यह कैसा आचरण
श्रीराम सेना का तरीका गलत लेकिन मुद्दा सही है
कर्नाटक पुलिस ने पब में लड़कियों-महिलाअों पर हमला करने वाले श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं को गिरतार कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई ‘ाुरु कर दिया है। प्रदेश के गृहमंत्री ने भी निश्पक्ष कार्रवाई का बयान दिया है। किसी भी मामले में कानून अपने हाथ में लेने का समर्थन नहीं किया जा सकता। खासकर हिंसक तरीके से किए किए विरोध का संदेश काफी नकारात्मक जाता है भले कारण कितना भी वाजिब क्यों न हो। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गलत तरीके से विरोध करने मात्र से वह कारण सही हो गया। यह मामला पब में लड़कियों के शराब पीने का है। प्रश्न किया जा सकता है कि जब पब में पुरुशों के शराब पीने पर पाबंदी नहीं है तो महिलाओं पर क्यों होनी चाहिए? आखिर हमारा संविधान एवं कानून पुरुश महिला के बीच भेद नहीं करता। एक पब के लिए दोनों उपभोक्ता हैं और जब सरकार ने लाइसेंस दिया है तो उसके ग्राहकों को रोकने का अर्थ एक मान्य व्यवसाय के रास्ते आपराधिक तरीके से बाधा खड़ी करना है। जितनी कम संख्या में ग्राहक वहां जाएंगे व्यापार उतना ही कमजोर होगा एवं सरकार को कर भी उसी अनुपात में कम मिलेंगे। इस दृिश्ट से विचार करने वाले यह मानेंगे कि श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं ने वाकई अपराध किया है और उन्हें उसकी सजा मिलनी चाहिए। किंतु यहां श्रीराम सेना को कुछ समय के लिए गौण कर इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखिए। महात्मा गांधी से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे मनीशियों ने भारत को शराब मुक्त देश बनाने की कल्न्पना की थी। वे जिस महान और आदशZ भारत की कल्पना करते थे उसमें नशा, पशु हत्या आदि का कोई स्थान नहीं था। उस समय से आज तक देश में शराबबंदी आंदोलन किसी न किसी स्तर पर चल रहा है। क्या यह सत्य नहीं है कि भारत में बहुसंख्य हिसंक अपराधों के पीछे शराब की भूमिका है? यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्वयं लड़किया-महिलाएं कई बार शराब की पार्टी के बाद दुश्कर्म का िशकार होती हैं। अगर शराब इतना ही स्वीकृत पेय है तो फिर शराब पीकर गाड़ी चलाने को क्यों अपराध माना जाता है? इसके खिलाफ क्यों प्रचार किया जाता है? कोई शराब पीकर यदि सार्वजनिक स्थान पर उन्मुक्त व्यवहार करने लगे तो हम-आप क्या करेंगे? या फिर प्रशासन वहां क्या करेगा? क्या लैेंिंगक समानता का अर्थ पुरुशों की तरह ही लड़कियों का शराब पीना है? हम यह भूल रहे हैं कि घर में शराब के कारण सबसे ज्यादा संकट महिलाओं पर ही आती है। जिन राज्यों में शराब की दूकाने या ठेके बंद होने के विरुद्ध आंदोलन व्यापक हुआ उनमें महिलाओं की ही संख्या सर्वाधिक रही है। श्रीराम सेना ने जिस तरीके से विरोध किया वह गलत था। अगर किसी को लगता है कि शराब पीना उसका अधिकार है तो लोकतंत्र में यही अधिकार उसका विरोध करने वालों को भी है। हां, यह विरोधी पूरी तरह अहिंसक होना चाहिए। ऐसे विरोध की नैतिक शक्ति भी अधिक होती है।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें