हाफिज की रिहाई
पाकिस्तान के लाहौर उच्च न्यायालय द्वारा हाफिज सईद एवं उसके साथी कर्नल नजीर अहमद की रिहाई से भारत को आघात लगना स्वाभाविक है। 26 नवंबर के मुंबई हमले की छानबीन में हाफिज मुख्य साजिशकर्ता के रुप में पाया गया है। कर्नल नजीर अहमद की साजिश के साथ आतंकवादियों को प्रिशक्षण देने में भी भूमिका रही है। पहली नजर में इनकी रिहाई मुंबई हमलों के मामले में पाकिस्तान की अगंभीरता का संदेश देता है। हालांकि पाकिस्तान सरकार इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय जा सकती है, किंतु उच्च न्यायालय के कथन से साफ है कि उसे कैद में रखने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं बनाया गया था। सईद किसी जेल में बंद नहीं था, उसे उसके घर में ही 11 दिसंबर 2008 को नजरबंद किया गया था। साफ है कि 2 दिसंबर 2008 को जमात-उद-दावा संगठन पर संयुक्त राश्ट्र द्वारा प्रतिबंध लगने तथा मुंबई हमलों के संदर्भ में भारतीय कूटनीति के दबाव में पाकिस्तान ने सईद को नजरबंद करने की औपचारिकता निभाई, पर उसके लिए जितना पुख्ता कानूनी आधार बनाने की आवश्यकता थी उसकी अनदेखी की। हाफिज लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापकों में शामिल है और 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद जब लश्कर प्रतिबंधित हुआ तो उसने जमता-उद-दावा नाम से उसी संगठन को रुपांतरित कर दिया। इसे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी तक ने स्वीकार किया है। सईद द्वारा अपनी नजरबंदी को चुनौती देनेवाली याचिका का जवाब देते हुए पाकिस्तान के महाधिवक्ता ने न्यायालय में कहा था कि सरकार के पास इस बात के प्रथमदृश्ट्या सबूत हैं कि जमात के अल कायदा के साथ रिश्ते हैं। आखिर पाकिस्तान सरकार ने अपने कथन को प्रमाणित करने के साक्ष्य न्यायालय के समक्ष क्यों प्रस्तुत नहीं किया? सईद ने रिहाई आदेश के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में जम्मू कश्मीर में संघशZ जारी रखने का ऐलान करके अपना इरादा बिल्कुल साफ कर दिया है। निश्चय ही उसकी रिहाई से भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न दूसरे नेताओं व संगठनों का साहस बढ़ेगा। इस प्रकार उसकी रिहाई से भारत की परेशानियां बढ़ गईं हैं। किंतु पाकिस्तान के अतीत को देखते हुए यह स्थिति कतई हैरत में डालनेवाली नहीं है। वैिश्वक आतंकवाद के खिलाफ संघशZ में पाकिस्तान सरकार वक्तव्यों में जैसी दृढ़ता प्रदिशZत करती है, कतृत्व में वैसा नहीं है। खासकर भारत के संदर्भ में उसका रवैया हमेशा दोहरे आचरण का परिचायक रहा है। सईद इसके पहले भी दो बार नजरबंद होकर रिहा हो चुका है। पाकिस्तान सरकार ने मुंबई हमलों के जो सबूत मांगे वे उसे दिए जा चुके हैं। उसको आधार बनाकर वह न्यायालय के सामने साक्ष्य प्रस्तुत कर सकती थी। जाहिर है, पाकिस्तान ने अपने दायित्व का ईमानदारी और गंभीरता से निर्वहन नहीं किया है। यह रवैया किसी तरह आतंकवाद से संघशZ में सहयोग का नहीं है। स्पश्ट है कि भारत की कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ गईं हैं। हमें पाकिस्तान को घेरने का कूटनीतिक अभियान तेज करना होगा।