अवस्था में लाने की कोिशश की। किंतु इस समय ये आतंकी हमलों से हुए विनाश एवं उनके मंसूबों के प्रतीक हैं। इस नाते इनका प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक महत्व बहुत ज्यादा है। उम्मीद करनी चाहिए कि मुख्य ओबेराय एवं होटल ताज का दूसरा भाग भी शींघ्र खुल पाएगा। वास्तव में आतंकवादियों एवं पूरी दुनिया को आतंकी हमलों से पराभूत ने होने की भारत की आंतरिक क्षमता, जज्बा और कर्मनिष्ठा का सबूत देने के लिए इन होटलों का शीघ्र आरंभ होना आवश्यक था। भारत को क्षत-विक्षत करने का मंसूबा पालने वालों के लिए यह बहुत ही बड़ा आघात है। वे यह देखकर निश्चय ही हवा में मुिट्ठयां भींच रहे होंगे कि इतने लोगों को मौत की नींद सुलाने के बावजूद लोग निर्भय होकर इन होटलों में आ रहे हैं। होटल प्रबंधन ने भी इसे आतंकवादी हमलों के समक्ष घुटने न टेकने का संदेश देने वाले अवसर के रुप में परिणत कर पूरे देश की भावनाओं का प्रतिनिधित्व किया है। इसी कारण पूरे देश का अतंर्मन इससे जुड़ा है। ऐसा नहीं होता तो सामान्यत: इन होटलों के खुलने या बंद होने में पूरे देश की रुचि नहीं हो सकती थी। यह अवसर ताज, ओबेराय या ऐसे तमाम बड़े होटलों के प्रबंधनों एवं उनमें व्याप्त सुविधाओं का उपभोग करने वाले संपन्न तबके के लिए आत्मविश्लेषण का भी विषय होना चाहिए। ऐसे सभी होटल प्राय: आम तबके की पहुंच से दूर हैं एवं उनमें आनेवाले ज्यादार लोग स्वयं को इस आम तबके से परे वििशष्ट श्रेणी की मानसिकता मेें जिते हैं। इन्हें यह समझ में आ गया होगा कि इनकी ऐकान्तिक वृत्ति संकटों से इनकी रक्षा नहीं कर सकती। ऐसे संकट से उबरने में पूरे देश की एकजुटता आवश्यक है। स्वयं को वििशष्ट मानने या ऐसे संस्थानों को बिल्कुल आम आदमी की पहुंच से दूर रखने के कारण उनके मन में इनके प्रति क्षेाभ का भाव पैदा होता है। इस समय भी ऐसा कहने वाले हैं कि भई, ओबेराय या ताज बंद रहे या खुले इससे हमारा क्या सरोकार होगा। इस मनोभाव का अंत कैसे हो कम से कम इस संदर्भ में तो इसकी पूरी जिम्मेदारी ऐसे संस्थानों के प्रबंधन एवं समाज में स्वयं को वििशष्ट मानने वाले तबके की ही है।
अर्थ की चिंता
संसद में पेश मध्यावधि आर्थिक समीक्षा में विकास दर सात से आठ प्रतिशत रहने का अनुमान वैिश्वक आर्थिक मंदी को देखते हुए यकीनन संतोषजनक है, लेकिन निश्चयात्मक रुप से कहना कठिन है कि वाकई विकास की गति अनुमान के मुताबिक रह पाएगी। समीक्षा में ही वैिश्वक मंदी के प्रभावों को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि अक्टूबर 2008 के बाद से जोखिम बढ़ता जा रहा है। वास्तव में समीक्षा में महंगाई को छोड़कर लगभग सभी पहलुओं की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। महंगाई के 6.8 प्रतिशत तक आने तथा मार्च 2009 तक सामान्य हो जाने की भविष्यवाणी है। सामान्य से सरकार का तात्पर्य इसमें स्पष्ट नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक ने पांच प्रतिशत महंगाई दर का लक्ष्य दिया था। महंगाई कम होने से लोगों की जेब में धन बचेगा जिसे सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा माना जा सकता है। लेकिन वैिश्वक मंदी के प्रभावों से घरेलू निवेश एवं विदेशी निवेश में यदि भारी कमी आएगी, बीमा, बैंकिंग, परिवहन, विनिर्माण, टिकाऊ उपभोक्ता उद्योग, निर्यात आदि के साथ सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बना सेवा क्षेत्र तक यदि सुस्ती का िशकार रहेगा तो फिर अर्थव्यवस्था की बेहतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती। इस समीक्षा में राजकोषीय प्रबंधन के कमजोर होने का संकेत भी चिंता का कारण है। वर्तमान वित्त वषZ में इसके पांच प्रतिशत तक जाने का अर्थ यह है कि पिछले चार सालों से राजकोषीय घाटा कम करने के प्रयासों पर पानी फिर रहा है। इस वषZ राजकोषीय घाटा 2.5 प्रतिशत तक सीमित रहने का अनुमान लगाया गया था। दरअसल, उद्योगों सहित कारोबार के मंद पड़ने के कारण राजस्व वसूली कम होगी, जबकि दूसरी ओर आर्थिक गतिविधियां तेज करने के लिए जो पैकेज दिए जा रहे हैैं उनका भार भी राजकोश पर पड़ेगा। इससे घाटा तो बढ़ना ही है। आर्थिक समीक्षा तथा उसके बाद वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद विरमानी की बातों से यह साफ हो जाता है कि सरकार के सामने घाटे का वजन उठाने के अलावा कोई चारा नहीं है। वैसे अभी तो यह अनुमानित तस्वीर है वास्तविक स्थिति इससे बुरी भी हो सकती है। यदि वैिश्वक मंदी यूं ही कायम रही तो फिर भारत की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए दूसरे उपाय भी करने पड़ सकते हैं। हाल फिलहाल मंदी के ठहरने का अनुमान नहीं है। वैसे दुनिया भर के आर्थिक विशेषज्ञ जून 2009 तक आर्थिक मंदी के दूर होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। जाहिर है, उस समय तक भारत को अपनी अर्थव्यवस्था की गति बनाए रखने के लिए पैकेजों का ऑक्सीजन देते रहना होगा। प्रश्न है आखिर कब तक ऐसा किया जा सकेगा। एक सुझाव रिजर्व बैेंक द्वारा रेपो एवं रिवर्स रेपो दर को एक-एक प्रतिशत और नीचे लाने का है। सरकार ब्याज दर में कटौती एवं बैंकों के आरक्षित जमा अनुपात को नीचे लाकर अर्थव्यवस्था को गति देने की कोिशश कर रही है। लेकिन कर्ज सारी समस्याओं का समाधान नहीं है। संयमित उपभोग ही किसी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रह सकता है। दुर्भाग्यवश pashchimi अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैैं।
सही संदेश
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने युद्ध नहीं चाहने का बयान देकर पाकिस्तान सहित विश्वसमुदाय को बिल्कुल सही संदेश दिया है। इसमेें पाकिस्तान के लिए युद्धोन्माद पैदा न करने की नसीहत थी तो दुनिया को यह संदेश देने की कोिशश कि भारत एक जिम्मेवार देश है और वह युद्ध के पक्ष में नहीं। भारत की समस्या आतंकवाद है और इसका केन्द्र पाकिस्तान है। इसलिए मुद्दा तो आतंकवाद है और पाकिस्तान की धरती का इसके लिए पूरा इस्तेमाल हो रहा है। प्रधानमंत्री ने यही तो कहा है कि मुद्दा युद्ध नहीं है। मुद्दा है आतंकवाद और पाकिस्तान की धरती से इसे हर प्रकार से बढ़ावा दिया जा रहा है। वस्तुत: प्रधानमंत्री का कहना सही है कि युद्ध कोई नहीं चाहता लेकिन पाकिस्तान को आतंकवादी ढांचे को नष्ट करने की कारZवाई तो करनी होगी। प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री दोनों ने पाकिस्तान से युद्वोन्माद पैदा न कर आतंकवाद के खिलाफ कदम उठाने की मांग की। वस्तुत: पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल परवेज अश्फाक कियानी का यह बयान भारत में चिंता का कारण बना है कि पाकिस्तान की सेना किसी भी परिस्थिति से निपटने को तैयार है एवं उनके जवान भी देश के लिए कुबाZन होने को तैयार हैं। ऐसी भाषा युद्ध का माहौल तैयार करती है। यह पाकिस्तान में निर्मित माहौल का ही परिणाम है कि तहरीक-ए-तालिबान के नेता ने कहा है कि भारत द्वारा हमला करने पर तालिबान लड़ाके सैनिकों के साथ लड़ेंगे। प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री दोनों ने अपने बयानों से पाकिस्तान को यही समझाने का प्रयास किया है कि आतंकवाद की समस्या को बाहरी आक्रमण से रक्षा की समस्या मत बनाइए। इन बयानों के बाद पाकिस्तान सरकार को होश आ जाना चाहिए। निस्संदेह, भारत में इस समय पाकिस्तान के खिलाफ माहौल है, लेकिन भारत पाकिस्तान पर हमला करने जा रहा है ऐसा मानने का अभी कोई कारण नहीं है। पाकिस्तानी सेना से लड़ाई हो भी जाए तो उससे आतंकवाद का खात्मा हो जाएगा ऐसी कल्पना बेमानी है। किंतु आतंकवाद का ढांचा तो नष्ट होना चाहिए। यह कम चिंता का विषय नहीं है कि पाकिस्तान मूल समस्या को दूसरी दिशा में मोड़ रहा है। आतंकवादी घटनाओं में वांछित भारतीय नागरिकों को सौंपने तथा पाक नागरिकों के खिलाफ कारZवाई करते हुए आवश्यकता पड़ने पर भारत द्वारा कानूनी कारZवाई के लिए सुपूर्द करने की तैयारी यदि वह नहीं करता तो इसका अर्थ होगा भारत विरोधी आतंकवाद का पाकिस्तान सरकार द्वारा समर्थन। राजनयिकों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया है कि मुंबई हमला भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने से रोकने के लिए किया गया था जिसे बरदाश्त नहीं किया जा सकता। अमेरिका की संघीय जांच ब्यूरो की जांच में पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के एक अंग का हाथ होने की पुिष्ट के बाद भारत का पक्ष यकीनन मजबूत हो रहा है,लेकिन कदम तो पाकिस्तान को ही उठाना है। मुंबई आतंकवादी हमले के संदर्भ में पाकिस्तान द्वारा ठोस कारZवाई न करना भारत के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

पाकिस्तान के साथ संबध इस समय क्रिकेट खेलने का कोई औचित्य नहीं

क्रिकेट टीम का चार जनवरी से आरंभ होने वाला पाकिस्तान दौरा रद्द किया जाना इस बात का प्रमाण है कि दोनों देशों के बीच कड़वाहट एवं तनाव कितना बढ़ा हुआ है। सामान्यत: दो देशों के बीच राजनीतिक संबंध सामान्य न होने की हालत में भी खेल संबंध जारी रहता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां दो देशों के संबंध तो तनावपूर्ण थे, पर उनके खिलाड़ी एक दूसरे के खिलाफ मैदान में उतरते रहे। भारत पाकिस्तान के बीच भी ऐसा हो चुका है। खेल स्वयं तनाव शैथिल्य का आधार बन जाता है। वास्तव में दो देशों के बीच संबधों को सामान्य बनाने के लिए खेल भी आधुनिक कूटनीति का अंग हो गया है। कुल मिलाकर खेल संबंध स्थगित किया जाना दो देशों के बीच तनाव की उच्च अवस्था का सबूत माना जाता है। इसलिए क्रिकेट टीम का दौरा रद्द किया जाना ऊपर तौर पर जितनी छोटी घटना लगे यह व्यवहार में अत्यंत ही गंभीर कदम है। इससे पता चलता है कि मुंबई हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच दूरियां कितनी तेजी से बढ़ी हैं।