रविवार, 12 जुलाई 2009

रेल बजट में ममता का ममत्व

यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि रेल मंत्री ममता बनर्जी ने संप्रग सरकार के अपने पहले रेल बजट में वाकई अपना ममत्व उड़ेलने की कोिशश की है। वैसे यह उनका तीसरा रेल बजट है और पूर्व में भी हमने उनके जनोन्मुखी योजनाओं को देखा है। किंतु हम इसमें ममत्व की वेदी पर व्यावहारिक व्यावसायिक नजरिए एवं प्रगति के कदमों और योजनाओं की बलि चढते नहीं देख सकते। दोनों के बीच एक गहरा और बेहतरीन संतुलन है। एक ओर आवश्यक जनोन्मुखी घोशणाएं और योजनाएं हैं तो दूसरी ओर रेलवे को अंतरराश्ट्रीय मानदंडों पर उतारने के साथ उसे और कार्यकुशल बनाने की नई पहल भी। वास्तव में रेल बजट बनाते समय ममता के सामने एक ओर यात्री सुविधाओं में इजाफा करने के साथ सुरक्षा व्यवस्था की चुनौती थी तो दूसरी ओर माल ढुलाई से अधिकाधिक व्यवसाय पाने एवं रेलवे को यात्री एवं माल दोनों यातायात की दृष्टि से सक्षम एवं आकर्षक बनाने की। उन्होंने इन दोनों कसौटियों पर खरा उतरने की कोिशश की है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की तरह यह लोकप्रिय घोषणा और अधिकाधिक मुनाफे पर केिन्द्रत बजट नहीं है। उन्होंने अपने बजट का लक्ष्य स्पष्ट करते हुए कहा भी कि `लोग बेहतर रेल सुविधाओं की अपेक्षा करते हैं। विकास केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। लोग देश में स्टेशनों के बीच बेहतर जुड़ाव चाहते हैं। मेरी प्राथमिकता यात्रियों को बेहतर सुविधाएं, रक्षा एवं सुरक्षा तथा अच्छी गुणवत्ता वाला खाना-पानी उपलब्ध कराना होगा।´ उन्होंने तथाकथित आर्थिक रुप से अव्यवहार्य किंतु सामाजिक तौर पर अपेक्षित प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन पर सलाह के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाने की राय प्रकट की।आप देखेंगे कि रेल बजट में यात्री सुविधाओं पर ज्यादा जोर दिया गया है। भाड़े में किसी प्रकार की बढ़ोत्तरी न करना इसका पहला सबूत है। जिस तत्काल योजना को पूर्व रेल मंत्री ने कमाई का जरिया बना दिया था, उसमें संशोधन कर केवल दो दिनों पूर्व तक तत्काल टिकट मिलने एवं इसका शुल्क 150 रुपया से घटाकर 100 रुपया करके उन्होेंने वाकई यात्रियों को राहत दिया है। इसे हर दृष्टि से तािर्कक कदम कह सकते हैं। यात्री सुविधाओं पर अलग से 1102 करोड़ रुपया खर्च करने की योजना है। इज्जत योजना के अंदर 25 रुपए में 100कि. मी, का पास, स्टेशनों पर जनता खाना उपलब्ध कराना, गरीबों के लिए गरीब रथ से भी सस्ता रेल उपलब्ध कराने का वायदा, युवाओं और छात्रों के लिए विशेश वातानुकूलित रेल और 299 रुपए पर 1500 कि. मी. एवं 399 रुपए पर 3000 कि. मी. की यात्रा, कोलकाता मेट्रो में 60 प्रतिशत तक की रियायत, मदरसा के छात्रों को भी छात्र रियायत योजना मेें शामिल करना, मेट्रो शहरों में केवल महिलओं के लिए विशेश गाड़ियां,... आदि को हम लोकप्रियतावादी कह सकते हैं, पर भारत में गरीबों की संख्या, कुल जनसंख्या में युवाओं की तादाद व भीड़ वाले समय में महिला