मंगलवार, 1 सितंबर 2009

chinese scholar wishes indian disintegration

भारत के विखंडन की चीनी सोच

चीन के एक लेखक की इस चाहत पर हर भारतीय का क्रोधित होना स्वाभाविक है कि चीन को भारत के 20-30 टुकरे कर देना चाहिए। चायना इंटरनेशनल इंस्टीच्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज के वेब साइट पर झान लू नामक इस लेखक ने लिखा है कि चीन अपने मित्र देशों पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल एवं भूटान की मदद से ऐसा कर सकता है। उनका कहना है कि अगर चीन हल्की कार्रवाई भी करता है तो तथाकथित भारतीय महासंघ को तोड़ा जा सकता है। उनके अनुसार तथाकथित भारतीय राष्ट्र का इतिहास में अिस्तत्व नही मिल सकता क्योंकि यह मुख्य रुप से अपनी एकता के लिए हिन्दू धर्म पर अवलंबित है। उनके ‘ाब्दों में भारत को एक हिन्दू धार्मिक राज्य कहा जा सकता है जो कि जातीय ‘ाोशण पर आधारित है और जो आधुनिकीकरण के रास्ते में आ रहा है। झान लू का मानना है कि जातीय पहचान को ध्यान में रखकर चीन को अपने हित मे और पूरे एशिया की प्रगति के उद्देश्य से विभिन्न राष्ट्रीयताओं असम , तमिल एवं कश्मीर स्थापित करने में समर्थन देना चाहिए। वे उल्फा को समर्थन का भी सुझाव देते हैं ताकि असम भारत से आजादी पा सके। इसी प्रकार चीन बंगलादेश का समर्थन करे ताकि वह भारतीय नियंत्रण से मुक्त होने के लिए बंगालियों को प्रोत्साहित करे एवं एक बंागली राष्ट्र का उदय हो। अगर ऐसा नहीं होता तो भारत के विस्तारवाद के उद्देश्य को रोकने एवं एक संयुक्त दक्षिण एशिया के गठन के रास्ते के खतरे को कमजोर करने के लिए बंगलादेश के एक पड़ोसी के रुप में स्वतंत्र बंगाली राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। झान कहते हैं कि चीन बंगलादेश को प. बंगाल की आजादी को समर्थन देने के लिए प्रोत्साहित करे और अरुणाचल प्रदेश में 90 हजार वर्ग किलोमीटर यानी दक्षिण तिब्बत को मुक्त कराए।जरा सोचिए इस प्रकार की विध्वंसकारी सोच पर किसी देश की सामान्य प्रतिक्रिया क्या हो सकती है! हम यहां इस बहस में नहीं पड़ना चाहते कि यह चीनी सरकार को सलाह देने वाली थिंक टैंक का अधिकृत वेबसाइट है या नहीं। यह इस बात का प्रमाण तो है ही कि वहां के बुद्धिजीवी अभी भी भारत के संदर्भ में कितना जहर पाले हुए हैं। हालांकि वे यह भूल जाते हैं कि आजादी के बाद भारत के टूट जाने संबंधी उतने सिद्धांत सामने नहीं आए हैं जितने चीन के। चीन के बिखरने के सिद्धांत और विचार लगातार सामने आते रहते हैं। 1990 के दशक में तो इसकी भरमार हो गई। चीन के बिखरने की भविश्यवाणी करने वालों मेें चीनी सरकार से असंतुष्ट मि से लेकर अन्य श्रेणी के लोग भी ‘ामिल हैं। ये चीन में क्षेत्रवाद के उदय एवं चीनी इतिहास में विखंडन के तत्वों की पहचान करके यह बताने की कोशिश करते रहे हैं कि चीन का विखंडन नििश्चत है। भले ये 20-30 टुकड़ों की बातें नहीं करें, किंतु इसके कई भागों में विभाजित होने का सिद्धांत तो दिया ही गया है। जापान में केनिची ओहमेइ (ामदपबीप वीउंम) ने लिखा है कि चीन के टूटने के बाद 11 गणराज्य पैदा हो सकते हैं जो एक ढीलाढाला संघीय गणराज्य कायम कर लेंगे। 