प्रश्न किया जा सकता है कि आखिर खेल को राजनीति से जोड़ने का क्या तुक है? बेशक, खेल को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए। किंतु यहां किसी सामान्य राजनीति का नहीं भारत की सुरक्षा का, उसकी एकता-अखंडता बनाए रखने का मूल प्रश्न निहित है। आतंकवादी पाकिस्तान से आकर हमारे देश पर हमला करें, बेगुनाहों का रक्त बहाएं, करोड़ों की संपत्तियां स्वाहा करें, देश में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोिशश करें और हम उनके साथ खेल के मैदान में उतरें यह संभव नहीं है। हमारे लिए सबसे चिंता की बात यह है कि पाकिस्तान की वर्तमान सरकार की ओर से भारत की भावना तक को सम्मान देने की पहल नहीं हो रही। उल्टे हमले से लहूलुहान और स्वाभाविक गुस्से से भरे देश पर पाकिस्तान की सरकार विश्वास तक करने को तैयार नहीं है। हमारी सरकार कहती है कि आतंकवादी पाकिस्तान से आए, पकड़े गए एकमात्र आतंकवादी अजमल आमिर ईमान कसब के फरीदकोट के एक गांव तक का पता दिया जा रहा है और पाकिस्तन की सरकार कहती है कि उसके पाकिस्तानी होने का कोई सबूत नहीं है। ऐसे में संबंधों का अर्थ क्या है। संबंधों की पहचान तो ऐसे कठिन मौकों पर ही होती है। आपकी भूमि पर हमारे खिलाफ आतंकवादी साजिशें रची जाएं, उसको अंजाम देने के लिए भी आतंकवादी वहीं से आएं और आप उसकी छानबीन कर सही तथ्य जुटाने एवं दोषियों को सजा मिलने में सहयोग की जगह पूरी बात को ही झुठलाते रहें तो इसका अर्थ तो यही है कि हम पर हुए हमलों से आपके मन में न कोई दु:.ख है और न चिंता ही।इनमें यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे माहौल में क्रिकेट टीम को भेजा नहीं जा सकता था। खेल के पीछे खेल भावना होनी चाहिए। यह खेल भावना ही है जो मनुष्य को जय पराजय की भावना से ऊपर उठाती है। खिलाड़ी या पूरी टीम प्रतिस्पर्धा तो करती है जीत के लिए ही, लेकिन पराजित होने पर भी उसमें विनाशक प्रतिशोध की भावना पैदा नहीं होती। तो खेल भावना का माहौल होना किसी भी खेल के मूल में है। यह भावना खिलाड़ियों के साथ दशZकों में भी होना चाहिए। साफ है कि इस समय के हालात में खेल भावना का ऐसा माहौल पैदा नहीं हो सकता है। ऐसे समय में खिलाड़ी खेल भावना से खेल भी नहीं सकते। भारत एवं पाकिस्तान के क्रिकेट प्रेमियों के लिए इससे क्षणिक निराशा हो सकती है। किंतु खेल तो राष्ट्र जीवन का एक छोटा पहलू है। यहां तो भारत नामक राष्ट्र के अपनी समस्त अनूठी बहुविध विशेषताओं के साथ जीवित रहने का प्रश्न है। खेल देश के लिए है, देश खेल के लिए नहीं। भारत सरकार इस समय पाकिस्तान पर हर प्रकार के दबाव की कूटनीति अिख्तयार कर रही है ताकि वह आतंकवादी समूहों एवं उनके नेताओं के विरुद्ध ठोस कारZवाई को मजबूर हो। इससे ही भारत की सुरक्षा सुनििश्चत हो सकती है। वैसे स्वयं पाकिस्तान की सुरक्षा का सूत्र भी इसी मेंं निहित है। क्रिकेट टीम भेजने से दबावकारी कूटनीति कमजोर हो सकती थी और इसका अर्थ सुरक्षा पर खतरा बनाए रखना होता। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को यकीनन इससे गहरा धक्का लगा है। कई देशों की टीमों का दौरा रद्द होने से उसकी वित्तीय हालत खराब है। भारत के साथ श्रृंखला से उसे करीब दो करोड़ डॉलर आय की संभावना थी। इसके समाप्त हो जाने से उसकी समस्याएं और बढ़ गईं हैं। किंतु यह चिंता तो पाकिस्तान के खेल प्रेमियों को होनी चाहिए। आखिर भारत आतंकवादी हमलों के लिए इतनी मनगढंत बातें क्यों बोेलेगा? जो भारत स्वयं पहल करके पाकिस्तान के साथ व्यापक बातचीत की प्रक्रिया शुरु कर सकता है, जो दोनों देशों के नागरिकों का संपर्क बढ़ाने के लिए अनेक कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दे सकता है वह क्यों चाहेगा कि हमारे संंबंध बिगड़ जाएं? पाकिस्तान के क्रिकेट प्रेमियों को भी यह सोचना चाहिए कि किस मन:स्थिति में भारत को ऐसा निर्णय लेना पड़ा है। क्या वे पाकिस्तान में आतंकवादियोें के अस्तित्व को नहीं जानते। वे अपनी सरकार पर दबाव बढ़ाकर हमले के दोषियों को सामने लाने के लिए आगे आ सकते हैं। अगर उनके अंदर यह भावना नहीं है तो फिर उन्हेंं भारत के साथ खेल का लाभ और लुत्फ उठाने से वंचित होना ही चाहिए।बेशक, यह िZस्थति दुर्भाग्यपूर्ण है, किंतु पाकिस्तान सरकार के वर्तमान रुख को देखते हुए इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। जो स्थिति है उसमें बात और बिगड़ सकती है। देखा जाए तो दोनों देशों के संबंध एक प्रकार से घूमकर आठ सालों में फिर वहीं पहुंच गया है जहां वह संसद हमले के बाद था। तब खेल से लेकर यातयात तक के संबंध तोड़ दिए गए थे। तो क्या धीरे-धीरे सब कुछ उसी दिशा में बढ़ रहा है? अभी एकदम नििश्चत तौर पर कुछ कहना कठिन है। कम से कम अभी भारत सरकार ने सीमा पर फौज को युद्ध की अवस्था में तैनात करने का निर्णय नहीं लिया है। किंतु कल क्या होगा कहना कठिन है। भारत सरकार का रुख स्वाभाविक तौर पर कड़ा है और पाकिस्तान भले आक्रामक बयान नहीं दे रहा है, पर उसका रवैया भारत की हर बात को सिरे से नकारने वाला है। यह रवैया कतई भारत की भावनाओं को समझने वाला नहीं है। ऐसे में सांस्कृतिक संबंघ पूरी तरह सिमट सकता है। इसकी जिम्मेवारी पाकिस्तान की ही होगी। भारत सरकार द्वारा क्रिकेट टीम का दौरा रद्द करने का निर्णय मजबूरी मेंं लिया गया है,क्योंकि इसके अलावा कोई विकल्प है ही नहीं।

Diplomat Conference

चरम् कूटनीति
निश्चय ही यह सीमा पार आतंकवाद विरोधी कूटनीति को चरम पर पहंचाने की कोशिश है। विभिन्न देशों में कार्यरत 116 भारतीय राजदूतों एवं उच्चायुक्तों का दो दिवसीय सम्मेलन असाधारण कदम है, जो पहले कभी नहीं हुआ। हालांकि यह सम्मेलन मुंबई हमले के पहले ही तय हो गया था, लेकिन समय की पृष्ठभूमि के कारण इसका मुख्य फोकस पाकिस्तान स्थित वैश्विक आतंकवाद है। यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक कूटनीति के इस माहौल में इसका दुनिया भर में अत्यंत ही उपयुक्त संदेश गया होगा। वास्तव में इस सम्मेलन से ऐसा संदेश निकल रहा है कि भारत इस बार पाकिस्तान की भूमि पर मजबूत हो चुके जेहादी आतंकवाद के विरुद्ध समस्त कूटनीतिक संसाधन संगठित व योजनाबद्ध तरीके से झोंक चुका है। इसका असर पड़ना लाजिमी है। सम्मेलन में विदेश मंत्री प्रणब मुखजीZ ने जो कुछ कहा उसमें शेष बातें तो वही थीं जो वे कई दिनों से लगातार बोल रहे हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान स्थित आतंकवाद को मिटाने के लिए और कार्रवाई की अपील की। अभी तक की भाषा यह थी कि पाकिस्तान को जितनी