सोमवार, 25 मई 2009

Bank can't publicise defaulters

सम्मान से न खेलें बैंक

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग द्वारा बैंकों को कर्ज नहीं चुकाने वालों के नाम सार्वजनिक रुप से जारी करने पर रोक स्वागतयोग्य है। खुली अर्थव्यवस्था अपनाने के बाद देश में निजी व विदेशी बैंकों का व्यापार काफी तेजी से बढ़ा है, और आम उपभोक्ताओं की कुछ सुविधाएं भी बढ़ीं हैं। किंतु इससे उपभोक्ताओं की परेशानियों में भी इजाफा हुआ है। बैंक तो कई बार बिना मांगे क्रेडिट कार्ड भेज देते हैं और आप उसे स्वीकार नहीं करिए, फिर भी मासिक बिल एवं उससे संबंधित फोन आते रहते हैं। यह मामला इसी किस्म का था। सिटी बैंक ने बिना मांगे किस व्यक्ति को कार्ड भेजा और उसका प्रयोग न करने पर भी बिल भेजते रहे, उसका नाम इंटरनेट पर गबनकर्ता की सूची में डाल दिया जिस कारण दूसरे बैंकों ने भी उसे कर्ज देने से इन्कार किया। निजी एवं बहुराश्ट्रीय बैंकों के दुव्र्यवहार का एक नमूना है। ऐसे व्यवहारों की सजा बैंक को मिलनी चाहिए। उपभोक्ता आयोन के आदेश के बाद यदि बैंक किसी कर्ज न चुका पाने वाले का नाम सार्वजनिक करता है तो यह अवैध एवं संबंधित व्यक्ति के सम्मान को चोट पहुंचाने वाला माना जाएगा। आयोग ने बैंक पर मनासिक परेशानी के एवज में 50 हजार रुपया का जुर्माना लगाकर बिल्कुल उचित कदम उठाया है। बैंकों के काम करने के तौर तरीकों एवं व्यवहार को मर्यादित एवं गरिमापूर्ण बनाने की आवश्यकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ऐसे कई दिशा निर्देश जारी कर चुका है किंतु इनके व्यवहार में जितना सुधार होना चाहिए नहीं हो रहा है। न जाने कितनी बड़ी संख्या में लोग इनके रवैये से मानसिक यंत्रणा का िशकार हो रहे हैं। किसी कार्डधारक की मृत्यु के बाद बैंक उनके परिवार के सदस्यों को मानसिक रुप से परेशान करना शुरु करते हैं। लोगों के घरों पर वसूली के नाम पर बाहुबलियों तक के भेजने की घटनाएं हुईं हैं। किसी भी कानून के राज्य में काम करने का यह तरीका नहीं हो सकता। आखिर कितने लोग अदालतों तक पहुंचते हैं। बिना क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल किए ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है जिन्हें आने वाले फोन कॉल एवं धमकियों से बचने के लिए बैंकों का चक्कर लगाते देखा जा सकता है। एक बार आपने किसी को कर्ज न चुकाने वाला घोशित कर दिया तो उसे आवश्यकता होने पर दूसरे बैंक भी कर्ज नहीं देते। लोग बैंकों की किश्त समय पर अदा करें इसका प्रोत्साहन तो मिलना चाहिए, लेकिन कोई एक बैंक दूसरे को कैसे किसी को कर्ज देने से रोक सकता है। एक महाजन के साथ किसी कर्जदार का व्यवहार यदि अच्छा नहीं रहा तो उसके कई कारण हो सकते हैं एवं दूसरे महाजन के साथ भी उसका व्यवहार वैसा ही रहेगा यह आवश्यक नहीं है।

Accident claim includes allowences

सही फैसला

उच्चतम न्यायालय द्वारा परिजनों के मुआवजे में वेतन के साथ महंगाई भत्ता एवं आवास भत्ता शामिल किए जाने के फैसले को सही न्याय कहना होगा। अभी तक दुघZटनाओं से अप्राकृतिक मौत के मामले में मोटर वाहन दुघZटना प्राधिकरण प्राय: मुआवजे की रािश की गणना मूल वेतन के आधार पर ही करते हैं। मृतक के परिजन भत्तों के रुप में प्राप्त होने वाली रािश से वंचित हो जाते हैं। यह दृिश्टकोण पूर्ण न्याय के सिद्धांत को नकारता है। आखिर परिवार के लिए वेतन में मिलने वाली रािश का महत्व होता है। वह मूल वेतन के रुप में मिला या भत्ते के रुप में इससे कर्मचारी या परिवार को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए महत्व इस बात का है कि उनके हाथों अंतिम रािश कितनी आई। हम जानते हैं कि महंगाई भत्ता या आवास भत्ता आदि की अवधारणा कई कारणों से पैदा हुईं हैं, अन्यथा पहले एकमुश्त रािश ही वेतन के रुप में मिलती थी। यह आय का ही भाग है। उच्चतम न्यायालय ने यही तो कहा है कि इसे भी आय में शामिल करना चाहिए। एक तो परिवार के आय का स्रोत चला गया और ऊपर से आप उसे मिलने वाली रािश में काट छांट कर देते हैं। क्या कर्मचारी को जिन मदों मेें भत्ते के नाम पर रािश मिलती हैं मृतक के परिजनों के लिए उन मदों की प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है? न तो उनके लिए महंगाई अप्रासंगिक होता है और न आवास का किराया ही। इसलिए इस रािश को काट लेना अन्याय है। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद मुआवजे के संदर्भ में वशोZं से चली आ रही यह विसंगति दूर हो जाएगी। आखिर स्थापित मानक के प्रभाव में ही तो मध्यप्रदेश की िशक्षिका की मृत्यु के मामले में पहले निचली अदालत ने भत्तों को आय मानने से इन्कार कर दिया एवं उच्च न्यायालय तक ने इसकी पुिश्ट कर दी। निश्चय ही अदालतों की सोच इससे बदलेगी और केवल महंगाई एवं आवास भत्ता नहीं, अन्य जो भी भत्ते मृतक को प्राप्त होते थे उन सबको आय मानकर मुआवजे की रािश में शामिल किया जाएगा। दुघZटना से मृत्यु के मामले में ऐसी कई विसंगतियां हैं जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। जिस मामले में यह फैसला दिया गया वह नवंबर 2002 का है। यानी परिजनों को मुआवजे की रािश पाने के लिए करीब साढ़े छ: वशZ प्रतीक्षा करनी पड़ी। यदि परिवार में एक ही व्यक्ति अर्जन करने वाला हो तो उसकी क्या दशा होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। 50 हजार की अंतरिम रािश में कितने दिन काम चलेगा। इसलिए ऐसे मामले में फैसले की समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। दूसरे, मृतक के उत्तराधिकारी को पेंशन के साथ दोबारा शादी न करने की शत्तZ नत्थी है और इसे आधार बनाते हुए न्यायालयों ने कई फैसलों में मुआवजे की रािश लेने के साथ यही शत्तZ लगा दिया है। यह भी उचित नहीं है। इस शत्तZ को भी समाप्त करना चाहिए।

