बुधवार, 31 दिसंबर 2008

Politics on anti terror law and national agency

ऐसे अहंकार और दर्प के रहते देश की सुरक्षा सुनििश्चत नहीं हो सकती


नििश्चत रुप से पूरा परिदृश्य बदल हुआ दिख रहा है। 16 दिसंबर को राष्ट्रीय जांच एजेंसी एवं गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के आतंकवाद विरोधी प्रावधानों में संशोधन को मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली और 17 दिसंबर को यह लोकसभा एवं 18 दिसंबर को राज्यसभा में पारित हो गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की तरह इसके लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन भी नहीं बुलाना पड़ा,क्योंकि विपक्षी भाजपा एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने इसका समर्थन किया। तो 2002 एवं 2008 में इतना अंतर आ गया है। उस समय आतंकवाद निरोधक कानून या पोटा राज्य सभा मेंं पारित नहीं हुआ था एवं हारकर सरकार को संयुक्त अधिवेशन में इसे पारित कराना पड़ा था। ऐसा कांग्रेस एवं वामपंथी दलों सहित इस समय संप्रग के ज्यादातर साझेदारों के विरोध के कारण ही हुआ था। शासन में आते ही पोटा को निरस्त कर दिया गया। यह भी सत्य है कि सरकार अपने साढ़े चार वषोZं से ज्यादा के कार्यकाल में पोटा की तीखी आलोचना करते हुए आतंकवाद विरोधी विशेष सख्त कानून को अनावश्यक साबित करती रही। जाहिर है, मुंबई हमलों के बाद देश भर में निर्मित माहौल के कारण उसे अपना रवैया बदलना पड़ा है। इस पृष्ठभूमि में यह कहना बिल्कुल सही होगा कि जो कुछ अब हुआ है वह पहले भी हो सकता था।लगातार आतंकवादी हमला झेलने के साथ सरकार को यह समझ आने लगा था कि उसे कुछ न कुछ नया करना होगा। 2006 से ही प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री संघीय जांच एजेंसी के गठन का प्रस्ताव रखने लगे थे। लेकिन इसकी कोई रुपरेखा सरकार ने नहीं रखी। हमेशा राज्यों के बीच सहमति न बनने का बहाना सामने आता गया। सरकार यदि वाकई गंभीर होती तो नजारा दूसरा होता। जिस तरीके से दो सप्ताह के भीतर इसकी पूरी रुपरेखा बन गई उसके बाद यह स्वीकारने में आपत्ति नहीं है कि सरकार ने पहले कभी गंभीरता से पहल की ही नहीं। बस, केवल औपचारिकता पूरी की गई। इसका अर्थ यही है कि चाहे राजनीतिक दबाव में या फिर आतंकवाद के वास्तविक खतरे का अहसास न कर पाने के कारण,इसे जितना महत्व देना चाहिए था संप्रग सरकार ने नहीं दिया। भाजपा सहित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन पहले भी संघीय एजेंसी के पक्ष में था और इसे आसानी से पारित कराया जा सकता था। कम्युनिस्ट पार्टियोंं ने संसद में राष्ट्रीय एजेंसी का तो समर्थन किया लेकिन कानून का नहीं। इस कारण मत विभाजन कराना पड़ा। नििश्चत रुप से तब सरकार इनके समर्थन पर टिकी थी और इनकी इच्छा के विपरीत जाने का साहस मनमोहन सिंह नहीं दिखा सके। इससे दुनिया भर में भारत की छवि आतंकवाद के खतरे के समक्ष एक अत्यंत ही नरम देश की बनी। यह भारत की मजबूत होती छवि के विपरीत था। एक देश जिसके पास आधुनिकतम सैन्य उपकरण हों, दुनिया में सम्मान की नजर से देखीजानी वाली सेना हो, पुलिस एवं अन्य सुरक्षा बलों का इतना विशाल तंत्र हो, वह आतंकवाद के सामने ऐसा बेवश दिखे यह समझ से परे था।लेकिन अब जितनी तेजी से आतंकवाद विरोधी तंत्र खड़ा हो रहा है उसका एकमात्र निष्कषZ यही है कि सरकार एवं समग्र रुप में राजनीतिक तंत्र द्वारा इच्छाशक्ति प्रदिशZत न करने के कारण ऐसी दुर्दशा हुई। संप्रग सरकार बस राजग सरकार पर पोटा का दुरुपयोग कर अल्पसंख्यकों को उत्पीड़ित करने का आरोप लगाती हुई अलग से किसी कठोर कानून की आवश्यकता को नकारती रही। आतंकवाद जैसे मामले पर इतना तीखा राजनीतिक विभाजन देश के लिए चिंताजनक था, लेकिन नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। अब सरकार भूल सुधार कर रही है और इससे बेहतर परिणाम आने की उम्मीदें बलवती होनी चाहिए। लेकिन यह मानना गलत होगा कि वाकई इस समय भी राजनीतिक एकजुटता कायम हो चुकी है। वामदलों ने ही गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम में आतंकवाद के विरुद्ध सख्त प्रावधान डालने पर कहा कि संप्रग सरकार भाजपा के साथ मिलकर पोटा को ही दूसरे नाम से ले आई है। भाजपा सहित राजग ने यद्यपि इसका संसद में समर्थन किया लेकिन लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार पर जब