अर्थ की चिंता
संसद में पेश मध्यावधि आर्थिक समीक्षा में विकास दर सात से आठ प्रतिशत रहने का अनुमान वैिश्वक आर्थिक मंदी को देखते हुए यकीनन संतोषजनक है, लेकिन निश्चयात्मक रुप से कहना कठिन है कि वाकई विकास की गति अनुमान के मुताबिक रह पाएगी। समीक्षा में ही वैिश्वक मंदी के प्रभावों को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि अक्टूबर 2008 के बाद से जोखिम बढ़ता जा रहा है। वास्तव में समीक्षा में महंगाई को छोड़कर लगभग सभी पहलुओं की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। महंगाई के 6.8 प्रतिशत तक आने तथा मार्च 2009 तक सामान्य हो जाने की भविष्यवाणी है। सामान्य से सरकार का तात्पर्य इसमें स्पष्ट नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक ने पांच प्रतिशत महंगाई दर का लक्ष्य दिया था। महंगाई कम होने से लोगों की जेब में धन बचेगा जिसे सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा माना जा सकता है। लेकिन वैिश्वक मंदी के प्रभावों से घरेलू निवेश एवं विदेशी निवेश में यदि भारी कमी आएगी, बीमा, बैंकिंग, परिवहन, विनिर्माण, टिकाऊ उपभोक्ता उद्योग, निर्यात आदि के साथ सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बना सेवा क्षेत्र तक यदि सुस्ती का िशकार रहेगा तो फिर अर्थव्यवस्था की बेहतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती। इस समीक्षा में राजकोषीय प्रबंधन के कमजोर होने का संकेत भी चिंता का कारण है। वर्तमान वित्त वषZ में इसके पांच प्रतिशत तक जाने का अर्थ यह है कि पिछले चार सालों से राजकोषीय घाटा कम करने के प्रयासों पर पानी फिर रहा है। इस वषZ राजकोषीय घाटा 2.5 प्रतिशत तक सीमित रहने का अनुमान लगाया गया था। दरअसल, उद्योगों सहित कारोबार के मंद पड़ने के कारण राजस्व वसूली कम होगी, जबकि दूसरी ओर आर्थिक गतिविधियां तेज करने के लिए जो पैकेज दिए जा रहे हैैं उनका भार भी राजकोश पर पड़ेगा। इससे घाटा तो बढ़ना ही है। आर्थिक समीक्षा तथा उसके बाद वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद विरमानी की बातों से यह साफ हो जाता है कि सरकार के सामने घाटे का वजन उठाने के अलावा कोई चारा नहीं है। वैसे अभी तो यह अनुमानित तस्वीर है वास्तविक स्थिति इससे बुरी भी हो सकती है। यदि वैिश्वक मंदी यूं ही कायम रही तो फिर भारत की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए दूसरे उपाय भी करने पड़ सकते हैं। हाल फिलहाल मंदी के ठहरने का अनुमान नहीं है। वैसे दुनिया भर के आर्थिक विशेषज्ञ जून 2009 तक आर्थिक मंदी के दूर होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। जाहिर है, उस समय तक भारत को अपनी अर्थव्यवस्था की गति बनाए रखने के लिए पैकेजों का ऑक्सीजन देते रहना होगा। प्रश्न है आखिर कब तक ऐसा किया जा सकेगा। एक सुझाव रिजर्व बैेंक द्वारा रेपो एवं रिवर्स रेपो दर को एक-एक प्रतिशत और नीचे लाने का है। सरकार ब्याज दर में कटौती एवं बैंकों के आरक्षित जमा अनुपात को नीचे लाकर अर्थव्यवस्था को गति देने की कोिशश कर रही है। लेकिन कर्ज सारी समस्याओं का समाधान नहीं है। संयमित उपभोग ही किसी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रह सकता है। दुर्भाग्यवश pashchimi अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैैं।
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