टीम मनमोहन

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ शपथ लेने वाली 19 सदस्यीय मंत्रिमंडल को बहुत हद तक जाने-पहचाने, अनुभवी, कसौटी पर खरे उतरे और राजनीतिक दृिश्ट से परिपक्व लोगों का समूह कहा जा सकता है। इसलिए मंत्रिमंडल की औसत उम्र 67 वशZ हो गई है। जिन विभागों की घोशणाएं हो गईं हैं उनमें भी अनुभव एवं योग्यता ही पैमाना बनाया गया है। अगर पी. चिदम्बरम के पास गृह मंत्रालय का प्रभार रहने दिया गया है तो उसका कारण उनके द्वारा मुंबई हमले के बाद अपनी नियुक्ति को सार्थक साबित करना ही है। इसी प्रकार प्रणब मुखजीै को यदि वित्त मंत्रालय का नेतृत्व दिया गया तो उसके पीछे प्रधानमंत्री का यह विश्वास ही है कि वे उनके साथ मिलकर आर्थिक समस्याओं से जूझती दुनिया से भारत को बचाकर बाहर निकालने में सक्षम होंगे। ए. के. एंटनी को भी रक्षा मंत्री के रुप में अपने बेहतर काम का इनाम मिला है। प्रधानमंत्री ने आतंकवाद से संघशZ एवं अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने को अपना प्रमुख उद्देश्य घोशित किया है। यह राहुल गांधी के युवा तर्क वाला मंत्रिमंडल नहीं है, लेकिन अभी आगे विस्तार होना है और उसमें निश्चय ही युवा चेहरे भी हमें दिखाई देंगे। वैसे भी मंत्रिमडल में अनुभवी एवं नए चेहरे के बीच संतुलन होना चाहिए। देश को सक्षम और संवेदनशील सरकार चाहिए जो कि सामने खड़ी चुनौतियों का मुकाबला कर उससे हमें बाहर निकाल सके। इसमें उम्र कहीं बाधा नहीं है। मंत्रियों ने जो कुछ कहा है उससे यह उम्मीद बनी है कि ये देश के लिए बेहतर काम करने का प्रयास करेंगे। लोकसभा का गणित भी इस बार प्रधानमंत्री का साथ दे रहा है जिसमें साथी दलों के अनावश्यक दबाव एवं धमकियों की संभावनाएं क्षीण हैं। हालांकि पहले चरण के शपथ ग्रहण में केवल कांग्रेस, राश्ट्रवादी कांग्र्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों के शामिल होने के कारण देश के सामने विखंडित राजनीति की कमजोरियों का अहसास बना रहा, लेकिन यह राजनीतिक गणित ही है, जिस कारण कांग्रेस बगैर द्रमुक के ही ऐसा करने का साहस कर पाई। वर्तमान मंत्रिमंडल को सोनिया गांधी द्वारा नया कांग्रेस कहना अनुपयुक्त नहीं है। आखिर ये दोनों पार्टियां कांग्रेस से ही निकली है। अगर द्रमुक एवं नेशनल कॉन्फ्रेंस के मंत्री भी शामिल होते तो निश्चय ही यह कांग्रेस परिवार का शपथ ग्रहण नहीं माना जाता। अच्छा हो द्रमुक जनादेश का संदेश समझते हुए शीघ्र बातचीत में मध्यमार्गी रुख अपनाए एवं सरकार में शामिल हो जाए। आखिर मतदाताअों ने राजनीतिक सौदेबाजी के दौर के अंत के लिए तो कांग्रेस एवं उसके साथियों के पक्ष में ऐसा जनादेश दिया है। मंत्रिमंडल में किसे लेना और नहीं लेना है यह प्रधानमंत्री का विशेशोधिकार होना चाहिए। साथी दल के नाते द्रमुक अपनी ओर से नाम दे सकता था, लेकिन नेतृत्व प्रधानमंत्री के हाथों हैं इसलिए वे किसे और कितने को साथी बनाएं इसे आरोपित नहीं किया जाना चाहिए।

14 Lok Sabha ends

14 वीं लोकसभा का उत्तराधिकार

मंत्रिमंडल की अंतिम बैठक के बाद प्रधानमंत्री द्वारा इस्तीफा सौंपने एवं लोकसभा भंग करने की सिफारिश के साथ 14 वीं लोकसभा एवं संप्रग सरकार का औपचारिक अंत हो गया। दूसरी ओर चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव में विजेताओं की सूची सौंपने के साथ 15 वीं लोकसभा के गठन की प्रक्रिया भी आरंभ हो गई। 14 वीं लोकसभा की नींव पर खड़ी हो रही नई लोकसभा उसके प्रभावों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती। इस लोकसभा के राजनीतिक समीकरणों का जनता के मनोविज्ञान पर यकीनन प्रभाव पड़ा और उसकी परिणति हमने एक स्थिर सरकार के जनादेश के रुप में देखा है। 14 वीं लोकसभा पहली लोकसभा थी जिसमें कोई कम्युनिस्ट अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचा और अंतिम अवधि में उसे पार्टी का आदेश न मानने पर निश्काशित किया गया। अध्यक्ष और विपक्ष के बीच सीधा टकराव का वाकया भी इसी लोकसभा ने देखा। इसके पहले कभी अध्यक्ष के रवैये से नाराज होकर विपक्ष ने बहिर्गमन नहीं किया था। 11 सांसदों को उनके कार्यकाल में बखाZस्त करके भी इस लोकसभा ने अभूतपूर्व कदम उठाया। सांसदों की खरीद-फरोख्त के आरोप के साथ रुपए के बंडल सदन के पटल पर लहराने का कारनामा भी इसी लोकसभा में हुआ। ये ऐसे वाकये हैं जिनकी पुनरावृत्ति कोई नहीं चाहेगा। हमारी उम्मीद भी है और दुआ भी कि 15 वीं लोकसभा ऐसे शर्मनाक वाकयों से मुक्त होकर लोकतंत्र के पवित्र मंदिर की छवि पुनस्थाZपित करने में सफल हो। देश का एक-एक नागरिक यही चाहेगा कि 14 वीं लोकसभा की तरह कार्यवाही के निर्धारित समय में से 423 घंटे हंगामें एवं बहिर्गमन की भेंट न चढ़े। इस संसद ने अपनी निर्धारित बैठकों में से करीब एक चौथाई यानी 24 प्रतिशत समय व्यर्थ गंवा दिया। हमारे राजनेता यदि देश में अपने रवैये के खिलाफ बढ़ रही जुगुप्सा को समझेंगे तो यकीनन उनका रवैया बदला होगा। 15 वीं लोकसभा इस मायने में अपने पूर्वज से भिन्न होगी कि इसमें बहुमत के लिए सरकार को बाहर से किसी के समर्थन की अपरिहार्यता नहीं है। साथ ही सरकार को बनाए रखने के लिए बहुत ज्यादा दलों को मंत्रिमंडल का अंग बनाने की भी आवश्यकता नहीं। ऐसे मेें सरकार बचाने की विवशता में किसी अवांछित कदम की संभावना यूं भी नहीं है। पूर्व की तुलना में सदन का संचालन ज्यादा आसान होगा। विपक्ष को भी पराजय के आघात से सीख मिली होगी। ऐसे कई सांसद इस लोकसभा में नहीं होंगे जो कि हंगामों के लिए जाने जाते थे। लेकिन संसदीय मर्यादा का पालन करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चन्द्रशेखर तथा विरोध को भी मर्यादित शब्द देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी इस लोकसभा में नहीं होंगे। युवा एवं नए चेहरों की काफी संख्या वाली इस लोकसभा में हमें उम्मीद है कि सांसदों का व्यवहार बदला होगा और हमें उत्कृश्ट संसदीय कार्यव्यवहार देखने को मिलेगा।

रविवार, 24 मई 2009

Jajiya on sikh in Pak

जजिया का फरमान आधुनिक सभ्यता का अंत करने की सोच से पैदा हुई है
यह हिन्दुस्तान के लिए उठ खड़े होने का समय है

ओराकजाई पाकिस्तान के पिश्चमोत्तर इलाके के उन सात स्वायत्त क्षेत्रों में ‘ाामिल है जिसे मिलाकर फाटा यानी फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया या संघ प्रशासित कबिलाई क्षेत्र बना है। सरदार कल्याण सिंह के पूर्वज ओराकजाई के फीरोजखेल की विहंगम घाटी मेें न जाने कब बस गए। विभाजन के बाद भी उन लोगों ने उस क्षेत्र को छोड़ा नहीं। पाकिस्तान के बारे में आम सोच चाहे जो हो, कल्याण सिंह जैसे दूसरे सिख परिवारों को पिछले छ: दशकों में कभी मजहबी आधार पर भेदभाव नहीं झेेलना पड़ा। उस क्षेत्र के पख्तूनों ने उनके सहित दूसरे सिखों का पूरा ख्याल रखा। लेकिन 45 वशZ की आयु में उनके लिए सब कुछ बदल गया है। तहरीक-ए-तालिबान के प्रमुख बैतुल्ला मेहसूद के सहयोगी हकीमुल्ला मेहसूद ने यहां इस्लामी राज्य की घोशणा कर दी एवं उनके आतंक से सिख परिवारों को पेशावर भागना पड़ा। कल्याण सिंह ने फिर भी अपने पूर्वजों का घर नहीं छोड़ा। उन्हें विश्वास था कि ओराकजाई कबिलाओं के साथ वे पूर्णतया सुरक्षित हैं। किंतु एक दिन हकीमुल्ला स्वयं अपने लड़ाकों के साथ वहां उपस्थित हुआ एवं सिख समुदाय के सदस्यों को एकत्रित होने का आदेश दिया। उन्हें हुक्म सुनाया गया कि तुम सब गैर इस्लाम मजहब के हो, इसलिए या तो तुम जजिया कर दो या फिर इस्लाम कबूल करो। जजिया की रािश दस करोड़ बताई गई। कल्याण सिंह को तालिबान उठाकर ले गए, उन्हें दस दिनों तक कब्जे में रखा, यातनाएं दीं। बीच-बचाव एवं मिन्नत के बाद इन लोगों ने जजिया की रािश घटाकर 4 करोड़ एवं फिर डेढ़ करोड़ किया। कल्याण सिंह को रािश जुटाने के लिए रिहा किया गया, लेकिन उनके एवं अन्य 50 सिख पुरुश महिलाओं को जमानत के रुप में बंधक बनाकर रखा गया इस धमकी के साथ यदि तुमने भागने की कोिशश की तो इनका कत्ल कर दिया जाएगा या इन्हें मुसलमान बना दिया जाएगा। कल्याण सिंह अभी पेशावर में है और धन जुटाने की कोिशश कर रहे हैं। केवल अराकजाई नहीं, पूरे पिश्चमोत्तर क्षेत्र में जो करीब 10 हजार सिख रहते हैं उनके लिए इतनी बड़ी रािश अदा करना आसान नहीं है। ये मुख्यतया पेशावर में ही बसे हैं। इनमें कुछ तो अफगानिस्तान में मुजाहिद्दीनों एवं तालिबानों के आतंक के राज्य से बचकर यहां पहुंचे और कुछ पहले से ही हैं। ये मुख्यतया कपड़े के व्यापारी हैं या फिर कॉस्मेटिक्स के व्यापार में लगे हैं। ओराकजाई एवं ख्ौबर के सिख स्थानीय कबिलाओं की तरह हशीश का कारोबार करते हैं। हालांकि उलेमाओं की पंचायत यानी जिरगा की अपील के बाद उन परिवारों को रिहा किया गया लेकिन ‘ार्त यही कि ये 1.3 करोड़ जजिया अदा करें।भारत में बैठकर हम निश्चय ही पिश्चमोत्तर पाकिस्तान में सिखों की स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते। किंतु इस विवरण मात्र से जो तस्वीर हमारे-आपके जेहन में उतरती है उससे सिहरन तो पैदा होता ही है। जजिया इस्लामी ‘ाासन में गैर इस्लामी निवासियों जिन्हें इस्लामी कानून में धिम्मी कहा गया है, पर लगाया जाने वाला कर है। मध्यकालीन अरब एवं भारत के इतिहास में जजिया एक आतंकित करने वाला शब्द था। हालांकि हाल के वशोZं में कुछ विद्वानों ने जजिया की एक सामान्य कर के रुप में भी व्याख्या की है एवं यह बताने का प्रयास किया है कि इस्लाम के अनुसार जकात भी एक कर है जो कि मुसलमानों को देना पड़ता है। इसलिए गैर मुसलमानों पर यदि जजिया लगाया गया तो यह कतई अन्यायपूर्ण नहीं था। ऐसी दलीलों से सहमति कठिन है। ए.एस. ट्रिट्टन, मैिक्सम रौडिन्सन, बाट ये... जैसे विख्यात पिश्चमी इतिहासकारों ने यह बताया है कि आरंभिक इस्लामी साम्राज्यों मिस्र, सीरिया ... में इस्लाम धर्मावलंबी राज्य के खजाने में कुछ देते ही नहीं थे, क्योंकि उसमें विजीत धिम्मी ईसाइयों की भारी आबादी थी, जिनसे वसूले गए जजिया से पूरा खर्च चलता था। रॉडिन्सन ने तो मोहम्म्द साहब की जीवनी में यह लिखा है कि कई बार इस्लाम में धर्मांतरण इसलिए निशिद्ध किया गया है, क्योंकि इससे कर का आधार कमजोर होता है। वास्तव में जजिया की जकात से कोई तुलना नहीं थी। मध्यकाल में करों पर काम करने वालों ने इसके काफी विवरण दिए हैं। बेन शेमेश की टैक्सेशन इन इस्लाम, जा फर की किताब अल-खराज के अलावा के.एस. लाल की थ्योरी एंड प्रैिक्टस ऑफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया आदि से हमें इनकी पूरी जानकारी मिल जाती है। इसके अनुसार जकात अनिवार्य नहीं था, उसकी दर कम थी, भारत में संपत्ति पर ढाई प्रतिशत तक था, इसमें दाता को स्वयं अपनी संपत्ति या आय के बारे में बताना था और उसे स्वीकार किया जाता था। जकात कई बार केवल सीमा शुल्क के रुप में लिया जाता था। इसके विपरीत जजिया मनमाने ढंग से और जबरन वसूला जाता था। इसके साथ अपमान और उत्पीड़न जुड़ा था। मध्यकालीन शासकों ने न जाने कितने दूसरे मजहब के लोगों को जजिया न देनेे के कारण इस्लाम कबूलने को विवश किया। जाहिर है, जब तालिबान ने अफगानिस्तान के शासन पर कब्जा किया तो वहां इस्लामी कानून के नाम पर यही किया और स्वात में पाकिस्तान सरकार द्वारा शरीया कानून लागू करने को मान्यता देने के बाद इन्होंने यही करने की कोिशश की। जजिया न देने पर हकीमुल्ला मेहसूद के आदेश में कई घरों एवं दूकानों को ध्वस्त कर दिया गया। भारत द्वारा सिखों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करने के बाद पाकिस्तान का बयान है कि सिख उनके नागरिक हैं जिनकी रक्षा उसकी जिम्मेवारी है एवं भारत उसकी चिंता न करे। अगर पाकिस्तान वाकई रक्षा करने के काबिल होता तो उनकी ऐसी दुर्दशा ही नहीं होती कि उन्हें गुरुद्वारों में शरण लेनी पड़ती। क्या पाकिस्तान सरकार ने जब कट्टरपंथियों के साथ समझौता कर शरीया कानून लागू करने की बात मानी तब उसे इस बात का इल्म नहीं था कि वहां गैर इस्लामी लोगों के साथ ये पागल मुजरिमाना बर्ताव कर सकते हैं? जाहिर है, असली दोश तो पाकिस्तान की सरकार का है, जिसने आतंकवादियों के सामने घुटने टेके। अब स्वात क्षेत्र में हालांकि सेना आतंकवादियों के साथ युद्ध कर रही है और यह सही दिशा है। एक राज्य के भीतर दो कानून कैसे चल सकता है? किंतु उन्हें यहां तक पहुंचना ही एक राज्य के रुप में पाकिस्तान की विफलता है। हम जानते हैं कि कट्टरपन्न, आतंकवाद आदि के प्रति पाकिस्तानी सत्ता प्रतिश्ठान का नजरिया दुविधापूर्ण रहा है। इस्लाम के नाम पर भारत से टूटकर अलग हुआ यह मुल्क वास्तव में इसी कारण अपना कोई नििश्चत स्वरुप बना ही नहीं पाया। आधुनिक राज्य व्यवस्था का कोई दूसरा मुल्क मजहबी कानून की कतई इजाजत नहीं देता। इन्होंने केवल सिखों पर अत्याचार नहीं किया, स्वयं मुसलमानों में पढ़े-खिले आधुनिक सोच वाले भी इनका क्रूर िशकार हुए हैं। लड़कियों के विद्यालयों को ध्वस्त करना, लड़कियों के विद्यालय जाने पर निशेध, महिलाओं के अकेले बाहर निकलने की मनाही... और इसका उल्लंघन करने पर कठोर सजा। सजा के जो वाकये हमारे सामने आए हैं वे दिल दहलाने वाले हैं। इनकी तो घोशणा है कि पिश्चम के लोकतंत्र अपनाने के कारण पाकिस्तान नामक देश ही गैर इस्लामी हो चुका है जिसे पूर्ण इस्लामिक बनाना है। पाकिस्तान के नेताओं ने गैर इस्लामी कृत्य किया है। इस प्रकार ये केवल गैर इस्लामी समुदायों के ही नहीं, पूरी मानवी सभ्यता के दुश्मन हैं। जजिया का फरमान इस सभ्यता को नश्ट करने की उनकी सोच का ही अंग है। ओराकजाई कबिले के लोग जो स्वयं मुसलामान हैं, ने इनका विरोध किया। एक जिरगा में इनके विरोध की रणनीति पर बैठक बुलाई गई और तालिबानों न उसे ही उड़ा दिया जिसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए। उसके बाद ये भयवश खामोश हो गए। इसी प्रकार फीरोजखेल के बगल में कलाया है जहां के िशया तालिबान से लड़ रहे हैं। तालिबानों ने सबसे ज्यादा निशाना तो मुसलमानों को ही बनाया है। इस समय स्वात से घरबार छोड़कर कई लाख मुलसमान अपने ही देश में ‘ारणार्थी बन चुके हैं। कल्पना करिए, अगर इनका विस्तार हो गया तो ये किस प्रकार कोहराम मचाएंगे। इस प्रकार यह लड़ाई पूरी दुनिया की है। हिन्दुस्तान इससे सीधा प्रभावित है, इसलिए इसे इसके खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए।