आरोप लगाया कि कुंभकर्ण की तरह उनकी निद्रा इतना कुछ गंवाने के करीब दस साल बाद खुली है तो इसे सहन करना सरकार के मंत्रियों तक के लिए संभव नहीं हुआ। गृहमंत्री ने यह साबित करने में ज्यादा समय लगाया कि यह कानून पोटा से कैेसे अलग है। तो लालू यादव एवं कपिल सिब्बल भाजपा पर शब्दों के गोले बरसाते रहे। आडवाणी ने कहा कि यद्यपि उनकी पार्टी समर्थन कर रही है, लेकिन सुबह का भूला शाम को घर आ जाए वाली कहावत यहां चरितार्थ नहीं होती, क्योंकि इस दौरान कई अनर्थ हो गए। सिब्बल या अन्य मंत्रियों की भूमिका विपक्ष का समर्थन पाने की होनी चाहिए, किंतु वे नए अधिनियम पर बोलने की बजाय आडवाणी पर निशाना लगाते रहे। विपक्ष का रवैया समझ में आनेवाला है, क्योंकि पोटा कानून को संप्रग सरकार ने निरस्त कर दिया। क्या आडवाणी की यह अपेक्षा गलत थी कि आतंकवाद के विरुद्ध सख्त कानूनी प्रावधान अपनाने के बाद पोटा को अब अल्पसंख्यक विरोधी नहीं कहा जाएगा? क्या यह सत्य नहीं है कि संप्रग अभी तक के कार्यकाल में पोटा को अल्पसंख्यक विरोधी बताती रही है? लेकिन इस मामले में सरकार का रवैया नहीं बदला। क्या ऐसे माहौल में जब राजनीतिक एकता की बात हो रही है, कंधार विमान अपहरण कांड, गोधरा आदि की तीखे शब्दों में चर्चा गैर जिम्मेदार रवैये का परिचायक नहीं था? सिब्बल ने यह कहकर आडवाणी को ही कठघरे में खड़ा कर दिया कि आपने कंधार विमान अपहरण के बाद जिस मसूद अजहर को छोड़ा उसी ने जैश-ए-मोहम्मद का गठन किया जो कि संसद पर हमले के लिए जिम्मेवार है। लालू यादव तो कारगिल युद्ध तक चले गए। उन्होंने कहा कि आप सोते रहे और वे कारिगल तक घुस आए। इतने तीखे हमलों के बाद स्वाभाविक एकता संभव ही नहीं है। आतंकवादी हमलों की इतनी बड़ी ट्रेजेडी के गमगीन माहौल में मंत्री ऐसी भाषा का प्रयोग करें तो उनके बारे में आम धारणा क्या बनेगी? यहीं न कि आम लोगों के मरने का इन्हें कोई गम नहीं है। हालांकि सिब्बल का यह दावा आम आदमी के लिए भी हास्यास्पद था कि आप तो छ: सालों तक संघीय जांच एजेंसी पर विचार ही करते रह गए और हमने दो हते में ही ऐसा कर दिया। सभी को पता है कि मुंबई हमले की विनाशलीला ने सारे कदमों के लिए इन्हें मजबूर किया, अन्यथा ये कहां जागने वाले थे। इस समय तो आपने एजेंसी का अधिनियम बनाने के पहले राज्यों से नहीं पूछा। तो पहले राज्यों की असहमति क्यों सामने आ जाती थी? राज्योेंं द्वारा इसे विधानसभाओं में पारित कराने की अनिवार्यता तो आज भी है।कुल मिलाकर पूरा राजनीतिक परिदृश्य अभी भी चिंताजनक है। स्पष्ट है कि समग्र रुप में सरकार ईमानदारी से आत्ममंथन कर अपनी भूलों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। हालांकि स्वयं प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री मुंबई हमलों से देश की रक्षा न कर पाने के लिए क्षमा तक मांग चुके हैं। लेकिन लगता है क्षमा याचना अंतर्मन से नहीं किया गया था। मंत्रियों के अंहकार और दर्प से भरे तेवर इसके प्रमाण हैं। ऐसे गैर ईमानदार इरादों के रहते आतंकवाद के खिलाफ देश की सुरक्षा सुनििश्चत नहीं हो सकती। निश्चय ही चारों ओर इससे अत्यंत ही बुरा संदेश गया है। भाजपा यह कहने की हालत में है कि मंत्रियों द्वारा तमाम प्रकार की निंदा को झेलते और उकसावे को सहन करते हुए भी उन्होंने वैसे अधिनियम का समर्थन किया जिनको वे पूरी तरह सख्त नहीं मानते। कल्पना करिए आडवाणी एवं भाजपा पर मंत्रियों ने जितने तीखे हमले किए उनसे बौखलाकर यदि विपक्ष विरोध कर देता तो क्या होता? राजग एवं वामदलों के विरोध के बाद यह पारित ही नहीं होता। इतना बड़ा जोखिम रहते हुए सरकार का यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाएगा। साफ है कि देश की सुरक्षा के लिए दलीय राजनीति से बाहर आने की कितनी भी घोषणा की जाए ये संकुचित राजनीति से बाहर नहीं निकले हैं। किसी प्रकार का सुरक्षा ढांचा, कोई कानून, कोई एजेंसी अपने-आप सब कुछ ठीक नहीं कर सकती। अंतत: राजनीतिक नेतृत्व के रवैये के अनुसार ही सम्पूर्ण तंत्र संचालित होगा। सरकार यदि सहनशीलता प्रदिशZत करती तो इसका वाकई देश में एवं बाहर भी सकारात्मक संदेश जाता। अब लोग यह मानने को विवश हैं कि मजबूरी में ही सरकार भी ठोस निर्णय कर रही है और विपक्ष उसका समर्थन, अन्यथा ये देश की सुरक्षा के लिए भी एकजुट नहीं होने वाले हैं।

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