प्रेम या वासना
राजधानी दिल्ली में एक बेटी द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिलकर मां की जघन्य हत्या का मामला किसी को भी हिलाकर रख देनेवाला है। अपनी ही बेटी की नृशंसता का िशकार होने वाली किरण कपूर नामक उस मां का क्या कसूर था? उसकी जगह कोई भी मां होती तो अपनी बेटी को प्रेमिका के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखकर वही करती जो किरण ने किया। लेकिन बेटी और उसके कथित प्रेमी को देखिए, शर्मिंदा होने और क्षमायाचक बनने की बजाय वे हिंसक हो गए। इसे कतई प्रेम नहीं कह सकते। प्रेम में कहां, हिंसा, कहां वासना, कहां भेदभाव! एक व्यक्ति से सच्चा पे्रम करने वाला किसी दूसरे से घृणा कर ही नहीं सकता है। प्रेम का आयाम तो इतना व्यापक है कि इसमें समस्त सृिश्ट समाहित कर दी जाए तब भी यह अनंत ही बना रहता है। वास्तव में लड़की साक्षी कपूर और उसके कथित प्रेमी सन्नी बत्रा के बीच सच्चा प्रेम न था न है। यह तो इस समय की विडम्बना है कि शारीरिक आकशZण एवं वासना को प्रेम मान लिया जाता है। फिल्मों से लेकर, टी. वी. , विज्ञापन आदि सब दो लिंगों के बीच खिंचाव को ही प्रेम बताते हैं और नई पीढ़ी उसी का अंध अनुसरण करती है। एक समय विवाह से पहले शारीरिक संबंध को पाप मानने की मानसिकता धीरे-धीरे लुप्त हुई है। धीरे-धीरे शारीरिक संबंध स्वाभाविक मान लिए गए हैं। जिस प्रेम की बात भारतीय वांगमय करता है उसमें शरीर गौण है, आत्मा प्रमुख है। लेकिन इस समय शरीर ही प्रधान हो चुका है। साक्षी एवं सन्नी शराब पीने के बाद यौनाचार में लिप्त होकर कौन सा प्रेम कर रहे थे! परिवार के सदस्यों की अनुपस्थिति में शराब लेकर ब्वायफ्रेंड का बुलाना और फिर अकेलेपन का लाभ उठाकर रंगरेलियां मनाने के पीछे केवल कामेच्छा की पूर्ति की ही भावना हो सकती है। ऐसा करने वाले साक्षी या सन्नी अकेले नहीं है। जिस समय ये दोनों एक दूसरे के आगोश में मदहोश थे उसी समय न जाने ऐसे या दूसरे तरीकों से कितने जोड़े उसी अवस्था में होंगे। प्रेम के नाम पर वासना का विस्तार और उसकी वेदी पर सारे संबंधों की बलि की ऐसी घटनाएं आए दिन समाचार माध्यमों में स्थान पाती रहतीं हैं। कहीं किरण की तरह अपनी बेटी के अध:पतन को न सहन करने वाली मां इसकी िशकार हो जाती हैं तो कई बार कोई दूसरा निशाने पर आ जाता है। काम हर जीव का स्वाभाविक धर्म है, गीता में श्रीकृश्ण ने स्वयं को काम कहा है-कामोअहम््। लेकिन उसकी वर्जनाओं और दुश्परिणामों से समाज को बचाने के लिए कुछ मर्यादाएं तय की गईं हैं। आधुनिकता के नाम पर दी जाने वाली िशक्षा और इससे जुड़ी जीवन शैली में भोग को सर्वाधिक महत्व मिलने से ये मर्यादाएं पिछड़ापन का प्रतीक मानी जाने लगीं हैं। इससे बचना है तो प्रेम के वास्तविक अर्थ के प्रचार के साथ साित्चक और नैतिक जीवन शैली को स्वाभाविक बनाने की कोिशश करनी होगी।
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