बुधवार, 28 जनवरी 2009
Former President Venkataraman dead
पूर्व राश्ट्रपति आर. वेंकटमरन का 98 वें वशZ में निधन वैसे तो स्वाभाविक घटना है, लेकिन उनके साथ भारतीय आजादी के आंदोलन से लेकर संविधान निर्माण में सक्रिय एक ऐसी विरासत का अंत हुआ है जिसने एक आदशZ भारतीय राश्ट्र-राज्य की कल्पना के साथ राजनीति में कदम रखा। भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में यह ऐसी विरासत है जो एक-एक कर समाप्त होती जा रही है। ढूंढने से भी अब ऐसे व्यक्तित्व का मिलना कठिन है। किंतु सोचने वाली बात है कि जुलाई 1992 में राश्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद देश में उनकी क्या उपयोगिता थी! आखिर संविधान सभा के कितने सदस्य इस समय देश में जीवित बचे हैं? एक व्यक्ति जो उस पीढ़ी से निकलकर प्रदेश एवं देश की स्वातंत्र्योत्तर राजनीति में सक्रिय रहा, जो योजना आयोग के उपाध्यक्ष, वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री एवं उप राश्ट्रपति पद को सुशोभित करते हुए राश्ट्रपति पद तक पहुंचा हो उसकी तो देश को ज्यादा जरुरत होनी चाहिए थी। राश्ट्रपति की जिम्मेवारी से मुक्त होने के बाद सत्ता या दलीय राजनीति में सक्रिमया यथेश्ट नहीं हो सकती लेकिन राजनीति ऐसे व्यक्ति के अनुभवों और दृिश्टकोणों का लाभ न ले पाए इससे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है? खासकर देश पिछले डेढ़ दशकों से ज्यादा समय से जिन संवैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामजिक और सभ्यतागत प्रश्नों का सामना कर रहा है उसमें वेंकटरमन जैसे व्यक्तित्व से मार्ग दशZन पाने की कहीं ज्यादा जरुरत थी। किंतु हमारे राजनीति के कर्णधारों के पास इसकी फुरसत कहां कि उनसे मार्गदशZन पाने की कोिशश करे। ये तो स्वयं ही सर्वज्ञ हैं। वेंकटरमन ऐसे समय राश्ट्रपति बने जब तत्कालीन राश्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह एवं प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच मनभेद सार्वजनिक हो चुका था। कई प्रकार की अफवाहें सत्ता के गलियारों में प्रतिदिन उड़तीं रहतीं थी। वेंकटरमन के आने के साथ ही अफवाहें बंद हुईं और प्रधानमंत्री कार्यालय एवं राश्ट्रपति भवन के बीच परंपरागत संतुलन कायम हुआ। उनके राश्ट्रपति बनने के साथ ही एक दल के बहुमत का दौर समाप्त होने लगा था। उन्हें चार प्रधानमंत्रियों को शपथ दिलवानी पड़ी लेकिन वे विवादों में नहीं फंसे। 1989 के चुनाव में कांग्रेस को बहुमत न होते हुए भी उन्होंने राजीव गांधी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जो सबसे बड़े दल के नेता को पहले बुलाने की परंपरा का निर्वाह था। उनके इन्कार करने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह को शपथ दिलवाई। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने देश की दशा एवं राजनीतिक विखंडन को देखते हुए राश्ट्रीय सरकार बनाने की अपील की। आज पूरा देश यह महसूस कर रहा है कि अगर कोई राश्ट्रीय सरकार बन जाए तो मुंह बाए चुनौतियों से आसानी से निपटा जा सकेगा। बाद में उन्होंने संविधान की समीक्षा कर इसे समयानुसार नया स्वरुप देने की भी वकालत की। एक संविधान सभा के सदस्य द्वारा संविधान की समीक्षा एवं उसमें बदलाव की मांग को जितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए न लेना कतई उचित नहीं था।
