अब विप्रो प्रतिबंधित
सत्यम् के बाद देश की तीसरी बड़ी सॉटवेयर कंपनी विप्रो के साथ तीन अन्य कंपनियों मेगासॉट कंसलटेंट्स, नेक्टर फर्मास्यूटिकल्स, गैप इंटरनेशनल एवं एक व्यक्ति को विश्व बैंक द्वारा प्रतिबंधित करने पर भारतीय उद्योग जगत में खलबलाहट देखी जा रही है। कुछ लोगों ने विश्व बैंक को ही निशाने पर ले लिया है। अपने कर्मचारियों को कंपनी के शेयर खरीदने का विकल्प देकर भारत मेेंं नई कॉरपोरेट संस्कृति की अग्रदूत बनी विप्रो की छवि एक पारदशीZ एवं कार्यकुशल कंपनी की है। विश्व बैंक के कर्मचारियों को अनुचित लाभ देने के आरोप से निश्चय ही विप्रो की छवि पर बट्टा लगा है। सत्यम पर भी यह आरोप था। उद्योग संगठनों द्वारा आगे आकर दुनिया भर में भारतीय कंपनियों की बिगड़ती छवि को बचाने की कोिशश स्वाभाविक है। संभव है विश्व बैंक के इस कदम के पीछे भारतीय एवं अंतरराश्ट्रीय कॉरपोरट घरानों की प्रतिस्पर्धा हो, या फिर स्वयं विश्व बैंक की अुदरुनी लड़ाई का भी यह परिणाम हो। विप्रो ने अपने बयान मेंं इसे महत्व न देते हुए कहा है कि विश्व बैंक के साथ उसका कारोबार इतना छोटा है कि इससे कोई अंतर नहीं आएगा। मेगासॉट ने भी 2004 से विश्व बैंक के साथ कोई कारोबार न होने का बयान दिया है। ये बातें अपनी जगह ठीक हैं। किंतु हम जानते हैं कि व्यापार की दुनिया में विश्व बैंक का क्लाइंट होने मात्र से कंपनी के प्रोफाइल की कद बढ़ जाती है। यह नहीं भूलना चाहिए कि विप्रो पर प्रतिबंध जून 2007 में लगाया गया जिसकी जानकारी कंपनी छिपाए रखी। क्यों? एक कर्मचारी को 72 हजार डॉलर के 1750 शेयर कंपनी के मिले यह सत्य है। यह बात अलग है कि विप्रो इसे कंपनी नियमों के अनुरुप बता रही है। यह नजरिए का अंतर है। आश्चर्य की बात है कि भारत में आम भ्रश्टाचार की बात स्वीकारने वाले भी विश्व बैंक के कदम पर आंखे तरेड़ते हुए विप्रो सहित भारतीय कंपनियों को सत्यनिश्ठ एवं ईमानदार साबित करने पर तुले हैं। कौन सी कंपनी है जो अपना काम निकालने के लिए घूस नहीं देती है। भारत में नीचे से ऊपर तक हर कंपनियों के हर काम के लिए घूस की रकम तय है। क्या यह संभव है कि हमारी जो कंपनियां अपने देश में अनुचित लाभ पहुंचाकर अपना काम निकलवाती हैं वो विदेशों मेंं ऐसा करने से परहेज करती होंगी। कॉरपोरेट के साथ जो ऊपरी चमक-दमक दिखती है उसके अंदर उतना ही कालिख है। इसमें हमें-आपको पड़ने की आवश्यकता नहीं है। हम यह भूल रहे हैं कि विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष पॉल वोल्फोवित्ज को वित्तीय अनियमितता के कारण पद से हटना पड़ा, भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद व्यापक जांच पड़ताल हुई जिनमें ऐसी अनेक अनियमितताएं सामने आईं। यह कहना भी गलत है कि केवल भारत की कंपनियां ही प्रतिबंधित हो रही हैं। अमेरिका,ब्रिटेन, रुस, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, इंडोनेिशया की कंपनियां भी विश्व प्रतिबंध के दायरे में आईं हैं।
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