यह आडवाणी के बाद कौन की लड़ाई है
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के अशोक मार्ग स्थित आवास से अरुण जेटली के निकलते और दोनों को हाथ मिलाते देखकर किसी को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि इनके बीच वाकई मेल-मिलाप हो गया। वास्तव में जिन मूल कारणों से द्वंद्व बढ़ा और सार्वजनिक सतह पर आया उसमें मेल-मिलाप की संभावना पैदा करने के लिए पार्टी के व्यवहार और उसकी आंतरिक संरचना में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। मीडिया की सुिर्खयां बनते रहने के बावजूद यदि अरुण जेटली केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठकों में आने के लिए तैयार नहीं हुए तो यह कोई मामूली मतभेद नहीं हो सकता। आखिर जेटली को इतनी समझ तो है ही कि इससे देश भर में गलत संदेश जा रहा है और इसका असर चुनावी प्रदशZन पर पड़ सकता है। बावजूद इसके उनका अख्खड़ बना रहना इस बात का प्रमाण है कि पार्टी के ‘ाीशZतम व्यक्तित्वों के बीच निजी स्तर पर एक दूसरे के प्रति कितना द्वेश है। वास्तव में सतह पर भले तनाव की जड़ केवल सुधांशु मित्तल दिखाई देते रहे और तात्कालिक कारण यह बना भी किंतु भाजपा का अंदरुनी संकट और दूसरी पीढ़ी के नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा ही इस बहाने ‘ार्मनाक तरीके से सामने आया है।कहा जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष ने सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का प्रभारी बनने से पहले जेटली को विश्वास में नहीं लिया, अन्यथा ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती। किंतु जेटली मित्तल के नाम पर कभी तैयार नहीं होते। स्व. प्रमोद महाजन के नजदीकी होने के कारण मित्तल के व्यवहार को जेटली ने कभी पसंद नहीं किया। हालांकि राजनाथ सिंह ने उन्हें पूर्वोत्तर का प्रभारी बनाने के लिए लालकृश्ण आडवाणी की सहमति प्राप्त कर ली। राजनाथ के लिए यह ऐसा संबल है जिसकी बदौलत वे जेटली के समर्थन में मीडिया द्वारा बनाई जा रही हवा का सामना करते रहे। यदि जेटली मीडिया के कुछ बड़े नामोंं के पंसदीदा चेहरा नहीं होते तो मामला इतना तूल नहीं पकड़ता। छात्र नेता के रुप में जेटली कभी धरातल से जुड़े रहे होंगे, लेकिन पिछले एक दशक से वे भाजपा में यदि ‘ाीशZ स्तर पर हैं तो इसमें मीडिया संबंधों का महत्वपूर्ण योगदान है। जेटली ही क्यों, रविशंकर प्रसाद जैसे नेता भी इसी श्रेणी के हैं। इन्हें पार्टी में इनके विरोधी चैनल ब्वॉय कहते हैं। मीडिया में प्रतिदिन दिखने के कारण इनका कद इतना बड़ा हो गया है कि इनसे सीधे टकराने की हिम्मत कोई जुटा नहीं पाता। क्या जेटली का केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक में न जाना इतनी बड़ी घटना थी जिसे लगातार देशवासियों को अवगत कराया जाना चाहिए था? जेटली से ज्यादा इस लड़ाई को उनके मीडिया के मित्र लड़ रहे थे। इन लोगोंं ने उन्हें चुनाव का `की स्ट्रेटेजिस्ट´ बना दिया है। जेटली या उन जैसे लोगोंे की चुनाव प्रबंधन में उपयोगिता को कोई नकार नहीं सकता, लेकिन यह गलतफहमी किसी को नहीं होनी चाहिए कि केवल पीछे के प्रबंधन और रणनीति से चुनाव जीता जा सकता है। ऐसा होता तो 2004 का चुनाव भाजपा नहीं हारती। किंतु भाजपा जैसी पार्टी का दुर्भाग्य यह है कि केन्द्रीय स्तर पर उसके जो नेता दिखते हैं उनमें ज्यादातर नेपथ्य प्रबंधन एवं रणनीति के ही तथाकथित विशेशज्ञ है। गांवों, गली-कूचों की राजनीति से रिश्ता न होने और उस राजनीति से सीधा संबंधित होने वाले नेताओं की अनुपस्थिति मेें ये अपने को ही पार्टी का नियंता मान चुके हैं। अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए अपने विश्वास के लोगों को आगे बढ़ाने की होड़ चल रही है। इसमें कोई पार्टी या देश की नहीं सोचता। बस, अपनी ताकत बनाए रखने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही है। सबके सामने आडवाणी के बाद कौन का प्रश्न है। चुनाव के बाद अध्यक्ष का भी निर्वाचन होना है। सब इसकी तैयारी कर रहे हैं। इन्हें लगता है कि पार्टी में पदों पर जितने ज्यादा लोग अपने होंगे उतनी ही इनकी दावेदारी मजबूत होगी। इसलिए गलत-सही की चिंता किए बगैर जहां भी खाली जगह है वहां अपने लोगों को बिठा देने की कोशिश चल रही है। इससे कोई वंचित नहीं है। राजनाथ सिंह से लेकर वेंकैया नायडू, सुशमा स्वराज...