Sri Ram Sena attacks pub
श्रीराम सेना का तरीका गलत लेकिन मुद्दा सही है
कर्नाटक पुलिस ने पब में लड़कियों-महिलाअों पर हमला करने वाले श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं को गिरतार कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई ‘ाुरु कर दिया है। प्रदेश के गृहमंत्री ने भी निश्पक्ष कार्रवाई का बयान दिया है। किसी भी मामले में कानून अपने हाथ में लेने का समर्थन नहीं किया जा सकता। खासकर हिंसक तरीके से किए किए विरोध का संदेश काफी नकारात्मक जाता है भले कारण कितना भी वाजिब क्यों न हो। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गलत तरीके से विरोध करने मात्र से वह कारण सही हो गया। यह मामला पब में लड़कियों के शराब पीने का है। प्रश्न किया जा सकता है कि जब पब में पुरुशों के शराब पीने पर पाबंदी नहीं है तो महिलाओं पर क्यों होनी चाहिए? आखिर हमारा संविधान एवं कानून पुरुश महिला के बीच भेद नहीं करता। एक पब के लिए दोनों उपभोक्ता हैं और जब सरकार ने लाइसेंस दिया है तो उसके ग्राहकों को रोकने का अर्थ एक मान्य व्यवसाय के रास्ते आपराधिक तरीके से बाधा खड़ी करना है। जितनी कम संख्या में ग्राहक वहां जाएंगे व्यापार उतना ही कमजोर होगा एवं सरकार को कर भी उसी अनुपात में कम मिलेंगे। इस दृिश्ट से विचार करने वाले यह मानेंगे कि श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं ने वाकई अपराध किया है और उन्हें उसकी सजा मिलनी चाहिए। किंतु यहां श्रीराम सेना को कुछ समय के लिए गौण कर इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखिए। महात्मा गांधी से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे मनीशियों ने भारत को शराब मुक्त देश बनाने की कल्न्पना की थी। वे जिस महान और आदशZ भारत की कल्पना करते थे उसमें नशा, पशु हत्या आदि का कोई स्थान नहीं था। उस समय से आज तक देश में शराबबंदी आंदोलन किसी न किसी स्तर पर चल रहा है। क्या यह सत्य नहीं है कि भारत में बहुसंख्य हिसंक अपराधों के पीछे शराब की भूमिका है? यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्वयं लड़किया-महिलाएं कई बार शराब की पार्टी के बाद दुश्कर्म का िशकार होती हैं। अगर शराब इतना ही स्वीकृत पेय है तो फिर शराब पीकर गाड़ी चलाने को क्यों अपराध माना जाता है? इसके खिलाफ क्यों प्रचार किया जाता है? कोई शराब पीकर यदि सार्वजनिक स्थान पर उन्मुक्त व्यवहार करने लगे तो हम-आप क्या करेंगे? या फिर प्रशासन वहां क्या करेगा? क्या लैेंिंगक समानता का अर्थ पुरुशों की तरह ही लड़कियों का शराब पीना है? हम यह भूल रहे हैं कि घर में शराब के कारण सबसे ज्यादा संकट महिलाओं पर ही आती है। जिन राज्यों में शराब की दूकाने या ठेके बंद होने के विरुद्ध आंदोलन व्यापक हुआ उनमें महिलाओं की ही संख्या सर्वाधिक रही है। श्रीराम सेना ने जिस तरीके से विरोध किया वह गलत था। अगर किसी को लगता है कि शराब पीना उसका अधिकार है तो लोकतंत्र में यही अधिकार उसका विरोध करने वालों को भी है। हां, यह विरोधी पूरी तरह अहिंसक होना चाहिए। ऐसे विरोध की नैतिक शक्ति भी अधिक होती है।