कार्रवाई करनी चाहिए नहीं कर रहा है, सम्मेलन का स्वर यह है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान के संदर्भ में जितना करनी चाहिए नहीं कर रहा है। केवल मुंबई हमलों के दोषियों के खिलाफ ही नहीं, कार्रवाई ऐसे करनी होगी ताकि इस प्रकार के हमले आगे न हों। उन्होंने यह भी कह दिया कि पाकिस्तान से अंतत: हमें ही निपटना होगा। इससे सम्मेलन के बाद भारतीय कूटनीति की दिषा स्पष्ट हो गई है। मुंबई हमले का समस्त सूत्र पाकिस्तान में मिलने के साथ ही भारत ने अपने सभी मिशनों को संबंधित देशों एवं विश्व संस्थाओं को इसकी पूरी सूचना देने एवं पाकिस्तान के विरुद्ध व भारत के पक्ष में वातावरण के काम पर लगा दिया था। सारे मिशन इस दिशा में पहले से सक्रिय हैं। अब वे यह बताएंगे कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने जो कुछ किया है वह वैश्विक आतंकवाद का सर्वप्रमुख केन्द्र बन चुके पाकिस्तान के संदर्भ में नाकाफी हैं। यानी वहां आतंंकवाद के वृक्ष को जड़ से मिटाने की संगठित कार्रवाई होनी चाहिए और ऐसा नहीं हुआ तो हम अपने तरीके से जवाब देने के लिए मजबूर होंगे। इस आक्रामक कूटनीति का कुछ न कुछ परिणाम अवश्य आयेगा। गिरफ्तार आतंकवादी अजमल का पत्र पाक उच्चायुक्त को भेजना भी उसे घेरने की कूटनीति का ही अंग है। अजमल जिस स्थिति में है उसमें यकीनन उसे पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया गया होगा, लेकिन इसके बाद पाकिस्तान के लिए कम से कम अजमल की राश्ट्रीयता नकारना कठिन होगा। भारतीय प्रतिनिधि इस पत्र की कॉपी भी अपने संबंधित देशों को देंगे। भारत के लिए अपनी आतंकवाद विरोधी चरम कूटनीति का अंतर्राष्ट्रीय प्रत्युत्तर क्या आता है यह अनुभव करने का महत्वपूर्ण अवसर है।
अचरज नहीं
लन्दन से प्रकाशित द टाइम्स की इस रिपोर्ट पर अचरज का कोई कारण नहीं है कि लश्कर-ए-तैयबा आईएसआई द्वारा पैदा किया गया संगठन है। 1980 के दशक मेंंअफगानिस्तान से सोवियत संघ को बाहर करने के लिए अमेरिका तथाकथित मुजाहिद्दीनों की मदद करता था और इसका सूत्र पाकिस्तान था। पाकिस्तान ने इसे जम्मू कश्मीर को भारत से अलग करने के अवसर के रुप देखा और 1989-90 से आईएसआई ने ऐसे संगठनों को सभी प्रकार की मदद करनी आरंभ कर दी। इस रिपोर्ट में 1987-89 के बीच आईएसआई के प्रमुख रहे जनरल हामिद गुल और 1990-92 के बीच प्रमुख रहे जनरल असद दुर्रानी से बातचीत के जो अंष हैं वे भी इस बात की पुश्त करते हैें। मसलन, दुर्रानी ने कहा है कि पाकिस्तान से यह उम्मीद करना कि वह जम्मू कश्मीर से अपने को अलग कर लेगा गलत है। सवाल है कि जम्मू कश्मीर में आपकी गहरी अभिरुचि क्यों होनी चाहिए? उनकी इस बात से सहमत होना कठिन है कि आईएसआई ने जो किया किसी देष की खुफिया एजेंसी वही करती। हिंसा और आतंकवाद पैदा करने और उसे बढ़ावा देने की भूमिका निभाने वाली खुफिया एजेन्सी स्वयं उसी श्रेणी में खड़ी हो जाती है। यह स्वीकार किया जा सकता है कि लश्कर एक ऐसा जिन्न हो गया है जिसे भले आईएसआई ने पाला-पोसा लेकिन उसे अब बोतल में बंद करना उसके लिए कठिन हो गया है। यदि दुर्रानी की बात मानी जाए तो उनके कार्यकाल में लश्कर को समर्थन नहीं था, किंतु वे यह भी कहते हैं कि जम्मू कश्मीर में सक्रिय ऐसे समूहों के समर्थन में