सब इसमें ‘ाामिल हैं। ‘ाह-मात का खेल चल रहा है। उमा भारती इसी दांव मेें राजनाथ सिंह के लिए जेटली के विरुद्ध प्रबल हथियार बनकर सामने आ गईं। अगर विवाद नहीं होता तो आडवाणी को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन वाला उमा भारती का पत्र राजनाथ स्वयं सार्वजनिक तौर पर पढ़कर उनका ‘ाुक्रिया अदा नहीं करते। उमा का नाम ही अरुण जेटली के साथ कईयों की की धड़कन बढ़ानेवाला है। उनके पार्टी में आगमन की आशंका से ही इनकी नींद उड़ जाती है। कल्पपा करिए, उमा भारती के संबंध में राजनाथ का बयान, उनका स्वयं दो बार आडवाणी से मिलना, फिर पत्रकार सम्मेलन बुलाकर अरुण जेटली से पुराने गिले-शिकवे भुलाकर आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए मिलकर काम करने का उमा का अनुरोध...आदि ‘ाह-मात का दांव ही तो है। प्रदेश स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी इस स्थिति को समझ लिया है, इसलिए वे भी किसी एक नेता को संरक्षक बनाकर काम करने के लिए इनकी जी हुजूरी करते हैं। विचारधारा और बड़े लक्ष्यों से दूर हो जानेवाली पार्टी की ऐसी ही दुश्परिणति होती है। बहरहाल, भाजपा में कुछ लोगों को इस बात की प्रसन्नता है कि राजनाथ सिंह ने दिल्ली के सत्ता-मीडिया-बुद्धिजीवियों-सोशियलाईट के प्रतिनिधि की इच्छा के विपरीत जाने और उसकी नाराजगी के बावजूद खडा़ रहने का साहस तो दिखाया। गांवों एवं छोटे ‘ाहरों-कस्बों की लंबे समय से राजनीति करने वाले इससे प्रसन्न हैं। किंतु कुछ लोग कहते हैं कि राजनाथ जिस व्यक्ति के लिए अड़े उसका व्यक्तित्व कैसा है? संसदीय राजनीति में पार्टी की स्थिति का आकलन करने वाले अफसोस जताते हैंं कि काश,जेटली पार्टी के ‘ाहरी चेहरे तथा राजनाथ ग्रामीण चेहरे के तौर पर संगठित रहते तो इसका लाभ मिलता। इन नेताओं ने भाजपा को जिस अवस्था में ला दिया है उसमें ऐसे प्रश्न ही बेमानी हैं। विचारधारा से परे जाकर पार्टी और देश के ऊपर निजी स्वार्थ आच्छादित करने के कारण भाजपा गहरे संकट में धंस चुकी है। अगर भाजपा विचारधारा से आबद्ध बड़े लक्ष्यों के लिए सक्रिय होती तो उसका नेतृत्व भी वैसे ही लोगों के हाथों आता और किसी पद पर नियुक्त किए जाने का कोई मापदंड भी होता। इस समय कौन लोग पार्टी चला रहे हैं? कुछ नाम सामने हैं, लेकिन कुछ पर्दे के पीछे हैं और उनकी भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण है। जिन्ना प्रकरण के बाद सुधीन्द्र कुलकणीZ ने पार्टी के सचिव पद से त्यागपत्र दे दिया था, पर आडवाणी के साथ काम करते रहे और अभी आडवाणी के नाम पर समानांतर पार्टी चला रहे हैं। उनके साथ एक और पत्रकार हैं। ये दोनों भाजपा को क्या दिशा देंगे? फिर दूसरे नेताओं-कार्यकर्ताअों पर इसका कितना उल्टा असर हुआ है और इससे संदेश क्या गया है? पार्टी के लोग ही कहते हैं कि सुधांशु त्रिवेदी की सलाह पर अध्यक्ष जी एवं कुलकणीZ की सलाह के अनुसार आडवाणी अपना रुख तय कर रहे हैं। इन कारणों से भाजपा में सच्चे नेतृत्व वाले व्यक्तिव के लाले पड़ गए हैं। वाजपेयी जीवन के अंतिम दौर में सक्रिय राजनीति से दूर हैं। आडवाणी के कद का भी कोई दूसरा व्यक्ति भाजपा में नहीं है जिसकी जनता के बीच में भी पहचान हो। भाजपा के नेता बने लोग चाहे जितना दंभ करें, इनमें से ज्यादातर की आम जन के बीच कोई कद नहीं है। सुशमा स्वराज को जन नेत्री कहा जाता है। जन नेत्री को विदीशा जैसा सुरक्षित सीट क्यों चाहिए? हालांकि इस अवस्था के लिए आडवाणी एवं वाजपेयी ही दोशी हैं, लेकिन अब तो यही पार्टी की दशा है। राजनाथ बनाम जेटली बनाम नायडू बनाम नरेन्द्र मोदी बनाम सुशमा बनाम..पता नहीं इस सिलसिले में पार्टी की क्या दशा होगी। संसदीय लोकतंत्र में एक प्रमुख पार्टी की ऐसी दुर्दशा देश के लिए चिंताजनक है।