यात्रियों की कठिनाइयों को देखते हुए इसे अवांछित नहीं कह सकते। इज्जत योजना के तहत असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों को इससे बचत होगी एवं उन्हें भागमभाग में टिकट के लिए लंबी कतार भी नहीं लगानी होगी। यह बात अलग है कि जिला कलक्टर एवं सांसदों से इसका प्रमाण पत्र लेने की कसरत उन्हें करनी होगी। रेल मंत्री को प्रमाण के ऐसे दूसरे तरीके इजाद करने चाहिए ताकि कलक्टर कार्यालय के चक्कर लगाए बगैर भी उनका काम चल जाए। यात्रियों की दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय रेलवे के इतिहास में पहली बार 12 नन स्टॉप यानी कहीं न रुकने वाली रेलें पहली बार चालाई जाएंगी। अनारक्षित टिकट मिलने की टर्मिनल संख्या बढ़ना, 5000 डाक घरों में अनारक्षित टिकटों की बिक्री, मोबाइल वेैनों पर टिकट और उनका ग्रामीण क्षेत्रों मेे जाना, लंबी दूरी की रेलों में डॉक्टर की उपलब्धता, 200 स्टेशनों पर टिकटों की स्वचालित वेंडिंग मशीनें, राजधानी रेलों में मनोरंजन की सुविधा,... यात्री सुविधाओं में वृद्धि ही तो करेंगे। इसके अलावा आप देखिए, इंटर सिटी स्तर में दो मंजिला वातानुकूलित रेल, तीर्थों से संबंधित 50 स्टेशनों का विशेश विकास, 50 स्टेशनों पर बजट होटल, 200 स्टेशनों पर यात्री निवास,यात्री आरक्षण केन्द्र, 50 स्टेशन को अंतर्राष्ट्रीय सुविधाओं के साथ विश्वस्तरीय स्टेशन में बदलने की योजना आदि जहां यात्री सुविधाओं की श्रेणी में हैं वहीं इससे उनकी आधुनिक सोच का भी पता चलता है। 375 में से 309 स्टेशनों के आधुनिकीकरण की योजना भी इसी श्रेणी में आएगी। इसके लिए धन की व्यवस्था कैसे होगी इसका उत्तर उन्होंने इनोवेटिव फायनांस एवं सार्वजनिक निजी क्षेत्र साझेदारी दिया। यह सुधारवादी दृष्टिकोण है। यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि ये शब्द प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ही हैं। उन्होंने रेल बजट पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में ठीक यही शब्द प्रयोग किया। प्रधानमंत्री ने कम समय में उच्चस्तरीय बजट के लिए ममता बनर्जी की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें कांग्रेस पार्टी के चुनाव घोशणा पत्र में यात्रियों की सुविधाओं के साथ सुरक्षा बढ़ाकर रेल यात्रा को आनंदमय बनाने का जो वायदा था उसे तो पूरा किया ही गया है साथ ही उसे उत्पादक एवं कार्यक्षम बनाने की नई पहल भी है। सुरक्षा के नजरिए से 140 संवेदनशील स्टेशनों की सुरक्षा बेहतर करने एवं इनके बीच समेकित प्रणाली लागू करने के साथ महिला कमांडों की संख्या बढ़ाने एवं जिन स्थानों पर महिलाएं ज्यादा यात्राएं करतीं हैं वहां महिला रेलवे सुरक्षा बल दस्ते की तैनाती आदि महत्वपूर्ण घोषनाओं में शामिल हैं। ठीक समय पर पटरी का नवीनीकरण, सिग्नलों का आधुनिकीकरण, त्रुटियों को पकड़ने के लिए डिजिटल अल्ट्रासोनिक मशीनों का प्रयोग यदि योजनानुसार क्रियािन्वत किए गए तो यकीनन इससे रेलवे के अंदर यात्रियों में सुरक्षित होने का अहसास घनीभूत होगा। पिछले साल के रेल बजट