शनिवार, 4 अप्रैल 2009

BJP Jately Rajnath on Mittal

यह आडवाणी के बाद कौन की लड़ाई है

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के अशोक मार्ग स्थित आवास से अरुण जेटली के निकलते और दोनों को हाथ मिलाते देखकर किसी को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि इनके बीच वाकई मेल-मिलाप हो गया। वास्तव में जिन मूल कारणों से द्वंद्व बढ़ा और सार्वजनिक सतह पर आया उसमें मेल-मिलाप की संभावना पैदा करने के लिए पार्टी के व्यवहार और उसकी आंतरिक संरचना में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। मीडिया की सुिर्खयां बनते रहने के बावजूद यदि अरुण जेटली केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठकों में आने के लिए तैयार नहीं हुए तो यह कोई मामूली मतभेद नहीं हो सकता। आखिर जेटली को इतनी समझ तो है ही कि इससे देश भर में गलत संदेश जा रहा है और इसका असर चुनावी प्रदशZन पर पड़ सकता है। बावजूद इसके उनका अख्खड़ बना रहना इस बात का प्रमाण है कि पार्टी के ‘ाीशZतम व्यक्तित्वों के बीच निजी स्तर पर एक दूसरे के प्रति कितना द्वेश है। वास्तव में सतह पर भले तनाव की जड़ केवल सुधांशु मित्तल दिखाई देते रहे और तात्कालिक कारण यह बना भी किंतु भाजपा का अंदरुनी संकट और दूसरी पीढ़ी के नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा ही इस बहाने ‘ार्मनाक तरीके से सामने आया है।कहा जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष ने सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का प्रभारी बनने से पहले जेटली को विश्वास में नहीं लिया, अन्यथा ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती। किंतु जेटली मित्तल के नाम पर कभी तैयार नहीं होते। स्व. प्रमोद महाजन के नजदीकी होने के कारण मित्तल के व्यवहार को जेटली ने कभी पसंद नहीं किया। हालांकि राजनाथ सिंह ने उन्हें पूर्वोत्तर का प्रभारी बनाने के लिए लालकृश्ण आडवाणी की सहमति प्राप्त कर ली। राजनाथ के लिए यह ऐसा संबल है जिसकी बदौलत वे जेटली के समर्थन में मीडिया द्वारा बनाई जा रही हवा का सामना करते रहे। यदि जेटली मीडिया के कुछ बड़े नामोंं के पंसदीदा चेहरा नहीं होते तो मामला इतना तूल नहीं पकड़ता। छात्र नेता के रुप में जेटली कभी धरातल से जुड़े रहे होंगे, लेकिन पिछले एक दशक से वे भाजपा में यदि ‘ाीशZ स्तर पर हैं तो इसमें मीडिया संबंधों का महत्वपूर्ण योगदान है। जेटली ही क्यों, रविशंकर प्रसाद जैसे नेता भी इसी श्रेणी के हैं। इन्हें पार्टी में इनके विरोधी चैनल ब्वॉय कहते हैं। मीडिया में प्रतिदिन दिखने के कारण इनका कद इतना बड़ा हो गया है कि इनसे सीधे टकराने की हिम्मत कोई जुटा नहीं पाता। क्या जेटली का केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक में न जाना इतनी बड़ी घटना थी जिसे लगातार देशवासियों को अवगत कराया जाना चाहिए था? जेटली से ज्यादा इस लड़ाई को उनके मीडिया के मित्र लड़ रहे थे। इन लोगोंं ने उन्हें चुनाव का `की स्ट्रेटेजिस्ट´ बना दिया है। जेटली या उन जैसे लोगोंे की चुनाव प्रबंधन में उपयोगिता को कोई नकार नहीं सकता, लेकिन यह गलतफहमी किसी को नहीं होनी चाहिए कि केवल पीछे के प्रबंधन और रणनीति से चुनाव जीता जा सकता है। ऐसा होता तो 2004 का चुनाव भाजपा नहीं हारती। किंतु भाजपा जैसी पार्टी का दुर्भाग्य यह है कि केन्द्रीय स्तर पर उसके जो नेता दिखते हैं उनमें ज्यादातर नेपथ्य प्रबंधन एवं रणनीति के ही तथाकथित विशेशज्ञ है। गांवों, गली-कूचों की राजनीति से रिश्ता न होने और उस राजनीति से सीधा संबंधित होने वाले नेताओं की अनुपस्थिति मेें ये अपने को ही पार्टी का नियंता मान चुके हैं। अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए अपने विश्वास के लोगों को आगे बढ़ाने की होड़ चल रही है। इसमें कोई पार्टी या देश की नहीं सोचता। बस, अपनी ताकत बनाए रखने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही है। सबके सामने आडवाणी के बाद कौन का प्रश्न है। चुनाव के बाद अध्यक्ष का भी निर्वाचन होना है। सब इसकी तैयारी कर रहे हैं। इन्हें लगता है कि पार्टी में पदों पर जितने ज्यादा लोग अपने होंगे उतनी ही इनकी दावेदारी मजबूत होगी। इसलिए गलत-सही की चिंता किए बगैर जहां भी खाली जगह है वहां अपने लोगों को बिठा देने की कोशिश चल रही है। इससे कोई वंचित नहीं है। राजनाथ सिंह से लेकर वेंकैया नायडू, सुशमा स्वराज...सब इसमें ‘ाामिल हैं। ‘ाह-मात का खेल चल रहा है। उमा भारती इसी दांव मेें राजनाथ सिंह के लिए जेटली के विरुद्ध प्रबल हथियार बनकर सामने आ गईं। अगर विवाद नहीं होता तो आडवाणी को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन वाला उमा भारती का पत्र राजनाथ स्वयं सार्वजनिक तौर पर पढ़कर उनका ‘ाुक्रिया अदा नहीं करते। उमा का नाम ही अरुण जेटली के साथ कईयों की की धड़कन बढ़ानेवाला है। उनके पार्टी में आगमन की आशंका से ही इनकी नींद उड़ जाती है। कल्पपा करिए, उमा भारती के संबंध में राजनाथ का बयान, उनका स्वयं दो बार आडवाणी से मिलना, फिर पत्रकार सम्मेलन बुलाकर अरुण जेटली से पुराने गिले-शिकवे भुलाकर आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए मिलकर काम करने का उमा का अनुरोध...आदि ‘ाह-मात का दांव ही तो है। प्रदेश स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी इस स्थिति को समझ लिया है, इसलिए वे भी किसी एक नेता को संरक्षक बनाकर काम करने के लिए इनकी जी हुजूरी करते हैं। विचारधारा और बड़े लक्ष्यों से दूर हो जानेवाली पार्टी की ऐसी ही दुश्परिणति होती है। बहरहाल, भाजपा में कुछ लोगों को इस बात की प्रसन्नता है कि राजनाथ सिंह ने दिल्ली के सत्ता-मीडिया-बुद्धिजीवियों-सोशियलाईट के प्रतिनिधि की इच्छा के विपरीत जाने और उसकी नाराजगी के बावजूद खडा़ रहने का साहस तो दिखाया। गांवों एवं छोटे ‘ाहरों-कस्बों की लंबे समय से राजनीति करने वाले इससे प्रसन्न हैं। किंतु कुछ लोग कहते हैं कि राजनाथ जिस व्यक्ति के लिए अड़े उसका व्यक्तित्व कैसा है? संसदीय राजनीति में पार्टी की स्थिति