Election Verdict

इस जनादेश से नये राजनीतिक युग की नींव पड़ी है
वाह रे जनादेश! सारे आकलन और अनुमान एकबारगी धाराशायी। 15 वीं लोकसभा चुनाव परिणाम का सबसे बड़ा निश्कशZ यही है कि देश की जनता राश्ट्रीय स्तर पर स्पश्ट निर्णायक जनादेश की पहल कर चुकी है। यह कहा जा सकता है कि 1989 के साथ राश्ट्रीय राजनीति में जो चक्र आरंभ हुआ वह अब पूरा हो रहा है। संप्रग का अकेले बहुमत के करीब पहुंचना एवं अपने पूर्व साथियों के साथ स्पश्ट बहुमत पाना समस्त कल्पनाओं से परे है। कांग्रेस अपने साथी दलों के साथ सबसे ज्यादा स्थान पाएगी यह तो साफ था लेकिन सारे विश्लेशकों का मानना यही था कि उसे अंतत: वामदलों व तीसरे मोर्चे के नाम से एकत्रित दलों से समर्थन की दरकार पड़ेगी। इसी सोच के तहत बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विचार-विमशZ के केन्द्र में आ गए थे। मायावती, जयललिता, चन्द्रबाबू नायडू, देवेगौड़ा सबका राजनीतिक महत्व इतना बढ़ गया था कि इनके बगैर किसी सरकार की कल्पना तक नहीं की जा रही थी। चुनाव परिणामों ने इन सबको राश्ट्रीय राजनीति के हािशए में पटक दिया है। बिहार में जनदा दल-यू एवं भाजपा के गठबधन का अच्छा प्रदशZन भी राजग के काम नहीं आया और उन्हें विपक्ष में ही अपनी भूमिका निभानी होगी। कांग्रेस ने 1991 के बाद पहली बार इतनी अधिक सीटें जीतीं है और उसने भाजपा के 1998 1999 के आंकड़े को भी पार कर दिया है। देश की राजनीति जितनी विखंडित हो गई थी उसमें स्वयं कांग्रेस भी इतनी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं कर रही थी। इसका प्रमाण उसका स्वयं का चुनाव बाद सर्वेक्षण परिणाम था जिसमें 161 सीटें मिलने का आकलन था। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक वामदलों का रिझाने वाले वक्तव्य दे रहे थे। इस प्रकार यह मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि कुछेक स्थानों को छोड़कर बहुसंख्य मतदाता ने लंबे समय की चलायमान राजनीति से उबकर देश की राजनीति को स्थिर करने के लिए मतदान किया है। चुनाव परिणामों का कई प्रकार से विश्लेशण किया जा सकता है, लेकिन अंतिम अंकगणित को कोई नकार नहीं सकता। गहराई से देखेंगे तो इस चुनाव में राजनीतिक अस्थिरता के लिए जिम्मेवार ज्यादातर दलों को जनता ने नकार दिया है। इसमें सबसे पहला स्थान वामदलों का आएगा। पिश्चम बंगाल एवं केरल का लाल दुर्ग दरक चुका है। इन दोनों राज्यों में माकपा न अकेले सबसे बड़ी पार्टी रही और न उसके नेतृत्व वाला मोर्चा। मनमोहन सिंह सरकार से 18 जुलाई 2008 को समर्थन वापसी के बाद से इनका दावा था कि ये अगले चुनाव में गैर कांग्रेस एवं गैर भाजपा सरकार बनाएंगे। आज ये एक ताकतवर विपक्ष की भूमिका निभाने की हालत तक में नहीं है। यह भारतीय राजनीति की बहुत बड़ी घटना है। दोनों राज्यों में कांग्रेस एवं उसके सहयोगी तृणमूल द्वारा वामदलों के स्थानापन्न का राश्ट्रीय महत्व बिल्कुल स्पश्ट है। निस्संदेह, प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस गठजोड़ की विजय के स्थानीय कारण हैं और इसका सेहरा ममता बनर्जी के सिर जाएगा, किंतु यह भी साफ है कि जनता ने वामदलों विशेशकर माकपा के हाथ से राश्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका का सूत्र छीन लिया है। यह 1989 के बाद पहली बार होगा जब माकपा दोनों में से किसी पक्ष में प्रभावी भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं होगी। कांग्रेस के भीतर जो नेता वामदलों के साथ मेलमिलाप कर चुनाव में उनके साथ उतरने के हिमायती थे वे गलत साबित हुए। वास्तव में कोई पार्टी जनता के अंतर्मन को पूरी तरह भांपने मे सफल नहीं रही। साफ है कि देश और दुनिया जिस अवस्था से गुजर रही है उसमें लोग केन्द्र में एक स्थिर सरकार चाहते थे। जयललिता, चन्द्रबाबू नायडू.... आदि का तीसरे मोर्चा के नाम से वामदलों के साथ एकत्रित होने से जनता के बीच विपरीत संदेश गया। तमिलनाडु एवं आंध्रप्रदेश का परिणाम हमारे सामने है। सारे अनुमानों में जयललिता का गठजोड़ आगे था और करुणानिधि के द्रमुक कांग्रेस गठजोड़ के सूपड़ा साफ होने की बात की जा रही थी। परिणाम ऐसा नहीं आया। अन्नाद्रमुक की 2004 के शून्य के मुकाबले लोकसभा में प्रतिनिधित्व हुआ, लेकिन राजनीति को प्रभावित करने की दृिश्ट से उनका होना और न होना बराबर है। आंध्र में कांग्रेस ने रिकॉर्ड जीत हासिल की और तीसरा मोर्चा धाराशायी हो गया। ध्यान रखने की बात है कि कांग्रेस के पक्ष में ऐसा ही परिणाम आंध्र विधानसभा चुनाव में नहीं आया। जाहिर है वहां सत्ता विरोधी रुझान था, किंतु केन्द्र में राजनीतिक अस्थिरता दूर करने की जन मन:स्थिति लोकसभा चुनाव में सब पर भारी पड़ गई। जम्मू कश्मीर में पीडीपी का सफाया एवं कांग्रेस नेशनल कांफ्रेंस गठजोड़ की सफलता को इसी सोच की परिणति मानी जाएगी। आखिर पीडीपी ने प्रदेश में सरकार से समर्थन वापस लिया था। इस जन मनोविज्ञान के रास्ते मायावती जैसी नेत्री की महत्वाकांक्षा भी बाधा बन रही थी। जिस प्रकार उनके समर्थकों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना दिया था, निश्चय ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की आशातीत सफलता के पीछे उसकी बहुत बड़ी भूमिका है। इसे हम कांग्रेस के रुप में विकल्प उपलब्ध होने के कारण मुसलमान, दलित एवं ब्राह्मण मतों का आंिशक धु्रवीकरण की परिणति कह सकते हैं। यह सही भी है कि कांग्रेस के ये परंपरागत मतदाता उसके अकेले मैदान में उतरने के कारण उ. प्र. एवं बिहार दोनों जगह उसकी ओर मुड़े हैं। बिहार में भले राजग की लहर में उसे सीटें नहीं मिलीं, लेकिन उसके मतों में कई गुणा बढ़ोत्तरी हुई है। ये मतदाता पिछले लंबे समय से विकल्प उपलब्ध न होने के कारण दूसरे दलों को मत देकर देश में राजनीतिक अस्थिरता का कारण बनते थे। इन्होंने अब अपना इरादा बदलने का संकेत दे दिया है। अगर कांग्रेस इसे आगे अपनी राजनीतिक रणनीति से सुदृढ़ करने में सफल रही तो निश्चय ही वह अकेले बहुमत पाने की स्थिति में पहुंच जाएगी। उसके परपंरागत मताधार पर राजनीति की जमीन खड़ी करने वाली पार्टियों के लिए यह खतरे की घंटी है। तो परिणाम के सबक साफ है। राश्ट्रीय पार्टियां छोटे दलों के दबाव में आए बगैर अपनी राजनीति करें। चुनाव परिणाम का सतही विश्लेशण भी साबित कर देता है कि ज्यादातर जगहों पर आम मतदाता ने अपने नजरिए से बेहतर राश्ट्रीय विकल्प का वरण किया है। उसे दोनों प्रमुख राश्ट्रीय धुरी में से जिसमें भी राजनीतिक स्थिरता की संभावना निहित लगी उसे समर्थन दिया है। बिहार एवं झारखंड में भाजपा-जद यू, या कर्नाटक, हिमाचल...आदि में भाजपा की सफलता भी राश्ट्रीय राजनीति में स्थिरता लाने का ही द्योतक है। हां, वहां यदि तीसरे चौथे विकल्प को समर्थन मिलता तो अवश्य इसका दूसरा राजनीतिक अर्थ होता। बिहार एवं झारखंड में लोजपा, राजद, के सफाए की क्या व्याख्या होगी? लालू यादव तक सारण से अंतिम समय में किसी प्रकार विजीत हुए, लेकिप राम विलास पासवान उस हाजीपुर सीट से हारे जहां से उन्होंने सबसे ज्यादा मतों से विजय का रिकॉर्ड बनाया था। यह कोई साधारण घटना नहीं है। इसी प्रकार झारखंड में झामुमो भी राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक बन चुकी थी। कर्नाटक में देवेगौड़ा एवं उनका जद-सेक्यूलर राजनीतिक स्थिरता का प्रतीक नहीं बन पाया था। उड़ीसा को छोड़कर तमाम परिणामों का एक ही स्वर है। कांग्रेस एवं भाजपा को यह स्वर सुनना चाहिए। इस चुनाव परिणाम ने दो ध्रुवीय राजनीति की ठोस नींव एवं दीवार खड़ी कर दिया है, जिसे सुदृढ़ करना राश्ट्रीय दलों का दायित्व है। आखिर सारी आशंकाओं के विपरीत दोनों मुख्य पार्टियों को करीब सवा तीन सौ सीटें तथा इनके गठजोड़ को करीब सवा चार सौ सीटें मिली हैं। इस प्रकार 15 वीं लोकसभा चुनाव से जिए नए चक्र की शुरुआत हुई है उसे मुकाम तक पहुंचाने की चुनौती दोनों प्रमुख दलों के सामने है। तो क्या ये इस चुनौती को स्वीकार कर युगांतकारी भूमिका निभाने को तैयार हैं? यह ऐसा प्रश्न है जिससे उत्तर पर देश की राजनीतिक नियति निर्भर करता है।