में टक्कर रोधी यंत्र लगाने की योजनाएं घोषित हुईं, पर एक भी यंत्र का आदेश संबंधित कंपनी को निर्गत नहीं हुआ। उम्मीद करनी चाहिए कि ममता बनर्जी के काल में ऐसा नहीं होगा। इसके लिए पिछले बजट मंें आवंटित रािश पड़ी हुई है जिसका पूरा उपयोग किया जाना चाहिए। ममता ने यह संकेत दिया भी है कि वे सुरक्षा एवं संरक्षा के मामले में तनिक भी रियायत नहीं देनेवाली। यद्यपि कुमारी बनर्जी ने साफ शब्दों में कहा कि रेलवे केवल आर्थिक व्यावहार्यता के आधार पर नहीं चल सकता, सामाजिक प्रतिबद्धता इसकी मूल बात है, लेकिन उनकी कार्यशैली से मतभेद रखने वाले सुधारवादी भी यह मानने को विवश हैं कि उन्होंने प्रगतिशील सोच वाला एक व्यावहारिक बजट पेश किया है। इसमें रेलवे को सभी दृष्टियों से सक्षम बनाने की कोिशश साफ दिखाई देती है। माल ढुलाई का लक्ष्य 88 करोड़ 20 लाख मेट्रिक टन बिल्कुल व्यावहारिक है। ममता ने कृषि उत्पादों विशेषकर फल, सब्जी एवं ग्रामीण हस्तकला, सूत एवं कपड़ा उत्पादों को उपयुक्त बाजार बाजार तक ले जाने के लिए विशेष रेल की घोशणा को आप कुछ क्षण के लिए पुरानी समाजवादी किस्म की सोच कह सकते हैं, लेकिन इससे कृिश अर्थव्यवस्था को कितना बल मिलेगा एवं रेल की भी आमदनी धीरे-धीरे कितनी बढ़ेगी इसकी कल्पना करिए। ये कृषि उत्पाद बरबाद न हों, इसके लिए शीतगृह निर्माण की ओर कदम बढ़ाकर ममता ने किसानों के बीच रेलवे को और लोकप्रिय बनाने की कोिशश की है। शीत गृह की व्यवस्था न होने से अरबों रुपए की फल सब्जियां यूं ही प्रतिवर्ष बरबाद हो जातीं हैं। पूर्वी और पिश्चमी माल गलियारों के साथ डिब्बों के नििश्चत समय सीमा में परिचालन के लिए प्रीमियम मालढुलाई सेवा का प्रस्ताव रखा है। गारंटीशुदा समय में पार्सल पहुंचाने की प्रीमियम पार्सल सेवा भी तीन रास्तों पर शुरु होंगी। ममता ने कहीं भी निजी क्षेत्र की सेवा लेने से परहेज नहीं किया है। बस, इतना सचेत रहने का संदेश अवश्य दिया है जिससे रेलवे के जन सेवा का चरित्र न बदल जाए एवं वह केवल एक व्यावसायिक संस्थान में तिब्दल न हो जाए। सैम पित्रोदा की देखरेख में रेलवे लाइनों के साथ फाइबर केबुल डालने के तौर-तरीके इजाद करने के लिए समिति की घोशणा उनकी आधुनिक सोच को ही प्रतिबििम्बत करती है।ल्ंाबे समय से रेलवे के लिए दूरगामी नजरिया अपनाने की मांग की जा रही थी। कुमारी बनर्जी ने पिछले पांच सालों के सांगठनिक, परिचालन और वित्तीय प्रदशZन पर आधारित तथा निकटवर्ती एवं दूरगामी रणनीतिक योजनाअों वाले दृिश्टकोण 2020 नाम से जो “वेत पत्र लाने की घोशणा की है वह काफी महत्वपूर्ण है। इससे हमेें रेलवे की वर्तमान अवस्था के साथ भविश्य की झलक मिलेगी। पूर्व रेल मंत्री ने रेलवे के वित्तीय कायापलट का जो प्रचार किया उसकी भी असलियत हमारे सामने आ जाएगी। इस बजट को तैयार करने के लिए उन्हें कम समय मिला था। यह बात तो कोई भी स्वीकार करेगा कि रेलवे को तात्कालिक नहीं, दूरदर्शी नजरिए से विकसित करने की आवश्यकता है और आगामी “वेत पत्र इसे पूरा करेगा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।