का आकलन करने वाले अफसोस जताते हैंं कि काश,जेटली पार्टी के ‘ाहरी चेहरे तथा राजनाथ ग्रामीण चेहरे के तौर पर संगठित रहते तो इसका लाभ मिलता। इन नेताओं ने भाजपा को जिस अवस्था में ला दिया है उसमें ऐसे प्रश्न ही बेमानी हैं। विचारधारा से परे जाकर पार्टी और देश के ऊपर निजी स्वार्थ आच्छादित करने के कारण भाजपा गहरे संकट में धंस चुकी है। अगर भाजपा विचारधारा से आबद्ध बड़े लक्ष्यों के लिए सक्रिय होती तो उसका नेतृत्व भी वैसे ही लोगों के हाथों आता और किसी पद पर नियुक्त किए जाने का कोई मापदंड भी होता। इस समय कौन लोग पार्टी चला रहे हैं? कुछ नाम सामने हैं, लेकिन कुछ पर्दे के पीछे हैं और उनकी भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण है। जिन्ना प्रकरण के बाद सुधीन्द्र कुलकणीZ ने पार्टी के सचिव पद से त्यागपत्र दे दिया था, पर आडवाणी के साथ काम करते रहे और अभी आडवाणी के नाम पर समानांतर पार्टी चला रहे हैं। उनके साथ एक और पत्रकार हैं। ये दोनों भाजपा को क्या दिशा देंगे? फिर दूसरे नेताओं-कार्यकर्ताअों पर इसका कितना उल्टा असर हुआ है और इससे संदेश क्या गया है? पार्टी के लोग ही कहते हैं कि सुधांशु त्रिवेदी की सलाह पर अध्यक्ष जी एवं कुलकणीZ की सलाह के अनुसार आडवाणी अपना रुख तय कर रहे हैं। इन कारणों से भाजपा में सच्चे नेतृत्व वाले व्यक्तिव के लाले पड़ गए हैं। वाजपेयी जीवन के अंतिम दौर में सक्रिय राजनीति से दूर हैं। आडवाणी के कद का भी कोई दूसरा व्यक्ति भाजपा में नहीं है जिसकी जनता के बीच में भी पहचान हो। भाजपा के नेता बने लोग चाहे जितना दंभ करें, इनमें से ज्यादातर की आम जन के बीच कोई कद नहीं है। सुशमा स्वराज को जन नेत्री कहा जाता है। जन नेत्री को विदीशा जैसा सुरक्षित सीट क्यों चाहिए? हालांकि इस अवस्था के लिए आडवाणी एवं वाजपेयी ही दोशी हैं, लेकिन अब तो यही पार्टी की दशा है। राजनाथ बनाम जेटली बनाम नायडू बनाम नरेन्द्र मोदी बनाम सुशमा बनाम..पता नहीं इस सिलसिले में पार्टी की क्या दशा होगी। संसदीय लोकतंत्र में एक प्रमुख पार्टी की ऐसी दुर्दशा देश के लिए चिंताजनक है।

lok sabha election UPA divided in Tamilnadu

तमिलनाडु में यूपीए बिखराव राष्ट्रीय निहितार्थ बहुत बड़ा है
संप्रग वाकई बिखर गया है। चुनाव की घोषणा के बाद ऐसा लग रहा था कि संप्रग एकजुट होकर मैदान में उतरेगा। लेकिन पहले उत्तर प्रदेश में सपा कांग्रेस के बीच सीटों पर तालमेल न हो सका, उसके बाद बिहार का नंबर आया, फिर झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ लंबी बातचीत के बाद बना-बनाया गठजोड़ दरक गया और अब तमिलनाडु में पीएमके छिटक गया। इनमें पीएमके का बिखरना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि यह अब संप्रग से बाहर चला गया है। शेश पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ते हुए भी स्वयं को कांग्रेस नेतृत्व वाले संप्रग का घटक कह रही है। ये न कांग्रेस की आलोचना कर रहे हैं और न प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की। इस