शुक्रवार, 15 मई 2009

Nitish Modi handshake

रैली बड़ी या नीतीश मोदी मिलन?

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की लुधियाना महारैली में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से हाथ मिलाना सबसे बड़ी खबर थी या रैली का आयोजन एवं उसमें नेताओं के एकजुट रहने का भाषण ? देश के आम नागरिक के लिए इसका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है, रैली एवं नेताओं की एकजुटता। किंतु, राजनीति एवं मीडिया ने इस सवाल को उलझा दिया है। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और मीडिया के कुछ हलकों की सुिर्खयों के अनुसार तो नीतीश मोदी का एकता प्रदशZन ही सबसे महत्वपूर्ण बात थी। क्यों? इस सवाल के जवाब के लिए यह देखना जरुरी होगा कि नीतीश मोदी के हाथ मिलाने को मुद्दा बनाने वाले हैं कौन? इसका सबसे तीखा विरोध लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान एवं राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की ओर से हुआ है। इन्होंने नीतीश कुमार को धोखेबाज तक कह दिया है। हम आप सब जानते हैं कि इन दोनों पार्टियों ने पिछला लोकसभा में चुनाव गुजरात दंगा और नरेन्द्र मोदी को सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया था। हालांकि 2005 के विधानसभा चुनाव में भी इन्होंने मोदी एवं दंगे को मुद्दा बनाया, किंतु इन्हें लोकसभा चुनाव के अनुसार सफलता नहीं मिली। भाजपा के संदर्भ में मुसलमानों की भयग्रंथि को घनीभूत बनाए रखने में ही लालू की रजनीति का तानाबना टिका है। पासवान तो अपने सेक्युलर चरित्र का सबूत ही यह कहकर देते हैं कि उन्होंने गुजरात दंगों के विरुद्ध ही राजग का दामन छोड़ा था। ऐसी राजनीति और मीडिया की कृपा से मोदी सक्रिय मुसलमानों के बीच आतंक बन चुके हैं। नीतीश ने बिहार मुसलमान वोट बैंक को दरकाकर वैसे भी इनको कमजोर किया है। जाहिर है, इनके लिए नीतीश पर तीखा हमला अस्वाभाविक नहीं है। हालांकि यह बात सही है कि नीतीश एवं जद-यू के अध्यक्ष शरद यादव राजग में होते हुए भी मोदी के साथ एक मंच पर आने से अब तक बचते रहे हैं। नीतीश के आग्रह पर ही भाजपा की सबसे ज्यादा चुनावी सभाएं संबोधित करने वाले मोदी न 2004 में बिहार गए, न 2005 में एवं न इस बार। पिछले दिनों एक टी। वी. साक्षात्कार में जब नीतीश से यह पूछा गया कि वे मोदी के साथ मंच पर आएंगे तो उन्होंने इसका जवाब दिया, नहीं, जरा भी नहीं। इस परिप्रेक्ष्य में लुधियाना की तस्वीर उनके पूर्व रवैये के विपरीत दिखती है। किंतु हम यह न भूलें कि लुधियाना में राजग की रैली थी और उसका एक घटक होने के नाते नीतीश की वहां उपस्थिति लाजिमी थी। निश्चय ही इस रैली के पीछे भाजपा की ही भूमिका थी लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल मेजबान थे और उनके प्रकट आमंत्रण पर ही सारे नेताआंें ने िशरकत किया। जब वहां राजग के सभी मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति तय थी तो फिर मोदी आएंगे या नहीं ऐसी कयास ही बेमानी थी। विरोधियों की इच्छानुसार यदि नीतीश या दूसरे नेता वहां नहीं जाते तो इससे राजग में अनेकता का संदेश जाता और यही लोग उसका उपहास उड़ाते। लोकसभा चुनाव में यदि ये एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं तो इनके बीच एकता दिखनी ही चाहिए थी। लालू, पासवान या अन्य विरोधियों की इच्छा से तो जद-यू एवं भाजपा का गठबंधन नहीं बना हुआ है। यह गठबंधन ही इन सारे विरोधियों के विरुद्ध है। मंच पर यदि मोदी का हाथ बढ़ा तो क्या सामने वाला यह कहकर हाथ खींच लेगा नहीं मैं आपसे हाथ नहीं मिला सकता? आखिर केन्द्र सरकार द्वारा आहूत बैठकों में मोदी आते हैं और जिनसे वे चाहते हैं हाथ मिलाते हैं। प्रधानमंत्री सहित जिन मंत्रियों की उनमें उपस्थिति अनिवार्य होती है वे वहां रहते हैं और उनसे भी सहज ढंग से मोदी मिलते हैं। मीडिया के जिस वर्ग ने छाती पीटने का माहौल बनाया हुआ है उनके पत्रकार भी बाजाब्ता मोदी से हाथ मिलाते हैं। कहा जा सकता है कि दोनों हाथ मिलाने में अंतर है। किसी सामान्य मुलाकात में हाथ मिलाने एवं चुनावी रैली में हाथ मिलाकर एकता प्रदशZन करने का संदेश बिल्कुल अलग जाता है। रैली में जिस प्रकार मोदी ने नीतीश से हाथ मिलाते हुए उन्हें उठाया एवं जनता के बीच