बुधवार, 28 जनवरी 2009

Former President Venkataraman dead

वेंकटरमन के रुप में एक विरासत का अंत
पूर्व राश्ट्रपति आर. वेंकटमरन का 98 वें वशZ में निधन वैसे तो स्वाभाविक घटना है, लेकिन उनके साथ भारतीय आजादी के आंदोलन से लेकर संविधान निर्माण में सक्रिय एक ऐसी विरासत का अंत हुआ है जिसने एक आदशZ भारतीय राश्ट्र-राज्य की कल्पना के साथ राजनीति में कदम रखा। भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में यह ऐसी विरासत है जो एक-एक कर समाप्त होती जा रही है। ढूंढने से भी अब ऐसे व्यक्तित्व का मिलना कठिन है। किंतु सोचने वाली बात है कि जुलाई 1992 में राश्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद देश में उनकी क्या उपयोगिता थी! आखिर संविधान सभा के कितने सदस्य इस समय देश में जीवित बचे हैं? एक व्यक्ति जो उस पीढ़ी से निकलकर प्रदेश एवं देश की स्वातंत्र्योत्तर राजनीति में सक्रिय रहा, जो योजना आयोग के उपाध्यक्ष, वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री एवं उप राश्ट्रपति पद को सुशोभित करते हुए राश्ट्रपति पद तक पहुंचा हो उसकी तो देश को ज्यादा जरुरत होनी चाहिए थी। राश्ट्रपति की जिम्मेवारी से मुक्त होने के बाद सत्ता या दलीय राजनीति में सक्रिमया यथेश्ट नहीं हो सकती लेकिन राजनीति ऐसे व्यक्ति के अनुभवों और दृिश्टकोणों का लाभ न ले पाए इससे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है? खासकर देश पिछले डेढ़ दशकों से ज्यादा समय से जिन संवैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामजिक और सभ्यतागत प्रश्नों का सामना कर रहा है उसमें वेंकटरमन जैसे व्यक्तित्व से मार्ग दशZन पाने की कहीं ज्यादा जरुरत थी। किंतु हमारे राजनीति के कर्णधारों के पास इसकी फुरसत कहां कि उनसे मार्गदशZन पाने की कोिशश करे। ये तो स्वयं ही सर्वज्ञ हैं। वेंकटरमन ऐसे समय राश्ट्रपति बने जब तत्कालीन राश्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह एवं प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच मनभेद सार्वजनिक हो चुका था। कई प्रकार की अफवाहें सत्ता के गलियारों में प्रतिदिन उड़तीं रहतीं थी। वेंकटरमन के आने के साथ ही अफवाहें बंद हुईं और प्रधानमंत्री कार्यालय एवं राश्ट्रपति भवन के बीच परंपरागत संतुलन कायम हुआ। उनके राश्ट्रपति बनने के साथ ही एक दल के बहुमत का दौर समाप्त होने लगा था। उन्हें चार प्रधानमंत्रियों को शपथ दिलवानी पड़ी लेकिन वे विवादों में नहीं फंसे। 1989 के चुनाव में कांग्रेस को बहुमत न होते हुए भी उन्होंने राजीव गांधी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जो सबसे बड़े दल के नेता को पहले बुलाने की परंपरा का निर्वाह था। उनके इन्कार करने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह को शपथ दिलवाई। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने देश की दशा एवं राजनीतिक विखंडन को देखते हुए राश्ट्रीय सरकार बनाने की अपील की। आज पूरा देश यह महसूस कर रहा है कि अगर कोई राश्ट्रीय सरकार बन जाए तो मुंह बाए चुनौतियों से आसानी से निपटा जा सकेगा। बाद में उन्होंने संविधान की समीक्षा कर इसे समयानुसार नया स्वरुप देने की भी वकालत की। एक संविधान सभा के सदस्य द्वारा संविधान की समीक्षा एवं उसमें बदलाव की मांग को जितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए न लेना कतई उचित नहीं था।

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