1993 मेें दो विद्वानों ने यूगोस्लाविया से तुलना करते हुए चीन के संभावित टूट के प्रति आगाह किया। उसने केन्द्रीय सरकार के वित्तीय केन्दीकरण की नीति को यूगोस्लाविया के समान मानते हुए कहा कि इससे देश को एक रख पाना संभव नहीं होगा और जिस तरह यूगोस्लाविया खंड-खंड हो रह है वैसे ही चीन भी विभाजित हो जाएगा। सोवियत संघ एवं पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्ट ‘ाासन के ध्वंस के काल में अमेरिका के रक्षा विभाग ने चीन के भविश्य के आकलन के लिए एक 13 सदस्यीय पैनल का गठन किया, जिसमें बहुमत ने चीन के के विखर जाने की बात की। 1995 मेंं प्रो. जैक गोल्डस्टोन ने एक आलोख लिखा,` द कमिंग चायनीज कोलैप्स´। फॉरेन अफेयर्स मेंं प्रकाशित इस आलेख में उन्होंने कहा कि अगले 10 से 15 सालों में चीन के ‘ाासक वर्ग के सामने बड़ा संकट पैदा होगा। उनके अनुसार चीन में प्रत्येक संकेत एक संकट की ओर बढ़ रहे देश का मिल रहा है। आबादी मेें बुर्जुआओं की बढ़ती तादाद, भारी संख्या मेंं लोगों का प्रवर्जन, कर्मचारियों एवं किसानों का असंतोश एवं नेतृत्व के बीच मतभेद का संकट तथा वित्तीय कमजोरियों के कारण नेतृत्व की प्रभावकारी ‘ाासन करने की क्षमता में तेजी से हृास आदि का उन्होंने उल्लेख किया। गोर्डन चांग ने अपनी पुस्तक कमिंग कोलैप्स ऑफ चायना में कहा है कि चीन की आर्थिक संस्थाओं की कमजोरियों का विस्तृत विश्लेशण करते हुए कहा है कि विश्व व्यापार संगठन में उसका प्रवेश उसके ध्वंस का कारण बन जाएगा। ऐसे और भी उदाहरण सामने लाए जा सकते हैं। इसके पक्ष एवं विपक्ष में मत हो सकते हैं, किंतु कम से कम भारत के बारे में तो ऐसी भविश्यवाणियां नहंीं की गईं हैं। हालांकि 1962 में चीन से धोखा खाने तथा अरुणाचल पर उसके लगातार उदण्ड दाावे के बावजूद भारत का कोई नागरिक उसके विखंडित होने की कामना नहीं करता है। किंतु जब 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और उसके प्रभावस्वरुप दूसरे कम्युनिस्ट राज्य विखरने लगे तो सबकी नजर सबसे बड़े कम्युनिस्ट राज्य की चीन की ओर ही गया। यह प्रश्न उठाया जाने लगा था कि क्या इसके बाद चीन का ही नंबर आयेगा वैसे ताइवान पहले ही उसके नियंत्रण से मुक्त हो चुका है और उसके समर्थकों को चीनी नेता विखंडनवादी (िस्प्लटिस्ट) कहते हैं। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को चीनी भूभाग के विरुद्ध शडयंत्रकारी मानते हैं। पिछले वशZ मार्च में जब तिब्बतियों ने चीनी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध किया तो वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने दलाई लामा को एक ऐसा राक्षस बताया जिसका हृदय जंगली जानवर का है। शिंगकियांग के उइगुरों के विद्रोह को विदेशी ‘ाक्तियों का दुश्टतापूर्ण शडयंत्र कहा गया।