मंगलवार, 13 जनवरी 2009
सत्यम् के बाद देश की तीसरी बड़ी सॉटवेयर कंपनी विप्रो के साथ तीन अन्य कंपनियों मेगासॉट कंसलटेंट्स, नेक्टर फर्मास्यूटिकल्स, गैप इंटरनेशनल एवं एक व्यक्ति को विश्व बैंक द्वारा प्रतिबंधित करने पर भारतीय उद्योग जगत में खलबलाहट देखी जा रही है। कुछ लोगों ने विश्व बैंक को ही निशाने पर ले लिया है। अपने कर्मचारियों को कंपनी के शेयर खरीदने का विकल्प देकर भारत मेेंं नई कॉरपोरेट संस्कृति की अग्रदूत बनी विप्रो की छवि एक पारदशीZ एवं कार्यकुशल कंपनी की है। विश्व बैंक के कर्मचारियों को अनुचित लाभ देने के आरोप से निश्चय ही विप्रो की छवि पर बट्टा लगा है। सत्यम पर भी यह आरोप था। उद्योग संगठनों द्वारा आगे आकर दुनिया भर में भारतीय कंपनियों की बिगड़ती छवि को बचाने की कोिशश स्वाभाविक है। संभव है विश्व बैंक के इस कदम के पीछे भारतीय एवं अंतरराश्ट्रीय कॉरपोरट घरानों की प्रतिस्पर्धा हो, या फिर स्वयं विश्व बैंक की अुदरुनी लड़ाई का भी यह परिणाम हो। विप्रो ने अपने बयान मेंं इसे महत्व न देते हुए कहा है कि विश्व बैंक के साथ उसका कारोबार इतना छोटा है कि इससे कोई अंतर नहीं आएगा। मेगासॉट ने भी 2004 से विश्व बैंक के साथ कोई कारोबार न होने का बयान दिया है। ये बातें अपनी जगह ठीक हैं। किंतु हम जानते हैं कि व्यापार की दुनिया में विश्व बैंक का क्लाइंट होने मात्र से कंपनी के प्रोफाइल की कद बढ़ जाती है। यह नहीं भूलना चाहिए कि विप्रो पर प्रतिबंध जून 2007 में लगाया गया जिसकी जानकारी कंपनी छिपाए रखी। क्यों? एक कर्मचारी को 72 हजार डॉलर के 1750 शेयर कंपनी के मिले यह सत्य है। यह बात अलग है कि विप्रो इसे कंपनी नियमों के अनुरुप बता रही है। यह नजरिए का अंतर है। आश्चर्य की बात है कि भारत में आम भ्रश्टाचार की बात स्वीकारने वाले भी विश्व बैंक के कदम पर आंखे तरेड़ते हुए विप्रो सहित भारतीय कंपनियों को सत्यनिश्ठ एवं ईमानदार साबित करने पर तुले हैं। कौन सी कंपनी है जो अपना काम निकालने के लिए घूस नहीं देती है। भारत में नीचे से ऊपर तक हर कंपनियों के हर काम के लिए घूस की रकम तय है। क्या यह संभव है कि हमारी जो कंपनियां अपने देश में अनुचित लाभ पहुंचाकर अपना काम निकलवाती हैं वो विदेशों मेंं ऐसा करने से परहेज करती होंगी। कॉरपोरेट के साथ जो ऊपरी चमक-दमक दिखती है उसके अंदर उतना ही कालिख है। इसमें हमें-आपको पड़ने की आवश्यकता नहीं है। हम यह भूल रहे हैं कि विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष पॉल वोल्फोवित्ज को वित्तीय अनियमितता के कारण पद से हटना पड़ा, भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद व्यापक जांच पड़ताल हुई जिनमें ऐसी अनेक अनियमितताएं सामने आईं। यह कहना भी गलत है कि केवल भारत की कंपनियां ही प्रतिबंधित हो रही हैं। अमेरिका,ब्रिटेन, रुस, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, इंडोनेिशया की कंपनियां भी विश्व प्रतिबंध के दायरे में आईं हैं।
