मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

Diplomat Conference

चरम् कूटनीति
निश्चय ही यह सीमा पार आतंकवाद विरोधी कूटनीति को चरम पर पहंचाने की कोशिश है। विभिन्न देशों में कार्यरत 116 भारतीय राजदूतों एवं उच्चायुक्तों का दो दिवसीय सम्मेलन असाधारण कदम है, जो पहले कभी नहीं हुआ। हालांकि यह सम्मेलन मुंबई हमले के पहले ही तय हो गया था, लेकिन समय की पृष्ठभूमि के कारण इसका मुख्य फोकस पाकिस्तान स्थित वैश्विक आतंकवाद है। यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक कूटनीति के इस माहौल में इसका दुनिया भर में अत्यंत ही उपयुक्त संदेश गया होगा। वास्तव में इस सम्मेलन से ऐसा संदेश निकल रहा है कि भारत इस बार पाकिस्तान की भूमि पर मजबूत हो चुके जेहादी आतंकवाद के विरुद्ध समस्त कूटनीतिक संसाधन संगठित व योजनाबद्ध तरीके से झोंक चुका है। इसका असर पड़ना लाजिमी है। सम्मेलन में विदेश मंत्री प्रणब मुखजीZ ने जो कुछ कहा उसमें शेष बातें तो वही थीं जो वे कई दिनों से लगातार बोल रहे हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान स्थित आतंकवाद को मिटाने के लिए और कार्रवाई की अपील की। अभी तक की भाषा यह थी कि पाकिस्तान को जितनी कार्रवाई करनी चाहिए नहीं कर रहा है, सम्मेलन का स्वर यह है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान के संदर्भ में जितना करनी चाहिए नहीं कर रहा है। केवल मुंबई हमलों के दोषियों के खिलाफ ही नहीं, कार्रवाई ऐसे करनी होगी ताकि इस प्रकार के हमले आगे न हों। उन्होंने यह भी कह दिया कि पाकिस्तान से अंतत: हमें ही निपटना होगा। इससे सम्मेलन के बाद भारतीय कूटनीति की दिषा स्पष्ट हो गई है। मुंबई हमले का समस्त सूत्र पाकिस्तान में मिलने के साथ ही भारत ने अपने सभी मिशनों को संबंधित देशों एवं विश्व संस्थाओं को इसकी पूरी सूचना देने एवं पाकिस्तान के विरुद्ध व भारत के पक्ष में वातावरण के काम पर लगा दिया था। सारे मिशन इस दिशा में पहले से सक्रिय हैं। अब वे यह बताएंगे कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने जो कुछ किया है वह वैश्विक आतंकवाद का सर्वप्रमुख केन्द्र बन चुके पाकिस्तान के संदर्भ में नाकाफी हैं। यानी वहां आतंंकवाद के वृक्ष को जड़ से मिटाने की संगठित कार्रवाई होनी चाहिए और ऐसा नहीं हुआ तो हम अपने तरीके से जवाब देने के लिए मजबूर होंगे। इस आक्रामक कूटनीति का कुछ न कुछ परिणाम अवश्य आयेगा। गिरफ्तार आतंकवादी अजमल का पत्र पाक उच्चायुक्त को भेजना भी उसे घेरने की कूटनीति का ही अंग है। अजमल जिस स्थिति में है उसमें यकीनन उसे पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया गया होगा, लेकिन इसके बाद पाकिस्तान के लिए कम से कम अजमल की राश्ट्रीयता नकारना कठिन होगा। भारतीय प्रतिनिधि इस पत्र की कॉपी भी अपने संबंधित देशों को देंगे। भारत के लिए अपनी आतंकवाद विरोधी चरम कूटनीति का अंतर्राष्ट्रीय प्रत्युत्तर क्या आता है यह अनुभव करने का महत्वपूर्ण अवसर है।

कोई टिप्पणी नहीं: