शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

नए साल में सुरक्षा व्यवस्था की नई शुरुआत
सरकार ने साल के पहले दिन से गैर कानूनी गतिविधि निवारण संबंधी कानून एवं राष्ट्रीय जांच एजेसी की औपचारिक शुरुआत कर आतंकवाद के खिलाफ कठोर रुख का संदेश दिया है। साल 2008 के अंतिम दिन इसकी घोषणा करने के पीछे गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की मंशा को समझना बहुत आसान है। यानी पीछे जो कुछ भी हुआ उसे भूलकर नए साल में सरकार आतंकवाद को परास्त करने के दृढ़ संकल्प के साथ हर मुमकिन प्रयास करेगी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी को शीघ्र ही नया महानिदेशक मिल जाएगा एवं वह तुरत पहले मुकदमे के साथ सक्रिय होगा। खुफिया ब्यूरो के बहु एजेंसी केन्द्र मैक का पुनर्गठन भी काफी महत्वपूर्ण कदम है। यद्यपि इसका गठन राजग सरकार के दौरान दिसंबर 2001 में किया गया था, लेकिन अब इसे कानूनी ताकत देकर सभी संबंधित एजेंसियों के साथ खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान अपरिहार्य बना देने से इनके बीच बेहतर तालमेल हो सकेगा। इससे आतंकवाद संबंधी खुफिया रिपोर्ट केन्द्र एवं राज्यों की सभी एजेंसियों को तुरत उपलब्ध हो जाएगी। मैक के चौबीस घंटा सक्रिय रहने से यह उम्मीद की जा सकती है कि अब आतंकी अपराध या ऐसे अन्य गंभीर आपराधिक घटनाओं की साजिशों पर गहरी खुफिया नजर होगी एवं इसका विश्लेषण पहले से काफी बेहतर होगा। आतंकवादी हमलों के संदर्भ में खुफिया विफलता भारत की सबसे बड़ी टीस बनती रही है। मैक के साथ इस घातक दुर्बलता का अंत हो यही देश की कामना है। चार शहरों में एनएसजी का गठन एवं सेना के साथ उसका प्रिशक्षण, विद्रोह रोधी एवं आतंकवाद विरोधी 20 महाविद्यालयों की स्थापना, तटीय कमान बल का गठन आदि सारे कदम इसी बात के सबूत हैं कि सरकार आतंकवाद के खिलाफ पूर्ण सुरक्षित-संरक्षित ढांचों के रुप में अब नया अवतार ले रही है। वास्तव में जेहादी आतंकवाद भारत को जिस प्रकार हर कुछ अंतराल पर लहूलुहान कर रहा है उसमें उसके निरोध एवं मुकाबले से संबंधित सभी पहलुओं को समाहित करते हुए समग्र ढांचा की आवश्यकता हर कोई महसूस करता रहा है। इसमें एहतियात बरतने एवं हमले के पूर्व उनको निष्फल करने से लेकर हमला होने के बाद प्रभावी मुकाबले तक के ढांचे शामिल हैं। नाभिकीय व रक्षा संस्थानों सहित अनेक ऐसे स्थानों के उपर से हवाई उड़ानों पर प्रतिबंध, कुछ क्षेत्रों को गैर उìयन क्षेत्र घोषित करना आदि एहतियातन कदम हैं। मैक का नया स्वरुप हमले की साजिशों को निष्फल कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। हमें एक साथ साल 2009 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी मिल गई तो उसकी जांच एवं कानूनी प्रक्रिया को बल देने के लिए कठोर कानून। इससे छानबीन एवं दोषियों को सजा दिलवाना पहले से ज्यादा आसान हो जाएगा। खुफिया गतिविधियों को सशक्त, सुलभ एवं तीक्ष्ण बनाने की मांग भी पूरी हुई तो हमले के बाद मुकाबले के लिए पर्याप्त कमांडो की आवश्यकता भी। महाविद्यालयों में प्रिशक्षित युवा भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करेंगे। इस प्रकार भारत भी धीरे-धीरे आतंकवाद के खिलाफ एवं आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में सशक्त आधारभूत संरचना वाले देशों की श्रेणी में शामिल होने की ओर अग्रसर हो गया। इन व्यवस्थाओं को राजनीतिक नेतृत्व का सही मार्गदर्शन मिला तो भारत यकीनन दुनिया के सर्वाधिक सुरक्षित देशों की कतार में शामिल हो जाएगा। हम सब यही दुआ करेंगे कि यह सपना किसी तरह सच हो जाए।

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