सोमवार, 25 मई 2009

Bank can't publicise defaulters

सम्मान से न खेलें बैंक

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग द्वारा बैंकों को कर्ज नहीं चुकाने वालों के नाम सार्वजनिक रुप से जारी करने पर रोक स्वागतयोग्य है। खुली अर्थव्यवस्था अपनाने के बाद देश में निजी व विदेशी बैंकों का व्यापार काफी तेजी से बढ़ा है, और आम उपभोक्ताओं की कुछ सुविधाएं भी बढ़ीं हैं। किंतु इससे उपभोक्ताओं की परेशानियों में भी इजाफा हुआ है। बैंक तो कई बार बिना मांगे क्रेडिट कार्ड भेज देते हैं और आप उसे स्वीकार नहीं करिए, फिर भी मासिक बिल एवं उससे संबंधित फोन आते रहते हैं। यह मामला इसी किस्म का था। सिटी बैंक ने बिना मांगे किस व्यक्ति को कार्ड भेजा और उसका प्रयोग न करने पर भी बिल भेजते रहे, उसका नाम इंटरनेट पर गबनकर्ता की सूची में डाल दिया जिस कारण दूसरे बैंकों ने भी उसे कर्ज देने से इन्कार किया। निजी एवं बहुराश्ट्रीय बैंकों के दुव्र्यवहार का एक नमूना है। ऐसे व्यवहारों की सजा बैंक को मिलनी चाहिए। उपभोक्ता आयोन के आदेश के बाद यदि बैंक किसी कर्ज न चुका पाने वाले का नाम सार्वजनिक करता है तो यह अवैध एवं संबंधित व्यक्ति के सम्मान को चोट पहुंचाने वाला माना जाएगा। आयोग ने बैंक पर मनासिक परेशानी के एवज में 50 हजार रुपया का जुर्माना लगाकर बिल्कुल उचित कदम उठाया है। बैंकों के काम करने के तौर तरीकों एवं व्यवहार को मर्यादित एवं गरिमापूर्ण बनाने की आवश्यकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ऐसे कई दिशा निर्देश जारी कर चुका है किंतु इनके व्यवहार में जितना सुधार होना चाहिए नहीं हो रहा है। न जाने कितनी बड़ी संख्या में लोग इनके रवैये से मानसिक यंत्रणा का िशकार हो रहे हैं। किसी कार्डधारक की मृत्यु के बाद बैंक उनके परिवार के सदस्यों को मानसिक रुप से परेशान करना शुरु करते हैं। लोगों के घरों पर वसूली के नाम पर बाहुबलियों तक के भेजने की घटनाएं हुईं हैं। किसी भी कानून के राज्य में काम करने का यह तरीका नहीं हो सकता। आखिर कितने लोग अदालतों तक पहुंचते हैं। बिना क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल किए ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है जिन्हें आने वाले फोन कॉल एवं धमकियों से बचने के लिए बैंकों का चक्कर लगाते देखा जा सकता है। एक बार आपने किसी को कर्ज न चुकाने वाला घोशित कर दिया तो उसे आवश्यकता होने पर दूसरे बैंक भी कर्ज नहीं देते। लोग बैंकों की किश्त समय पर अदा करें इसका प्रोत्साहन तो मिलना चाहिए, लेकिन कोई एक बैंक दूसरे को कैसे किसी को कर्ज देने से रोक सकता है। एक महाजन के साथ किसी कर्जदार का व्यवहार यदि अच्छा नहीं रहा तो उसके कई कारण हो सकते हैं एवं दूसरे महाजन के साथ भी उसका व्यवहार वैसा ही रहेगा यह आवश्यक नहीं है।

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