एकता दशाZयी उसका संदेश वाकई अलग था। यह भी साफ था कि सब कुछ मोदी की ओर से ही हुआ और उन्होंने पूर्व योजना के अनुसार भूमिका अदा की। किंतु यह जिन्हें भी अजूबा एवं आपत्तिजनक लगा उनकी अपनी मानसिकता के कारण। मोदी को हौव्वा एवं तथाकथित सेक्यूलर दुनिया में अछूत बनाने वालों ने बिल्कुल अव्यावहारिक तरीके का माहौल बनाया हुआ है। ऐसा लगता था मानो मोदी और नीतीश के मंच पर आने से कुछ अजूबा घटित हो जाएगा। जिस भाजपा के नेतृत्व में राजग गठित है उसके मोदी बड़े नेता हैं, पार्टी का एक वर्ग तो उन्हें अगला प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तक बना रहा है। कोई पार्टी या नेता भाजपा के साथ रहते हुए मोदी के साथ अछूत का बर्ताव करता रहे यह संभव ही नहीं है। इस प्रकार नीतीश का पूर्व रवैया ही गलत था। यदि उन्हें भाजपा स्वीकार है तो मोदी भी स्वीकार्य होना चाहिए। दोनों बातें एक साथ चल भी नहीं सकतीं। यह तो हमारे युग का नैतिक पतन है कि मोदी को खलनायक बनाकर अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ लिया गया है। मुसलमानों का हितैशी साबित करने का मतलब मोदी का आक्रामक विरोध या उनसे घोशित दूरी। आपको और कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं है। मुसलमानों के अंदर भयगं्रंथि पैदा करके राजनीति करनेे वाले बुनियादी सवालों से बचने के लिए हमेशा ऐसा कोई प्रतीक ढूंढते हैं, जिनसे उन्हें बरगलाया जा सके। किंतु इनके अनुसार यदि राजनीति संचालित हो तो न भाजपा के साथ कोई दल होना चाहिए और न आम जनता का मत ही उसे मिलना चाहिए। ये दोनों बातें नहीं हो रहीं हैं। किसी को चाहे जितना नागवार गुजरे लुधियाना में एक मंच पर नौ दलों का इकट्ठा होना चुनाव प्रक्रिया के अंतिम दौर की सबसे बड़ी घटना थी। अगर संप्रग एवं तीसरे मोर्चे से तुलना करें तो इस रैली के बाद राजग सबसे बड़ा गठजोड़ है। ये दोनों घटक चाहकर भी चुनाव के बीच कोई रैली नहीं कर सके। इनकी सारी उम्मीदें चुनाव बाद के समीकरण पर है। कल तक तीसरे मोर्चे का भाग माने जाने वाले तेलांगना राश्ट्र समिति के प्रमुख चन्द्रशेखर राव का राजग के साथ आना तो वामदलों के लिए भी तगड़ा झटका है। राजग के नजरिए से यह शत-प्रतिशत रैली थी। इससे दोनों समूहों का तिलमिलाना स्वाभाविक है। निश्चय ही कुछ लोग इस सफलता से ध्यान हटाने के लिए भी नीतीश मोदी मिलन को मुद्दा बना रहे हैं। नीतीश तो सुिर्खयां ही इसलिए बने, क्योंकि कांग्रेस एवं वाममोर्चा दोनों ने उनकी ओर दाना डाला था। माहौल ऐसा बनाने की कोिशश की गई थी मानो नीतीश अपना सेक्यूलर चरित्र प्रमाणित करने के लिए भाजपा से अलग होने को मजबूर हो जाएंगे। माकपा नेता एवं प. बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने सार्वजनिक भाशण में यह कहा कि नीतीश से हमारी बातचीत चल रही है और वे भी भाजपा को छोड़कर आ जाएंगे। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने तो भावी साझेदारों के रुप में नीतीश का विशेश तौर पर उल्लेख किया। इस एक रैली ने इन आशाओं पर तुशारापात कर दिया। जब हमारी कामना ही गलत होगी तो उसका परिणाम मनोनुकूल कैसे आ सकता है। हालांकि सबसे बड़े समूह के रुप में होने का प्रमाण देने के बावजूद यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि इस रैली से राजग के लिए सत्ता की दावेदारी पुख्ता हो गई है। वास्तव मेें किसी को बहुमत न मिलने की संभावनाओं के बीच इससे अगली सरकार को लेकर अनिश्चय बढ़ा है। बहुमत न मिलने की स्थिति में भी यदि राजग के ये घटक अपनी घोषणा के अनुरुप एकजुट रहते हैंं तो फिर दूसरे समूहों के लिए भी बहुमत के लिए साथी कम पड़ जाएंगे। यह नहीं भूलिए कि कांग्रेस की प्रतिक्रिया काफी सधी हुई है। पहले पार्टी प्रवक्ता अभिशेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह सवाल नीतीश से ही पूछना चाहिए। कांग्रेस के दूसरे प्रवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि यह राजनीति है और लुधियाना की रैली में नीतीश का जाना अपेक्षित था। कांग्रेस और उनके पर्व साझेदारों नीतीश एवं पासवान की प्रतिक्रिया में ऐसे अंतर को समझना कठिन नहीं है। कांग्रेस चुनाव बाद के समीकरण को ध्यान में रखकर बयान दे रही है, जबकि लालू पासवान की नजर बिहार में अपने चरमराते जनाधार की ओर है।

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कामरेड, आपकी राजनीति क्या है


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) या माकपा फिर राष्ट्रीय राजनीति की धूरी बनकर उसे अपने अनुसार आकार देने की रणनीति में लगी है। माकपा नेता लगातार संदेश दे रहे हैं कि भाजपा या कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनने की कोई संभावना नहीं है। जहां तक कांग्रेस की बात है तो वे बार-बार कह रहे हैं कि वामदल किसी सूरत में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन नहीं दे सकता। जाहिर है, इसके बाद तीसरा मोर्चा ही बचता है। माकपा द्वारा तीसरा मोर्चा के नाम से इकट्ठा किए गए 10 दलों के बीच दरार पड़ चुकी है। बावजूद इसके उसका दावा है कि उसने भाजपा एवं कांग्रेस के बीच सिमटी दो ध्रुवीय राजनीति को धक्का देकर त्रिध्रुवीय बनाने में सफलता पा ली है एवं चुनाव बाद इस धु्रव के नेतृत्व में ही गैर कांग्रेस गैर भाजपा सरकार बनेगी। वास्तव में पिछले दो दशक से वाममोर्चा का नेतृत्व करने वाली माकपा की मुख्य भूमिका यहीं तक सीमित है। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन देने के साथ जो प्रक्रिया आरंभ हुई वह 1996 में संयुक्त मोर्चा के गठन के साथ परवान चढ़ी। माकपा यद्यपि संयुक्त मोर्चा का भाग नहीं थी और सरकार में शामिल नहीं हुई, लेकिन ऐसा लगता था मानो मोर्चा एवं सरकार की मुख्य नियंता वही हो। राष्ट्रीय राजनीति में उसकी हैसियत एवं अहमियत 1996 में जिस प्रकार सुस्थापित हुई उसके मनोवैज्ञानिक असर से वह कभी मुक्त नहीं हो पाई। 1998 एवं 1999 में राजग की सरकार होने के कारण सत्ता समीकरण में उसकी हैसियत नहीं थी लेकिन विपक्षी समीकरण में उसका रुतबा कायम रहा। इसका परिणाम 2004 में भाजपा विरोधी संप्रग सरकार के गठन के रुप में आया। इससे सत्ता प्रतिष्ठान में माकपा सहित शेष वामदलों की जो हैसियत थी उसे बताने की आवश्यकता नहीं है। यह उस हैसियत का ही असर था कि बार-बार कांग्रेस एवं सरकार की नीतियों से मतभेद उभरने के बावजूद उसने चार वशZ दो महीने तक अपना समर्थन बनाए रखा। माकपा अपनी नीति को जो नाम दे वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी हैसियत बनाए रखने की कोिशश कर रही है। चुनावी अंकगणित में वामदलों की ऐसी ताकत नहीं है कि वे अपनी बदौलत सत्ता या विपक्ष की दिशा-दशा निर्धारित कर सकें। पिछले 2004 के लोकसभा चुनाव में माकपा ने 19 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में कुल 69 उम्मीदवार उतारे जिनने 43 स्थानों पर विजय प्राप्त की। इसे कुल 2 करोड़ 20 लाख 70 हजार 614 मत मिले जो कि कुल मतदान का 5.66 प्रतिशत था। इसे सबसे ज्यादा मत तीन राज्यों त्रिपुरा (68.80 प्रतिशत), प. बंगाल (38.57 प्रतिशत) एवं केरल (31.52 प्रतिशत) में प्राप्त हुआ। दो प्रतिशत से ज्यादा मत केवल एक राज्य तमिलनाडु (2.87 प्रतिशत) एवं केन्द्रशासित अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह (2.71 प्रतिशत) में आया। भाकपा ने कुल 34 उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से 10 विजयी हुए। इसे कुल 54 लाख 84 हजार 111 मत प्राप्त हुए जो कि कुल मत का मात्र 1.41 प्रतिशत था। इसमें मणिपुर में एक स्थान पर उम्मीदवार खड़ा करने के कारण उसे सबसे ज्यादा 10.11 प्रतिशत मत मिला था। उसके बाद केरल के उसके चार उम्मीदवारों ने 7.89 प्रतिशत, प. बंगाल में उसके 3 उम्मीदवारों ने 4.01 प्रतिशत, झारखंड के उसके एक उम्मीदवार ने 3.80 प्रतिशत, तमिलनाडु मे उसके दोनों उम्मीदवारों ने 2.97 प्रतिशत, पंजाब में उसके एक उम्मीदवार ने 2.55प्रतिशत, गोवा के उसके दो उम्मीदवारों ने 2.17 प्रतिशत, असम में उसके एक उम्मीदवार ने 1.66 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश के उसके एक उम्मीदवार ने 1.34 प्रतिशत, बिहार में उसके छ: उम्मीदवारों ने 1.17 प्रतिशत मत पाया। जिन 15 राज्यों में उसने उम्मीदवार खड़े किए उनमें पांच राज्यों में उसे 0.50 प्रतिशत से भी कम मत मिला। ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक ने पांच राज्यों में 10 उम्मीदवार मैदान में उतारे जिनमें से 3 प. बंगाल से विजयी हुए। इसे कुल 13 लाख 65 हजार 55 मत मिले जो कि कुल मतों का 0.35 प्रतिशत था। इसे केवल प. बंगाल में ही 3.66 प्रतिशत मत मिला, अन्यथा अन्य चार राज्यों में इसे 0.25 प्रतिशत से कम मत मिले। रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने तीन राज्यों में छ: उम्मीदवार खड़ा किया जिसमें से तीन जीते। इसने कुल 16 लाख 89 हजार 794 मत पाए जो कुल मतों का 0.43 प्रतिशत था। असम और उड़ीसा में इसे सामन रुप से 0.11 प्रतिशत मत मिला। भाकपा के 34 में से 18 उम्मीदवारों के जमानत जब्त हो गए। माकपा के जमानत जब्त होने वाले प्रत्यािशयों की संखा 15 थी। वामदलों का कुल मत प्रतिशत था 7.85 प्रतिशत। इसमें करीब दो प्रतिशत मत तो उम्मीदवार खड़ा करने के कारण मिल गया। तमिलनाडु में द्रमुक गठजोड़ का भाग होने से इन्हें मत एवं जीत नसीब हुई। इस समय प. बंगाल, केरल एवं त्रिपुरा तथा झारखंड के एक क्षेत्र को छोड़कर वामदलों का मजबूत जनाधार कहीं नहीं है। इन तीनों राज्यों में कुल 78 लोकसभा स्थान हैं। इनमें झारखंड के 14 हैं। इनमें से एक हटा दीजिए तो इनका प्रभाव क्षेत्र 65 स्थानों तक सीमित है। तमिलनाडु एवं आंध्र में ये बगैर सहयोगी कुछ करने की स्थिति में भी नहीं हैं। यह तो भारतीय राजनीति की विडम्बना है कि इतने कम स्थानों पर जनाधार रखने वाले चार दलों का वामोर्चा माकपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय राजनीति की तस्वीर बदलने पर उतारु है। वैेसे इन चारों दलों में पूर्ण वैचारिक एकता भी नहीं है। फारवर्ड ब्लॉक एवं आरएसपी तो माकपा के खिलाफ प. बंगाल में ऐसे अनेक आंदोलनों की अगुवाई कर रही है जैसा विपक्ष शासक दल के खिलाफ करता है। इनके बीच हत्या तक के दर्जनों मुकदमे चल रहे हैं। 2004 इनके लिए चुनावी सफलताओं का ऐतिहासिक वर्ष था। इसने 59 स्थानों पर विजय प्राप्त किया। जिस नीति पर ये चल रहे हैं उसमें इनकी सीटों एवं मतोें में और कमी ही आनी है। सारे आकलन 2009 के चुनावों में इनकी सीटों में कमी के संकेत दे रहे हैं। राश्ट्रीय राजनीति की जोड़तोड़ में उलझे रहने के कारण प. बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल ने इनके जनाधार को दरका दिया है। तो सीमित जनाधार और उसमें भी साफ दिख रहा क्षरण, अपने मोर्चे के भीतर उग्र द्वंद्व, यह इस समय वाममोर्चा की वस्तुस्थिति है। ऐसा लगता है कि सत्ता एवं विपक्ष की इस राजनीति में उलझे रहने के कारण वे अपना मूल राजनीतिक लक्ष्य भी हािशए में धकेल चुके हैं। आर्थिक एवं सामाजिक समानता के लिए वाममोर्चा का कोई आंदोलन अभियान आपको दिखाई नहीं देगा। माकपा सहित वामदल इस वैचारिक क्षरण को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं तो इसे विडम्बना ही कहा जाएगा। राश्ट्रीय राजनीति की हैसियत भी संख्याबल पर निर्भर करता है। संख्याबल के अभाव में ही वामदल ऐसे दलों का कुनबा खड़ा करने की कोिशश करते हैं जिनकी कोई राजनैतिक नैतिकता या नििश्चत राजनीतिक विचारधारा नहीं है। उनकी आर्थिक विचारधारा तक वामदलों के बिल्कुल उलट हैं। आखिर चन्द्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, मायावती, देवेगौड़ा, जयललिता..आदि की आर्थिक एवं सामाजिक नीतियां वामदलोंं की मूल सोच से कैसे मेल खा सकती है? ऐसी ओैर भी बातें हैं जो वामदलों के प्रयासों को सिद्धांतहीन सिद्ध करती हैं। फिर ऐसे प्रयोगों में राजनीतिक अस्थिरता अवश्यंभावी रुप से निहित हो जाता है। कांग्रेस एवं भाजपा को परे रखकर किसी सरकार के गठन का अर्थ ही है उसका असमय पतन। इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि कामरेड, आपकी राजनीति क्या है? आप देश की राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?