सत्यम् कम्प्युटर्स के संस्थापक बी रामलिंग राजू और उनके भाई रामा राजू को हिरासत में लेने के अलावा कानूनी एजेंसियों के पास कोई विकल्प नहीं था। जो व्यक्ति स्वयं यह स्वीकार कर रहा हो कि वह बाजार में अपना वैल्यू बनाए रखने के लिए अपनी आमदनी के गलत आंकड़े प्रस्तुत कर रहा था उसे यूं ही छोड़ा नहीं जा सकता। इसमें आम निवेशकों का कितना धन डूबा और सत्यम ने झूठ और फरेब के बल पर कितना माल बाजार से प्राप्त किया इसका वास्तविक हिंसाब मिलने में समय लगेगा। सरकार ने सत्यम के निदेशक मंडल को भंग कर नया निदेशक मंडल नियुक्त करने का फैसला किया है। कई स्तरों से जांच शुरु हो गई है। जाहिर है, अगले कुछ दिनों में सत्यम का वास्तविक जुगुप्सापूर्ण चेहरा ज्यादा खुलकर हमारे सामने होगा। लेकिन सत्यम का मामला केवल गिरतारी एवं जांच तक ही सीमित नहीं है। इसके साथ नए दौर में व्यापार, रोजगार आदि के कई अहम् प्रश्न जुड़े हैं। भारत में ऐसे लोगों की तादाद बहुत बड़ी है जो यह मानते हैं कॉरपोरेट जगत में खातों की ऐसी हेराफेरी करके अरबों रुपयों के घपले हो रहे हैं। आखिर सॉटवेयर कंपनियों में घाटे या मंदी का असर अकेले सत्यम पर तो नहीं होगा। इसलिए केवल सत्यम नहीं, अन्य कंपनियों के खातों की गहरी निगरानी एवं छानबीन का कुशल तंत्र तुरत सक्रिय होना चाहिए। सत्यम के फरेब के बाद सरकार कह रही है कि इससे भारतीय कंपनियों की विश्व बाजार में साख धूमिल हुई है। इसके पहले सत्यम् को भारतीय कपंनियों में नगीना के तौर पर पेश किया जाता रहा है। भूमंडलीकरण के बाद कंपनियों के लिए अपने व्यापार के साथ विश्व बाजार में अपनी सशक्त छवि बनाए रखने की विवशता उत्पन्न हो गई है। इस विवशता में कंपनियां शेयर बाजारों में अपनी कीमत ऊंची रखने के लिए कई प्रकार के तिकड़म करने को मजबूर भी होतीं हैं। क्या कोई ऐसा रास्ता निकल सकता है जिससे कंपनियां ऐसी मजबूरी से मुक्त हो सकें? वह अपने मूल व्यापार तक सीमित रहे तो ऐसी नौबत नहीं आएगी। तीसरे, नए दौर में चकाचौंध, चमचमाहट और अपने कर्मचारियों के वेतन-भत्ते अन्यों से बेहतर देने की भी होड़ चली है। इसके आधार पर भी कंपनियों की रैंकिंग होती है। हालंाकि इसका लाभ सभी कर्मचारियों को नहीं मिलता, लेकिन इसमें कपंनियों का खर्च औकात से ज्यादा होने लगता है। जब खर्च और आय के बीच संतुलन नहीं होगा तो ऐसी ही दुर्दशा होगी जैसी सत्यम की हुई है। चौथे, देश में ऐसे चार्टर्ड आकाउंटेड फर्म हैं जो कंपनियों की इच्छा के मुातबिक उनका बैलेंस शीट बना देतीं हैं। आईसीएआई ने सत्यम् मामले में ऑडिट फर्म प्राइसवाटर हाउसकूपर्स को सत्यम् मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इसमें जिन लोगों ने सत्यम् का अंकेक्षण किया उनको भले सजा मिल जाएगी, जिसका अत्यंत ही सीमित असर होगा। सरकार को अपनी कर नीति पर भी विचार करने की जरुरत है कि आखिर कोई कंपनी या व्यक्ति गलत बैलेंस शीट बनाने को मजबूर क्यों होता है।
