गुरुवार, 4 जून 2009

Hafij freed

हाफिज की रिहाई


पाकिस्तान के लाहौर उच्च न्यायालय द्वारा हाफिज सईद एवं उसके साथी कर्नल नजीर अहमद की रिहाई से भारत को आघात लगना स्वाभाविक है। 26 नवंबर के मुंबई हमले की छानबीन में हाफिज मुख्य साजिशकर्ता के रुप में पाया गया है। कर्नल नजीर अहमद की साजिश के साथ आतंकवादियों को प्रिशक्षण देने में भी भूमिका रही है। पहली नजर में इनकी रिहाई मुंबई हमलों के मामले में पाकिस्तान की अगंभीरता का संदेश देता है। हालांकि पाकिस्तान सरकार इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय जा सकती है, किंतु उच्च न्यायालय के कथन से साफ है कि उसे कैद में रखने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं बनाया गया था। सईद किसी जेल में बंद नहीं था, उसे उसके घर में ही 11 दिसंबर 2008 को नजरबंद किया गया था। साफ है कि 2 दिसंबर 2008 को जमात-उद-दावा संगठन पर संयुक्त राश्ट्र द्वारा प्रतिबंध लगने तथा मुंबई हमलों के संदर्भ में भारतीय कूटनीति के दबाव में पाकिस्तान ने सईद को नजरबंद करने की औपचारिकता निभाई, पर उसके लिए जितना पुख्ता कानूनी आधार बनाने की आवश्यकता थी उसकी अनदेखी की। हाफिज लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापकों में शामिल है और 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद जब लश्कर प्रतिबंधित हुआ तो उसने जमता-उद-दावा नाम से उसी संगठन को रुपांतरित कर दिया। इसे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी तक ने स्वीकार किया है। सईद द्वारा अपनी नजरबंदी को चुनौती देनेवाली याचिका का जवाब देते हुए पाकिस्तान के महाधिवक्ता ने न्यायालय में कहा था कि सरकार के पास इस बात के प्रथमदृश्ट्या सबूत हैं कि जमात के अल कायदा के साथ रिश्ते हैं। आखिर पाकिस्तान सरकार ने अपने कथन को प्रमाणित करने के साक्ष्य न्यायालय के समक्ष क्यों प्रस्तुत नहीं किया? सईद ने रिहाई आदेश के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में जम्मू कश्मीर में संघशZ जारी रखने का ऐलान करके अपना इरादा बिल्कुल साफ कर दिया है। निश्चय ही उसकी रिहाई से भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न दूसरे नेताओं व संगठनों का साहस बढ़ेगा। इस प्रकार उसकी रिहाई से भारत की परेशानियां बढ़ गईं हैं। किंतु पाकिस्तान के अतीत को देखते हुए यह स्थिति कतई हैरत में डालनेवाली नहीं है। वैिश्वक आतंकवाद के खिलाफ संघशZ में पाकिस्तान सरकार वक्तव्यों में जैसी दृढ़ता प्रदिशZत करती है, कतृत्व में वैसा नहीं है। खासकर भारत के संदर्भ में उसका रवैया हमेशा दोहरे आचरण का परिचायक रहा है। सईद इसके पहले भी दो बार नजरबंद होकर रिहा हो चुका है। पाकिस्तान सरकार ने मुंबई हमलों के जो सबूत मांगे वे उसे दिए जा चुके हैं। उसको आधार बनाकर वह न्यायालय के सामने साक्ष्य प्रस्तुत कर सकती थी। जाहिर है, पाकिस्तान ने अपने दायित्व का ईमानदारी और गंभीरता से निर्वहन नहीं किया है। यह रवैया किसी तरह आतंकवाद से संघशZ में सहयोग का नहीं है। स्पश्ट है कि भारत की कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ गईं हैं। हमें पाकिस्तान को घेरने का कूटनीतिक अभियान तेज करना होगा।

General Motor bankrupt

दिवालिया जीएम

जेनरल मोटर्स को दुनिया की महाकाय वाहन निर्माता बहुराश्ट्रीय कंपनी का खिताब हासिल है। 1908 में स्थापित इस अमेरिकी कंपनी ने अगले साढ़े सात दशक तक विश्व की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी के रुप में अपना स्थान बनाए रखा। इसकी कैडिलेक और शेवरले जैसे ब्रांड आज भी कार के चहेतों की मुख्य पसंद है। ऐसी कंपनी अगर अमेरिका के दिवालिया न्यायालय में कानून के तहत बकायों की वसूल से संरक्षण के लिए याचिका दायर करती है तो यह निश्चय ही साधारण घटना नहीं है। यह कंपनी द्वारा अपने को दिवालिया घोशित करना है। यानी हमारे पास अब बकायों के भुगतान का सामथ्र्य नहीं है। इसे यदि कॉरपोरेट इतिहास में दिवालिया घोशित होने की बड़ी घटना मानी जा रही है तो यह उचित ही है। वास्तव में जीएम भी अब लेहमन ब्रदर्स एवं वािशंगटन म्युचुअल जैसी दिवालिया महाकाय कंपनियों की कतार में शामिल हो चुकी है। यह स्थिति तब हुई जब अमेरिकी सरकार सहायता पैकेज के रुप में इसे बचाने के लिए 20 अरब डॉलर की रािश दे चुकी है। जाहिर है, आर्थिक मंदी की मार ने जीएम को कहीं का नहीं छोड़ा है। 11 सितंबर की मार को झेलने वाली कंपनी का आर्थिक संकट को न झेल पाना यह साबित करता है कि संकट कितना गहरा है। तीन साल पहले तक नई नई योजनाओं से ग्राहकों को लुभाने वाली कंपनी की बढ़ते घाटे और घटती बिक्री ने चूल हिला दिया है। कंपनी ने मंदी से बचने के लिए हर संभव तरीके अपना लिए, लेकिन इसे बचाना मुिश्कल हो गया। यद्यपि जनरल मोटर्स की भारतीय ईकाई ने कहा है कि अमेरिका की घटना का उस पर असर नहीं होगा। अमेरिका में दायर दिवालिएपन के दावों के पक्ष में जो दस्तावेज पेश किए गए हैं उनमें जीएम इंडिया का परिचालन शामिल नहीं है एवं यह इस साल दो नए कार सामने लाने की भी घोशणा कर चुकी है। लेकिन हम जानते हैं कि इसका असर होगा। मातृ संस्था की छवि दिवालिया कंपनी की हो जाए और इसकी प्रशाखाएं बिल्कुल अप्रभावित रहें यह कैसे संभव है। वैसे भी आर्थिक मंदी का राक्षस केवल एक देश तक सीमित नहीं है। किंतु उम्मीद की सबसे बड़ी किरण यही है कि ओबामा प्रशासन जीएम को बचाना चाहती है। जीएम का बंद होना अमेरिका के लिए भी भारी नुकसानदायक होगा एवं इससे उसकी छवि खराब होगी सो अलग। संदेश यह जाएगा कि ओबामा प्रशासन आर्थिक संकट से निपटने में सक्षम साबित नहीं हो रहा है। इसलिए सरकार ने इसे बचाने का निश्चय किया है। दायर याचिका को सरकार का समर्थन हासिल है। उसने मदद की रािश देने के लिए हाथ अवश्य खड़े कर दिए हैं, किंतु वह पुनर्गठन कर इसका सबसे बड़ा हिस्सेदार बन सकती है। यदि वह कंपनी का 60 प्रतिशत हिस्सेदारी अपने पास रखती है तो इससे अतिरिक्त रािश मिल जाएगी एंव इसका पुन: परिचालन संभव हो पाएगा। लेकिन फिर अमेरिका राज्य नियंत्रणों से मुक्त जिस बाजार पूंजीवाद की वकालत करता है उसका क्या होगा?

