यह है जवाब
आतंकवादी हमलों के एक महीने के भीतर ट्राइडेंट और ताज का फिर से खुल जाना भारत के खिलाफ साजिश रचने वालों को करारा जवाब है। जिन आतंकवादी आकाओं ने इन होटलों को ध्वस्त करने का मंसूबा बनाया होगा वे यह दृश्य देखकर निश्चय ही निराश होंगे। ताज समूह के अध्यक्ष रतन टाटा ने इस अवसर पर बिल्कुल ठीक कहा कि हम घायल हो सकते हैंं, लेकिन पराजित नहीं हो सकते। बेशक, ये दोनों व्यावसायिक संस्थान हैं और इनका ज्यादा दिनों तक बंद रहना इनके स्वामियोें के लिए काफी नुकसानदायक हो सकता था, इसलि उन्होंने दिन रात एक करके इसे फिर से पूर्व अवस्था में लाने की कोिशश की। किंतु इस समय ये आतंकी हमलों से हुए विनाश एवं उनके मंसूबों के प्रतीक हैं। इस नाते इनका प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक महत्व बहुत ज्यादा है। उम्मीद करनी चाहिए कि मुख्य ओबेराय एवं होटल ताज का दूसरा भाग भी शींघ्र खुल पाएगा। वास्तव में आतंकवादियों एवं पूरी दुनिया को आतंकी हमलों से पराभूत ने होने की भारत की आंतरिक क्षमता, जज्बा और कर्मनिष्ठा का सबूत देने के लिए इन होटलों का शीघ्र आरंभ होना आवश्यक था। भारत को क्षत-विक्षत करने का मंसूबा पालने वालों के लिए यह बहुत ही बड़ा आघात है। वे यह देखकर निश्चय ही हवा में मुिट्ठयां भींच रहे होंगे कि इतने लोगों को मौत की नींद सुलाने के बावजूद लोग निर्भय होकर इन होटलों में आ रहे हैं। होटल प्रबंधन ने भी इसे आतंकवादी हमलों के समक्ष घुटने न टेकने का संदेश देने वाले अवसर के रुप में परिणत कर पूरे देश की भावनाओं का प्रतिनिधित्व किया है। इसी कारण पूरे देश का अतंर्मन इससे जुड़ा है। ऐसा नहीं होता तो सामान्यत: इन होटलों के खुलने या बंद होने में पूरे देश की रुचि नहीं हो सकती थी। यह अवसर ताज, ओबेराय या ऐसे तमाम बड़े होटलों के प्रबंधनों एवं उनमें व्याप्त सुविधाओं का उपभोग करने वाले संपन्न तबके के लिए आत्मविश्लेषण का भी विषय होना चाहिए। ऐसे सभी होटल प्राय: आम तबके की पहुंच से दूर हैं एवं उनमें आनेवाले ज्यादार लोग स्वयं को इस आम तबके से परे वििशष्ट श्रेणी की मानसिकता मेें जिते हैं। इन्हें यह समझ में आ गया होगा कि इनकी ऐकान्तिक वृत्ति संकटों से इनकी रक्षा नहीं कर सकती। ऐसे संकट से उबरने में पूरे देश की एकजुटता आवश्यक है। स्वयं को वििशष्ट मानने या ऐसे संस्थानों को बिल्कुल आम आदमी की पहुंच से दूर रखने के कारण उनके मन में इनके प्रति क्षेाभ का भाव पैदा होता है। इस समय भी ऐसा कहने वाले हैं कि भई, ओबेराय या ताज बंद रहे या खुले इससे हमारा क्या सरोकार होगा। इस मनोभाव का अंत कैसे हो कम से कम इस संदर्भ में तो इसकी पूरी जिम्मेदारी ऐसे संस्थानों के प्रबंधन एवं समाज में स्वयं को वििशष्ट मानने वाले तबके की ही है।
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