भारत की चौथी एवं दुनिया की प्रमुख सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी में शुमार होनेवाली सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज की ऐसी दुर्दशा की कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी। लेकिन जब कंपनी के प्रोमोटर एवं प्रबंध निदेशक रामलिंगा राजू स्वयं बोर्ड को लिखे 7 जनवरी 2009 के पत्र में यह स्वीकार कर चुके हैं कि पिछले सितंबर में उन्होने बिक्री एवं मुनाफे के जो आंकड़े दिए वे झूठे हैं तो फिर सामान्य तौर पर किसी के लिए कुछ कहने को रह ही नहीं जाता। राजू की स्वीकारोक्ति अचंभित करने वाली है। क्या यह सोचा भी जा सकता है कि बैलेंस शीट में से पांच हजार करोड़ रुपया कंपनी के पास था ही नहीं? या फिर 649 करोड़ का मुनाफा गलत बताया गया? या कर्जदारों पर कर्ज की ज्यादा रकम दिखाकर इसे वित्तीय दृष्टि से काफी मजबूत बताया जाता रहा है? अब यह भी साफ हो गया है राजू ने कंपनी को कुछ बड़ी निवेशक कंपनियों के हाथों 502 करोड़ में अपने सारे शेयर बेच दिया है जिसका अर्थ यही है कि यह कंपनी उन खरीदारों के पास गिरवी है। कुल मिलाकर 40 अरब रुपए के फर्जीबारे का यह भारतीय कॉरपोरेट जगत के भ्रश्टाचार में एक शर्मनाक रिकॉर्ड की तरह दर्ज हो गया है। राजू का नाम तो काले अक्षरों में आ गया, लेकिन इसकी तो जांच होनी चाहिए कि आखिर किन परिस्थितियों में ये सारी गड़बड़ियां हुईं?आखिर किस हालत में राजू को कंपनी के अपने शेयर बेचने को मजबूर होना पड़ा? क्यों उसे झूठे बैलेंस शीट बनाने पड़े? इसकी जांच से दूसरी कंपनियों के बारे में भी अनुमान लगेगा। शेयर बाजार में इसका असर बुरा होना ही था। कुछ ही दिनों पहले जब विश्व बैंक ने सत्यम को घूस देकर आंकड़े चुराने का मामला प्रकाश में आने के साथ उसे काली सूची में डाला तो उसके समर्थन करने वाले भी सामने आ गए थे। इससे पूरे कॉरपोरेट जगत को संदेह की नजर से देखा जाने लगा है। पता नहीं कितनी कंपनियों घाटे में जाने के बाद खाता बही में घपले करके शेयर बाजार में अपनी मजबूती बनाए रख रही होंगी। सरकार को इससे सबक लेते हुए शेयर बाजार एवं कॉरपोरेट के बारे में रवैया बदलना चाहिए। कौरपोरेट जगत अपने प्रभाव का प्रयोग कर ऐसी घपलेबाजी करते रहते हैं। इन पर टिका शेयर बाजार भी इसका िशकार होता है और सरकार हमेशा बाजार को बचाने के लिए धन भी झोंकती है। क्या सरकार के पास ऐसी मशीनरी है कि वह एक-एक कंपनी की अंदरुनी माली हालत का मूल्यांकन कर सके? ऐसी मशीनरी होनी तो चाहिए जो कि सख्ती से उनकी निगरानी कर सके। इन टिप्पणियों में भी बार-बार यह सुझाव दिया जा रहा है कि शेयर बाजार में जिन कंपनियों के भाव एक समय तेजी से चढ़े और जिनके तेजी से गिरे उन सबकी गहराई से जांच होनी चाहिए। सत्यम का मामला अकेला नहीं हो सकता।
शनिवार, 3 जनवरी 2009
Assaam explosion 1 Jan 2008
गुवाहाटी विस्फोट
नए साल के पहले दिन गुवाहाटी में धमाका करने आतंकवादियों ने अपना इरादा जता दिया है। ये विस्फोट यद्यपि ज्यादा विनाशकारी नहीं थे, लेकिन समय और स्थान के हिंसाब से देखने पर इसके अर्थ काफी बड़े दिखाई देते हैं। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के गुवाहाटी पहुंचने के कुछ ही समय पहले विस्फोट किया गया। वे पुलिस, अर्धसैनिक बल एवं सेना के एकीकृत कमान तंत्र या यूनिफाइड कमांड स्ट्रक्चर की बैठक में शामिल होने के साथ सुरक्षा जायजा लेने गए हैं। भूतनाथ क्षेत्र से उन्हें गुजरना था और वहां साइकिल पर विस्फोटक रखकर विस्फोट किया गया। प्रधानमंत्री भी िशलॉंग में इंडियन साइंस कॉन्ग्रेस का उद्घाटन करने के पहले वहां पहुचंने वाले थे। जाहिर है, विस्फोट करने वालों ने गृहमंत्री एवं प्रधानमंत्री दोनों की यात्राओं को ध्यान में रखते हुए ही धमाका किया है। स्पश्टत: वे यह जताना चाहते थे कि नई सुरक्षा व्यवस्था के सामने उन्हें कमजोर एवं शांत नहीं मान लिया जाए। यानी वे सरकार की सारी व्यवस्थाओं को नकारते हुए हमला कर सकते हैं। इस प्रकार उन्होंने इस धमाके से प्रदेश व केन्द्र सरकार दोनों को सीधी चुनौती दी है। मुंबई हमले के बाद से देश में आतंकवादी खतरों के मद्दे नजर समग्र सुरक्षा तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करने का जो कदम उठाया जा रहा है एवं चिदम्बरम गृहमंत्रालय संभालने के बाद जितनी सघनता से कार्य कर रहे हैं कम से कम असम में इसे अवश्य चुनौती दी गई है। इन धमाकों का संबध बंगलादेश चुनाव में शेख सहीना की भारी विजय से भी है। हसीना ने अपनी भूमि का आतंकवादी गतिविधियों के लिए उपयोग नहीं होने देने की घोशणा की है। बंगलादेश में जेहाद के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले संगठन शेख हसीना के खिलाफ हैं। उनके दिशा निर्देश पर या उनके साथ मिलकर काम करने वाले उल्फा ने इन विस्फोटों के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया है। पुलिस का मानना है कि इस धमाके में उल्फा 709 बटालियन की भूमिका है। हालांकि इस समय उल्फा व दूसरे उग्रवादी संगठन विभक्त हैं। बंगलादेश स्थित आकाओं के निर्देश पर काम करने वाले सरकार के साथ बातचीत के विरुद्ध में हैं तो उनसे अलग होने वाले पक्ष में। उल्फा के दो समूहों अल्फा एवं चालीZ कंपनीज ने नेतृत्व से विद्रोह कर जून में ही युद्ध विराम घोशित कर दिया था। बंगलादेश स्थित उल्फा नेतृत्व उसके खिलाफ है। निश्चय ही इन विस्फोटों के द्वारा उन्होंने संघशZ विराम का भी विरोध किया है। जाहिर है, पूर्वोत्तर के संदर्भ में आतंकवादी विरोधी नीति बनाते समय हमें इस सारे पहलुओं का ध्यान रखना होगा। बंगलादेश पूर्वोत्तर सहित सम्पूर्ण भारत में आतंकवादी गतिविधियों का प्रमुख स्रोत बन चुका है। शेख हसीना के आने से इस स्थिति में परिवर्तन की जो संभावना दिख रही है उसे वास्तविकता में परिणत करना आवश्यक है। इसलिए आंतरिक सुरक्षा में चुस्ती के साथ बंगलादेश के साथ मिलकर अभियान चलाने के लिए बातचीत आंरभ की जानी चाहिए।
गाँधी साहित्य कॉपीराइट से मुक्त हुआ
