कहां कम हुई महगाई
महंगाई का अंाकड़ा 13 दिसंबर के पूर्व के नौ महीने के न्यूनतम स्तर पर आ गया है। 6.61 प्रतिशत महंगाई इसके पहले सप्ताह से 0.23 प्रतिशत तो कम है ही, अगस्त के 12.91 प्रतिशत से करीब आधा है। इस नाते यह बहुत बड़ी गिरावट है। इसे देखते हुए कुछ विश्लेषक वित्त वषZ के अंत तक मुद्रास्फीति तीन प्रतिशत तक आ जाने की भी भविष्यवाणी कर रहे हैं। ऐसा हो जाए तो यह चमत्कार ही होगा। भारतीय रिजर्व बैंक मार्च के अंत तक महंगाई दर पांच प्रतिशत तक आ जाने की बात कह चुका है। इसके नीचे आने का अर्थ सरकार के कुशल आर्थिक प्रबंधन का नमूना माना जाएगा। सरकार इसे अपनी महत्वपूर्ण उपलब्धि के रुप में प्रचारित कर सकती है और आर्थिक विशेषज्ञ इस पर हामी भी भरेंगे। किंतु इनसे परे हटकर जरा आम बाजार का हालात देखिए। हमारे आपके लिए बाजार में बहुत बड़ा अंतर नहीं आया है। पेट्रॉल डीजल के दाम थोड़े घटे हैं, लेकिन अन्य उपभोक्ता सामानों की कीमतों में उतनी कमी का अनुभव नहीं है जितने की आंकड़ों के माध्यम से कल्पना की जा रही है। तो आंकड़ों और बाजार की हकीकत में इतना अंतर क्यों है? इसका कारण सूचकांकों की गणना में ऐसी चीजों का शामिल होना है जिनका हमारी आवश्यक दैनंदिन खरीदारी से कोई संबंध नहीं है। मसलन, इस्पात एवं सीमेंट। इस्पात इस समय बाजार में बेकार पड़े हैं। इनका खरीदार ही नहीं है। सीमेंट की हालत भी यही है। जब भवन निर्माण ठप्प हो जाएगा तो इनकी बिक्री पर असर पड़ेगा ही। भवनों के दाम आकाश से नीचे नहीं उतरने के कारण उनका ही खरीदार नहीं है और जब खरीदार नही ंतो भवन बनेंगे कैसे। इस प्रकार देखा जाए तो महंगाई का गिरता आंकड़ा हमारी अर्थव्यवस्था की रोगग्रस्तता का भी सबूत है। ऐसे दूसरे और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे यह साबित हो जाएगा कि मूल्यों में गिरावट दरअसल, बिक्री न होने या कम होने का प्रमाण है। सरकार भले इसे उपलब्धि बताए समग्र अर्थव्यवस्था की दृिष्ट से यह चिंताजनक है। यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि महंगाई दर में गिरावट का तर्क देकर सरकार फिर बैंकों के आरक्षित रािश के साथ रेपो एवं रिवर्स रेपो दर में कटौती कर सकती है। इससे बाजार में धन उपलब्ध होगा जिसे कम ब्याज दर पर कज्रZ लिया जा सकता है। यह मांग बड़े कारोबारियों एवं उद्योगपतियों की है। चूंकि उनकी बिक्री ठप्प है, इसलिए वे हर जुग्ग्त लगा रहे हैं। उन्हेंं लगता है कि बाजार में कम ब्याज दर पर कर्ज के लिए पर्याप्त रुपया उपलब्ध रहने के बाद उनकी बिक्री बढ़ेगी। कर्ज और बिक्री के इस चक्र से ही तो महंगाई बढ़ती है। जब महंगाई का आंकड़ा उछल रहा था तो यही लोग तर्क दे रहे थे कि जब विकास होगा, लोगों के पास खरीदने के लिए अधिक धन होगा तो महंगाई तो बढ़ेगी ही। जाहिर है, जिस प्रकार वह तर्क गलत था उसी प्रकार यह भी गलत है।