गाँधी साहित्य कॉपीराइट से मुक्त हुआ
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की रचनाओं से नवजीवन ट्रस्ट का कॉपीराइट समाप्त हो गया है। 1957 के भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अनुसार गांधी जी की मृत्यु के 60 साल बाद यह अवश्यंभावी था। इसमें किसी लेखक की मृत्यु के बाद कॉपीराइट उस साल के अगले साल से लेकर 60 साल तक रहता है। गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी और उसके अनुसार 1 जनवरी 2009 से कोई भी प्रकाशक गांधी जी की रचनाओं को नवजीवन ट्रस्ट को बिना रॉयल्टी शुल्क दिए या अनुमति के बिना प्रकाशित कर सकता है। इसे दो नजरिए से देखा जा सकता है। एक नजरिया यह है कि गांधी साहित्च की ओर विश्वव्यापी अभिरुचि को देखते हुए कुछ प्रकाशक इसे व्यावसायिक तरीके से छापकर लाभ कमाने की कोिशश करेंगे। गांधी जी ने अपनी रचनाओं को व्यावसायिकता की होड़ से बचाने के लिए ही सारे कॉपीराइट नवजीवन ट्रस्ट को दे दिया था। उन्होने अपने परिवार के किसी सदस्य को इसकी रॉयल्टी का हकदार नहीं बनाया। जाहिर है, गांधी रचना के संदर्भ में स्वय गांधीजी की चाहत के अंत का खतरा है। लेकिन दूसरी ओर इससे गांधीजी के विचारों के प्रसार का आयाम काफी विस्तृत हो गया है। नवजीवन ट्रस्ट ने इसी नजरिए को अपनाते हुए इसका समर्थन किया है। अब दुनिया भर में जो चाहेगा किसी भी भाशा में छापकर उसका जैसे चाहे उपयोग कर सकता है। पहले की बंदिश में यह संभव नहीं था। जो लोग गांधी विचारों में दुनिया का भविष्य देखते हैं उन्हें खतरे की ओर देखने की बजाय इस अवसर का लाभ उठाने पर ध्यान देना चाहिए। गांधी जी लिखित मूल पांच पुस्तकों के अलावा हरिजन, यंग इंडिया, नवजीवन आदि में लिखे उनके लेखों को मिलाकर एक सौ से ज्यादा पुस्तके हैंं। किसी प्रकाशक के लिए इनमें से सबसे उपयुक्त पुस्तकों का चयन काफी कठिन है। निश्चय ही वे नवजीवन ट्रस्ट या गांधी साहित्य से वाकिफ लोगों की मदद लेना चाहेंगे। गांधी विचार से जुड़ी संस्थाएं समय की आवश्यकता देखते हुए उनमें से कुछ विशेश पुस्तकों की अनुशंसा कर सकती हैंं। इससे उनका काम आसान हो जाएगा। यह संभव है कि व्यावसायिकता की दृष्टि से अन्य प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का मूल्य ज्यादा होगा। किंतु हमारे पास इस सच को स्वीकार करने के अलावा चारा क्या है। इससे चिंतित होने वालों को नवजीवन की सीमाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। नवजीवन चाहकर भी पूरी दुनिया में सारी रचनाओं को पहुंचाने में सक्षम नहीं था। कम से कम व्यवसाय करने वाले प्रकाशक या अन्य संस्थानएं जहां हैंं वहां तो इनका प्रसार करेंगे। भले व्यावसायिकता के लिए गांधी साहित्य छापा जाए लेकिन अंतत: उसमें सामिग्रंयां तो वही होंगी। इसलिए इसमें चिंता की कोई बात नहीं। नवजीवन ट्रस्ट पहले के समान गांधी साहित्य के प्रचार-प्रसार में लगा रहेगा। हां, रॉयल्टी बंद होने से इसकी आय पर असर पड़ेगा। इसकी भरपाई कैसे हो एवं पुस्तकें सस्ते मूल्य पर उपलब्ध हों इसके लिए अवश्य कुछ किया जाना चाहिए।
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