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की रचनाओं से नवजीवन ट्रस्ट का कॉपीराइट समाप्त हो गया है। 1957 के भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अनुसार गांधी जी की मृत्यु के 60 साल बाद यह अवश्यंभावी था। इसमें किसी लेखक की मृत्यु के बाद कॉपीराइट उस साल के अगले साल से लेकर 60 साल तक रहता है। गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी और उसके अनुसार 1 जनवरी 2009 से कोई भी प्रकाशक गांधी जी की रचनाओं को नवजीवन ट्रस्ट को बिना रॉयल्टी शुल्क दिए या अनुमति के बिना प्रकाशित कर सकता है। इसे दो नजरिए से देखा जा सकता है। एक नजरिया यह है कि गांधी साहित्च की ओर विश्वव्यापी अभिरुचि को देखते हुए कुछ प्रकाशक इसे व्यावसायिक तरीके से छापकर लाभ कमाने की कोिशश करेंगे। गांधी जी ने अपनी रचनाओं को व्यावसायिकता की होड़ से बचाने के लिए ही सारे कॉपीराइट नवजीवन ट्रस्ट को दे दिया था। उन्होने अपने परिवार के किसी सदस्य को इसकी रॉयल्टी का हकदार नहीं बनाया। जाहिर है, गांधी रचना के संदर्भ में स्वय गांधीजी की चाहत के अंत का खतरा है। लेकिन दूसरी ओर इससे गांधीजी के विचारों के प्रसार का आयाम काफी विस्तृत हो गया है। नवजीवन ट्रस्ट ने इसी नजरिए को अपनाते हुए इसका समर्थन किया है। अब दुनिया भर में जो चाहेगा किसी भी भाशा में छापकर उसका जैसे चाहे उपयोग कर सकता है। पहले की बंदिश में यह संभव नहीं था। जो लोग गांधी विचारों में दुनिया का भविष्य देखते हैं उन्हें खतरे की ओर देखने की बजाय इस अवसर का लाभ उठाने पर ध्यान देना चाहिए। गांधी जी लिखित मूल पांच पुस्तकों के अलावा हरिजन, यंग इंडिया, नवजीवन आदि में लिखे उनके लेखों को मिलाकर एक सौ से ज्यादा पुस्तके हैंं। किसी प्रकाशक के लिए इनमें से सबसे उपयुक्त पुस्तकों का चयन काफी कठिन है। निश्चय ही वे नवजीवन ट्रस्ट या गांधी साहित्य से वाकिफ लोगों की मदद लेना चाहेंगे। गांधी विचार से जुड़ी संस्थाएं समय की आवश्यकता देखते हुए उनमें से कुछ विशेश पुस्तकों की अनुशंसा कर सकती हैंं। इससे उनका काम आसान हो जाएगा। यह संभव है कि व्यावसायिकता की दृष्टि से अन्य प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का मूल्य ज्यादा होगा। किंतु हमारे पास इस सच को स्वीकार करने के अलावा चारा क्या है। इससे चिंतित होने वालों को नवजीवन की सीमाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। नवजीवन चाहकर भी पूरी दुनिया में सारी रचनाओं को पहुंचाने में सक्षम नहीं था। कम से कम व्यवसाय करने वाले प्रकाशक या अन्य संस्थानएं जहां हैंं वहां तो इनका प्रसार करेंगे। भले व्यावसायिकता के लिए गांधी साहित्य छापा जाए लेकिन अंतत: उसमें सामिग्रंयां तो वही होंगी। इसलिए इसमें चिंता की कोई बात नहीं। नवजीवन ट्रस्ट पहले के समान गांधी साहित्य के प्रचार-प्रसार में लगा रहेगा। हां, रॉयल्टी बंद होने से इसकी आय पर असर पड़ेगा। इसकी भरपाई कैसे हो एवं पुस्तकें सस्ते मूल्य पर उपलब्ध हों इसके लिए अवश्य कुछ किया जाना चाहिए।
शुक्रवार, 2 जनवरी 2009
सरकार ने साल के पहले दिन से गैर कानूनी गतिविधि निवारण संबंधी कानून एवं राष्ट्रीय जांच एजेसी की औपचारिक शुरुआत कर आतंकवाद के खिलाफ कठोर रुख का संदेश दिया है। साल 2008 के अंतिम दिन इसकी घोषणा करने के पीछे गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की मंशा को समझना बहुत आसान है। यानी पीछे जो कुछ भी हुआ उसे भूलकर नए साल में सरकार आतंकवाद को परास्त करने के दृढ़ संकल्प के साथ हर मुमकिन प्रयास करेगी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी को शीघ्र ही नया महानिदेशक मिल जाएगा एवं वह तुरत पहले मुकदमे के साथ सक्रिय होगा। खुफिया ब्यूरो के बहु एजेंसी केन्द्र मैक का पुनर्गठन भी काफी महत्वपूर्ण कदम है। यद्यपि इसका गठन राजग सरकार के दौरान दिसंबर 2001 में किया गया था, लेकिन अब इसे कानूनी ताकत देकर सभी संबंधित एजेंसियों के साथ खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान अपरिहार्य बना देने से इनके बीच बेहतर तालमेल हो सकेगा। इससे आतंकवाद संबंधी खुफिया रिपोर्ट केन्द्र एवं राज्यों की सभी एजेंसियों को तुरत उपलब्ध हो जाएगी। मैक के चौबीस घंटा सक्रिय रहने से यह उम्मीद की जा सकती है कि अब आतंकी अपराध या ऐसे अन्य गंभीर आपराधिक घटनाओं की साजिशों पर गहरी खुफिया नजर होगी एवं इसका विश्लेषण पहले से काफी बेहतर होगा। आतंकवादी हमलों के संदर्भ में खुफिया विफलता भारत की सबसे बड़ी टीस बनती रही है। मैक के साथ इस घातक दुर्बलता का अंत हो यही देश की कामना है। चार शहरों में एनएसजी का गठन एवं सेना के साथ उसका प्रिशक्षण, विद्रोह रोधी एवं आतंकवाद विरोधी 20 महाविद्यालयों की स्थापना, तटीय कमान बल का गठन आदि सारे कदम इसी बात के सबूत हैं कि सरकार आतंकवाद के खिलाफ पूर्ण सुरक्षित-संरक्षित ढांचों के रुप में अब नया अवतार ले रही है। वास्तव में जेहादी आतंकवाद भारत को जिस प्रकार हर कुछ अंतराल पर लहूलुहान कर रहा है उसमें उसके निरोध एवं मुकाबले से संबंधित सभी पहलुओं को समाहित करते हुए समग्र ढांचा की आवश्यकता हर कोई महसूस करता रहा है। इसमें एहतियात बरतने एवं हमले के पूर्व उनको निष्फल करने से लेकर हमला होने के बाद प्रभावी मुकाबले तक के ढांचे शामिल हैं। नाभिकीय व रक्षा संस्थानों सहित अनेक ऐसे स्थानों के उपर से हवाई उड़ानों पर प्रतिबंध, कुछ क्षेत्रों को गैर उìयन क्षेत्र घोषित करना आदि एहतियातन कदम हैं। मैक का नया स्वरुप हमले की साजिशों को निष्फल कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। हमें एक साथ साल 2009 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी मिल गई तो उसकी जांच एवं कानूनी प्रक्रिया को बल देने के लिए कठोर कानून। इससे छानबीन एवं दोषियों को सजा दिलवाना पहले से ज्यादा आसान हो जाएगा। खुफिया गतिविधियों को सशक्त, सुलभ एवं तीक्ष्ण बनाने की मांग भी पूरी हुई तो हमले के बाद मुकाबले के लिए पर्याप्त कमांडो की आवश्यकता भी। महाविद्यालयों में प्रिशक्षित युवा भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करेंगे। इस प्रकार भारत भी धीरे-धीरे आतंकवाद के खिलाफ एवं आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में सशक्त आधारभूत संरचना वाले देशों की श्रेणी में शामिल होने की ओर अग्रसर हो गया। इन व्यवस्थाओं को राजनीतिक नेतृत्व का सही मार्गदर्शन मिला तो भारत यकीनन दुनिया के सर्वाधिक सुरक्षित देशों की कतार में शामिल हो जाएगा। हम सब यही दुआ करेंगे कि यह सपना किसी तरह सच हो जाए।