समय की परिस्थितियों में ऐसा लगता भी है कि ये चुनाव के बाद संप्रग में ही बने रहेंगे। हां, यदि चुनाव परिणाम कंाग्रेस के लिए प्रतिकूल रहा तो ये क्या करेंगे कहना कठिन है। किंतु इस समय ये केवल चुनाव अलग लड़ रहे हैं, कांग्रेस या संप्रग से इनका स्थायी विलगाव नहीं हुआ है। इसके समानांतर पीएमके का अन्नाद्रमुक के साथ जाना राश्ट्रीय स्तर पर संप्रग के लिए बहुत बड़ी क्षति है। जयललिता यद्यपि अभी तक स्वयं तीसरे मोर्चे के सम्मेलन में नहीं गईं, लेकिन उन्होंने अपने प्रतिनिधि को भेजकर भावी राजनीतिक दिशा का संकेत दे दिया। हालांकि एक समय उन्होंने कांग्रेस के नेताओं से अपने रिश्ते की बात कहते हुए उसे द्रमुक से अलग होने का भी सुझाव दिया, किंतु कांग्रेस ने द्रमुक के साथ दृढ़ता से बने रहने का बयान दे दिया। वस्तुत: जयललिता इस समय कांग्रेस विरोधी खेमे की अंग हैं यह मानने में कोई संकोच नहीं है।वैसे पीएमके का तमिलनाडु के अन्नाद्रमुक गठजोड़ में जाना बिल्कुल तय था। पिछले साल ही पीएमके प्रदेश मेे द्रमुक नेतृत्व वाले गठजोड़ से अलग हो चुकी थी। हां, केन्द्र सरकार में वह बनी हुई थी। स्वयं करुणानिधि ने भी कह दिया था कि अगर वह केन्द्र सरकार में बनी रहती है तो इससे उन्हें कोई समस्या नहीं है। केन्द्र की मजबूरी थी कि पांच लोकसभा सदस्यों वाले पीएमके को वह अलग नहीं कर सकती थी। खासकर वामदलोें द्वारा समर्थन वापसी के बाद जहां एक-एक सांसद का महत्व बढ़ गया था उसके लिए किसी प्रकार का जोखिम उठाना संभव ही नहीं था। इस प्रकार पीएमके के अंबुमणि रामदोस को मंत्री बनाए रखना उसकी मजबूरी थी। कहा जा सकता है कि पीएमके को भी केवल चुनाव की प्रतीक्षा थी एवं अन्नाद्रमुक की जयललिता द्वारा लोकसभा चुनाव में सात स्थान एवं एक राज्य सभा सीट के साथ समझौता हो गया। अन्नाद्रमुक और पीएमके का साथ आना दोनों के लिए लाभकारी है। अन्नाद्रमुक अगर तमिलनाडु के दक्षिण में मजबूत है तो पीएमके का उत्तर एवं मध्य में जनाधार है। वनियार समुदाय का इसका आधार ऐसा है जिसका लाभ अन्नाद्रमुक को मिल सकता है। इस परिवर्तन के बाद तमिलनाडु में अब संप्रग के रुप में केवल द्रमुक एवं कांग्रेस है। तमिलनाडु में 2004 को लोकसभा चुनाव पूरी तरह द्रमुक नेतृत्व वाले संप्रग के पक्ष में गया था। उसने सभी 39 स्थानों पर कब्जा कर लिया था। अन्नाद्रमुक की बुरी पराजय हुई एवं उसे एक भी स्थान नहीं मिला था। तब द्रमुक नेतृत्व वाले संप्रग में कांग्रेस, एमडीएमके, पीएमके, भाकपा एवं माकपा शामिल थी। यह अन्नाद्रमुक के खिलाफ एक व्यापक गठजोड़ था। द्रमुक ने 24.60 प्रतिशत एवं 16 स्थान, कांग्रेस ने 14.40 प्रतिशत मत एवं 10 स्थान, पीएमके ने 6.71 प्रतिशत मत एवं पंाच स्थान, एमडीएमके ने 5.85 प्रतिशत मत एवं चार स्थान, भाकपा ने 2.97 प्रतिशत मत एवं दो स्थान तथा माकपा ने 2.87 प्रतिशत मत एवं दो स्थान पाए थे। यानी इस गठजोड़ ने कुल 57.40 प्रतिशत मत प्राप्त किया। साफ है कि इनकी एकता के कारण इनके मताधार का भी धु्रवीकरण हुआ था। ऐसे ध्रुवीकरण के