चीनी नेतृत्व अपनी सबसे बड़ी अंत:शक्ति 82 प्रतिशत हान चीनियों को मानते हैं। यही जातीय कारक उसे पूर्व सोवियत संघ से भिन्न बनाता है जिसमें 50 प्रतिशत से ज्यादा रुसी नस्ल के लोग नहीं थे। 1 अरब 30 करोड़ की आबादी वाले देश मेें तिब्बत की करीब 30 लाख तथा शिंगकियांग की दो करोड़ आबादी बहुत महत्चपूर्ण नहीं लगती है। किंतु दोनोें का क्षेत्रफल चीन के पूरे भूभाग का करीब एक तिहाई है। तेल और गैस का प्रचुर भंडार यहीं है। यह भय चीन के अंदर हमेशा बना हुआ है कि कहीं शिंगकियांग के मुसलमान मध्य एशिया के साथ न मिल जाएं। रुस साइबेरिया को लेकर इसी प्रकार की आशंका से हमेशा ग्रस्त रहता है। हमने जुलाई में दंगों से झुलसते शिंगकियांग को देखा। 1989 के थ्यान मान स्क्वायर घटना के बाद पहली बार वहां भारी संख्या में लोगों की मौतें हुईं। चीनी नेतृत्व उइगुर विद्रोहियों को कृतघ्न मान सकते हैं। आखिर वहां की चमचमाती सड़कें, बाजारें, शिक्षालय, फैक्टिªयां आदि इन्हीं की देन हैं। यह उसी प्रकार की प्रतिक्रिया है जैसा एक समय पूर्वी तिमोर को लेकर इंडोनेशिया की होती थी। चीन दावा करता है कि तिब्बत एवं शिंगकियांग दोनों सदियों से उसके भाग रहे हैं। किंतु हम जानते हैं कि 20 वी सदी में ही शिंगकियांग में एक पूर्वी तुकीZस्तान गणराज्य का अस्तित्व था, जो कि 1949 में चीनी जन मुक्ति सेना (चायनिज पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) के दबाव में समाप्त हो गया। स्वतंत्र तिब्बत का इतिहास तो काफी पुराना है। किंतु 1912 से 1949 के बीच एक आजाद देश के रुप में तिब्बत के अस्तित्व से तो कोई इन्कार नहीं कर सकता। 1959 में तिब्बतियों के विद्रोह को कौन भूल सकता है। इस समय सामान्यत: यह माना जा रहा है कि तिब्बत या शिंगकियांग के विद्रोहियो की सफल्ता संभव नही। दलाई लामा तो आजादी की मांग भी अब नहीं कर रहे हैं, किंतु आजादी के समर्थकों की संख्या चाहे जितनी हो, चीन चाहे जितनी निश्ठुरता से भूभागीय अखंडता के विरुद्ध आवाज उठाने वालोें को कुचलने की स्थिति में हो, यह लौ बुझ नहीं सकती। आखिर बािल्टक गणराज्यों के मुट्ठी भर लोग ही तो सोवियत काल में देश से बाहर अलगावाद की आवाज उठाते थे। उन्हें एक खोए हुए सपने का पुरोधा मान जाता था, किंतु एक दिन वही सपना साकार हुआ। चीनियों को इससे सबक लेना चाहिए। एक नस्ल या जाति का बहुमत किसी देश की एकता का स्थायी आधार नहीं हो सकता। राज्य की निरंकुश सत्ता के प्रति असंतोश समान नस्ल एवं जातीयों में भी होता है और वे अपनी ही जाति और नस्ल की सत्ता के खिलाफ विद्रोह करते हैं। इसके उदहारण पूरी दुनिया में मौजूद हैं। चीन के ‘ाासन के खिलाफ पूरा पिश्चमी जगत है। वे तो चाहते हैं कि भारत चीन के खिलाफ खड़ा हो। अगर भारत उनके साथ खड़ा हो गया और तिब्बतियों से लेकर अन्य विक्षुब्धों को अलगावादी संघशोZं के लिए उसी तरह मदद करने लगा जैसा इस लेख में झाउ ने चीन सरकार को सुझाया है तो चीन के न जाने कितने टुकड़े हो जाएंगे। इसलिए चीनियों को भारत की ओर उंगली उठाने की जगह अपने बारे में विचार करना चाहिए।