Daughter and her boyfriend killed mother

प्रेम या वासना

राजधानी दिल्ली में एक बेटी द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिलकर मां की जघन्य हत्या का मामला किसी को भी हिलाकर रख देनेवाला है। अपनी ही बेटी की नृशंसता का िशकार होने वाली किरण कपूर नामक उस मां का क्या कसूर था? उसकी जगह कोई भी मां होती तो अपनी बेटी को प्रेमिका के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखकर वही करती जो किरण ने किया। लेकिन बेटी और उसके कथित प्रेमी को देखिए, शर्मिंदा होने और क्षमायाचक बनने की बजाय वे हिंसक हो गए। इसे कतई प्रेम नहीं कह सकते। प्रेम में कहां, हिंसा, कहां वासना, कहां भेदभाव! एक व्यक्ति से सच्चा पे्रम करने वाला किसी दूसरे से घृणा कर ही नहीं सकता है। प्रेम का आयाम तो इतना व्यापक है कि इसमें समस्त सृिश्ट समाहित कर दी जाए तब भी यह अनंत ही बना रहता है। वास्तव में लड़की साक्षी कपूर और उसके कथित प्रेमी सन्नी बत्रा के बीच सच्चा प्रेम न था न है। यह तो इस समय की विडम्बना है कि शारीरिक आकशZण एवं वासना को प्रेम मान लिया जाता है। फिल्मों से लेकर, टी. वी. , विज्ञापन आदि सब दो लिंगों के बीच खिंचाव को ही प्रेम बताते हैं और नई पीढ़ी उसी का अंध अनुसरण करती है। एक समय विवाह से पहले शारीरिक संबंध को पाप मानने की मानसिकता धीरे-धीरे लुप्त हुई है। धीरे-धीरे शारीरिक संबंध स्वाभाविक मान लिए गए हैं। जिस प्रेम की बात भारतीय वांगमय करता है उसमें शरीर गौण है, आत्मा प्रमुख है। लेकिन इस समय शरीर ही प्रधान हो चुका है। साक्षी एवं सन्नी शराब पीने के बाद यौनाचार में लिप्त होकर कौन सा प्रेम कर रहे थे! परिवार के सदस्यों की अनुपस्थिति में शराब लेकर ब्वायफ्रेंड का बुलाना और फिर अकेलेपन का लाभ उठाकर रंगरेलियां मनाने के पीछे केवल कामेच्छा की पूर्ति की ही भावना हो सकती है। ऐसा करने वाले साक्षी या सन्नी अकेले नहीं है। जिस समय ये दोनों एक दूसरे के आगोश में मदहोश थे उसी समय न जाने ऐसे या दूसरे तरीकों से कितने जोड़े उसी अवस्था में होंगे। प्रेम के नाम पर वासना का विस्तार और उसकी वेदी पर सारे संबंधों की बलि की ऐसी घटनाएं आए दिन समाचार माध्यमों में स्थान पाती रहतीं हैं। कहीं किरण की तरह अपनी बेटी के अध:पतन को न सहन करने वाली मां इसकी िशकार हो जाती हैं तो कई बार कोई दूसरा निशाने पर आ जाता है। काम हर जीव का स्वाभाविक धर्म है, गीता में श्रीकृश्ण ने स्वयं को काम कहा है-कामोअहम््। लेकिन उसकी वर्जनाओं और दुश्परिणामों से समाज को बचाने के लिए कुछ मर्यादाएं तय की गईं हैं। आधुनिकता के नाम पर दी जाने वाली िशक्षा और इससे जुड़ी जीवन शैली में भोग को सर्वाधिक महत्व मिलने से ये मर्यादाएं पिछड़ापन का प्रतीक मानी जाने लगीं हैं। इससे बचना है तो प्रेम के वास्तविक अर्थ के प्रचार के साथ साित्चक और नैतिक जीवन शैली को स्वाभाविक बनाने की कोिशश करनी होगी।