दिवालिया जीएम
जेनरल मोटर्स को दुनिया की महाकाय वाहन निर्माता बहुराश्ट्रीय कंपनी का खिताब हासिल है। 1908 में स्थापित इस अमेरिकी कंपनी ने अगले साढ़े सात दशक तक विश्व की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी के रुप में अपना स्थान बनाए रखा। इसकी कैडिलेक और शेवरले जैसे ब्रांड आज भी कार के चहेतों की मुख्य पसंद है। ऐसी कंपनी अगर अमेरिका के दिवालिया न्यायालय में कानून के तहत बकायों की वसूल से संरक्षण के लिए याचिका दायर करती है तो यह निश्चय ही साधारण घटना नहीं है। यह कंपनी द्वारा अपने को दिवालिया घोशित करना है। यानी हमारे पास अब बकायों के भुगतान का सामथ्र्य नहीं है। इसे यदि कॉरपोरेट इतिहास में दिवालिया घोशित होने की बड़ी घटना मानी जा रही है तो यह उचित ही है। वास्तव में जीएम भी अब लेहमन ब्रदर्स एवं वािशंगटन म्युचुअल जैसी दिवालिया महाकाय कंपनियों की कतार में शामिल हो चुकी है। यह स्थिति तब हुई जब अमेरिकी सरकार सहायता पैकेज के रुप में इसे बचाने के लिए 20 अरब डॉलर की रािश दे चुकी है। जाहिर है, आर्थिक मंदी की मार ने जीएम को कहीं का नहीं छोड़ा है। 11 सितंबर की मार को झेलने वाली कंपनी का आर्थिक संकट को न झेल पाना यह साबित करता है कि संकट कितना गहरा है। तीन साल पहले तक नई नई योजनाओं से ग्राहकों को लुभाने वाली कंपनी की बढ़ते घाटे और घटती बिक्री ने चूल हिला दिया है। कंपनी ने मंदी से बचने के लिए हर संभव तरीके अपना लिए, लेकिन इसे बचाना मुिश्कल हो गया। यद्यपि जनरल मोटर्स की भारतीय ईकाई ने कहा है कि अमेरिका की घटना का उस पर असर नहीं होगा। अमेरिका में दायर दिवालिएपन के दावों के पक्ष में जो दस्तावेज पेश किए गए हैं उनमें जीएम इंडिया का परिचालन शामिल नहीं है एवं यह इस साल दो नए कार सामने लाने की भी घोशणा कर चुकी है। लेकिन हम जानते हैं कि इसका असर होगा। मातृ संस्था की छवि दिवालिया कंपनी की हो जाए और इसकी प्रशाखाएं बिल्कुल अप्रभावित रहें यह कैसे संभव है। वैसे भी आर्थिक मंदी का राक्षस केवल एक देश तक सीमित नहीं है। किंतु उम्मीद की सबसे बड़ी किरण यही है कि ओबामा प्रशासन जीएम को बचाना चाहती है। जीएम का बंद होना अमेरिका के लिए भी भारी नुकसानदायक होगा एवं इससे उसकी छवि खराब होगी सो अलग। संदेश यह जाएगा कि ओबामा प्रशासन आर्थिक संकट से निपटने में सक्षम साबित नहीं हो रहा है। इसलिए सरकार ने इसे बचाने का निश्चय किया है। दायर याचिका को सरकार का समर्थन हासिल है। उसने मदद की रािश देने के लिए हाथ अवश्य खड़े कर दिए हैं, किंतु वह पुनर्गठन कर इसका सबसे बड़ा हिस्सेदार बन सकती है। यदि वह कंपनी का 60 प्रतिशत हिस्सेदारी अपने पास रखती है तो इससे अतिरिक्त रािश मिल जाएगी एंव इसका पुन: परिचालन संभव हो पाएगा। लेकिन फिर अमेरिका राज्य नियंत्रणों से मुक्त जिस बाजार पूंजीवाद की वकालत करता है उसका क्या होगा?
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