पाकिस्तान का हित निहित था। पाकिस्तान की यही गलत सोच तो समस्या की जड़ है। हालांकि इस रिपोर्ट से निश्चयात्मक तौर पर यह स्थापित नहीं होता कि लश्कर की पीठ पर अब भी आईएसआई का हाथ है या नहीं। भारतीय संसद पर हमले के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ के कार्यकाल में लश्कर से नाता तोड़ने की बात कही जाती है। मई 2002 में उन्होंने राष्ट्र के नाम संबोधन में लश्कर सहित अन्य संगठनों को प्रतिबंधित करने का एलान भी किया था। लश्कर सहित ऐसे कई संगठनों का आईएसआई एवं फौज के साथ इतना घनिष्ठ संबंध हो गया था जिसे पूरी तरह तोड़ना आसान नहीं। जाहिर है, आईएसआई ने पूरी तरह इनसे नाता तोड़ा हो या नहीं, जिन अधिकारियों के साथ लश्कर के नेताओं के रिष्ते बन गए थे वे पदों पर रहते अपने प्रभाव का उपयोग कर इन्हें सहायता दिलवाते रहे। सेवानिवृत्ति के बाद भी ऐसे अधिकारियों ने अपने तरीके से इनकी मदद की है। shasan की भूमिका के बिना निजी स्तर पर बहुत ज्यादा मदद करना संभव नहीं हो सकता। बहरहाल, इस रिपोर्ट से लश्कर एवं आईएसआई के rishton की ओर दुनिया का ध्यान पुन: आया है। लश्कर के कार्यालयों एवं सम्मेलनों में आईएसआई एवं सेना के लोग जाते रहे हैं। गुल ने मुरिदके स्थित उसके मुख्यालय जाने की बात स्वीकार की है।

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

How to deal with Pakistan

At moment Pakistan has become a hot topic for us. After Mumbai terror attack question of how to deal with Pakistan is in everyindian's mind. Here are some options in question mode on how to deal with Pakistan:
1. Should India postpone or cancel composite dialogue or whole peace process?
2. Should military option be adopted?
3. Should we try coercive diplomacy in such way as previous Vajapayee govt. had done after Parliament attack? At that time army remained deployed on war mode at Indo Pak border for about 10 months.
4. Should we confine ourselves to the pressure by international diplomacy?
5. Should we compel him to act substantially and effectively against terror groups by making efforts of blocking financial assistance from international financial institutions?
please give your opinion.
Awadhesh Kumar

पाकिस्तान के साथ क्या करें

इस समय देश में चारों ओर पाकिस्तान के साथ कैसे निपटा जाए इस पर गहन मंथन जरी है। मैं बहस के लिए कुछ प्रश्न रख रहा हूँ।
१क्या पाकिस्तान के साथ समग्र शान्ति वार्ता प्रक्रिया को स्थगित कर देना चाहिए?
२ क्या उसके खिलाफ सैनिक कार्रवाई कर देना चाहिए?
३ क्या उसी प्रकार बाध्यकारी कूटनीति अपनानी चाहिए जैसे वाजपयी सरकार ने संसद पर हमले के बाद किया था ? तब करीब दस महीने तक सेना युद्ध की अवस्था में नियंत्रण रेखा एवं सीमा पर तैनात रही थी।
४.क्या अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के दबाव तक ही हमें सीमित रहना चाहिए?
५ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से उसे मिलनेवाली आर्थिक सहायता रोकने की कोशिश कर उसे आतंकवादियों के खिलाफ कदम उठाने को बाध्य करना चाहिए?
आप अपना मत व्यक्त करें।
अवधेश कुमार