बाद अन्नाद्रमुक-भाजपा का सूपड़ा साफ होना ही था। अन्नाद्रमुक को केवल 29.77 प्रतिशत मत मिल तो भाजपा ने 5.07 प्रतिशत मत पाए। यानी कुल 34.84 प्रतिशत। इस प्रकार द्रमुक गठजोड़ 22.56 प्रतिशत के भारी अंतर से आगे था। लेकिन विधानसभ चुनाव में स्थिति काफी बदली। द्रमुक नेतृत्व वाले गठजोड़ को 234 में से 163 स्थान मिला तो जयललिता के नेतृत्व वाले गठजोड़ ने भी 61 स्थानों पर जीत दर्ज करा ली। एमडीएमके उस समय द्रमुक गठजोड़ में नहीं, बल्कि अन्नाद्रमुक के साथ था। इसने छ: तथा दलित पैंथर्स ने दो स्थान जीते। 234 सीटों वाले विधानसभा में द्रमुक को केवल 96 स्थान मिले जो कि बहुमत से 22 कम हैं। यानी लोकसभा चुनाव का माहौल बदल चुका था एवं दोनोेंं समूहों के बीच संघशZ काफी निकट का था। मतों की गणना यह बताती है कि विधानसभा चुनाव में केवल 4.75 प्रतिशत मतों के अंतर ने समीकरण बदला। द्रमुक गठजोड़ को 44.58 प्रतिशत तथा अन्नाद्रमुक गठजोड़ को 39.83 प्रतिशत मत आए। कहां 22.56 प्रतिशत और कहां 4.75 प्रतिशत। जाहिर है, पीएमके के निकलने के बाद मतों के मामले यह गठजोड़ आगे निकल चुका है।वास्तव में तमिलनाडु का राजनीतिक परिदृश्य काफी रोचक हो गया है। एमडीएमके किसी गठजोड़ में शामिल नहीं है। एमडीएमके, पीएमके, माकपा एवं भाकपा का लोकसभा चुनाव अनुसार कुल 18.40 प्रतिशत मत घट जाने तथा इसमें पीएमके का मत अन्नाद्रमुक के साथ जुड़ जाने से इसका पलड़ा भारी लगता है। विधानसभा चुनाव में प्राप्त मतों को आधार बनाकर अन्नाद्रमुक मेें पीएमके का मत जोड़ दें तो यह 46.56 प्रतिशत हो जाता है जो कि द्रमुक गठजोड़ से 7.56 प्रतिशत ज्यादा है। इसका असर पड़ना तय है। अभिनेता विजयकांत की पार्टी देसिया मुर्पोक्कु द्रविदर कजगम यानी डीएमडीके भी चुनाव मैदान मेें है। उसने विधानसभा चुनाव में पहली बार अपनी ताकत का परीक्षण किया एवं उसे 8.33 प्रतिशत मत मिला। अगर विजयकांत जयललिता वाले गठजोड़ में शामिल हो जाते तो विधानसभा चुनाव का परिणाम बदल जाता। इसकी बढ़त हो जाती। हालांकि विजयकांत की पार्टी पुन: सबसे अलग है। लोकसभा चुनाव में इसके प्रति जनता का रुख क्या होगा कहना कठिन है, किंतु विजयकांत भी शासन के खिलाफ असंतोश को ज्यादा हवा देने की कोिशश कर रहे हैं। केन्द्र एवं प्रदेश दोनों सरकारों के सत्ता विरोधी रुझान भी चुनाव में अपनी भूमिका निभाएंगे। एमडीएमके अपने प्रभावक्षेत्र में वैसे दोनों का मत काटेगा लेकिन इसमें द्रमुक का हिस्सा ज्यादा होगा। उसके नेता वाइको श्रीलंका सरकार के खिलाफ एवं लिट्टे के पक्ष मेंं जो अभियान चला रहे हैं वह केन्द्र एवं प्रदेश सरकार के भी विरुद्ध है। जाहिर है, इनकी ओर जो मत आएगा उसमें इनका बड़ा भाग शामिल होगा। पीएमके यदि द्रमुक के साथ रहती तो शायद ये कारक कुछ हद तक संतुलित होते। किंतु उसका अन्नाद्रमुक के साथ जाना संतुलन को भी मोड़ने वाला साबित हो सकता है। तमिलनाडु में संप्रग यदि चुनावी अंकगणित में फिसली, जिसकी संभावना बढ़ गई है तो इससे संसद में संप्रग का अंकगणित बुरी तरह गड़बड़ा जाएगा।