शनिवार, 4 अप्रैल 2009

lok sabha election UPA divided in Tamilnadu

तमिलनाडु में यूपीए बिखराव राष्ट्रीय निहितार्थ बहुत बड़ा है
संप्रग वाकई बिखर गया है। चुनाव की घोषणा के बाद ऐसा लग रहा था कि संप्रग एकजुट होकर मैदान में उतरेगा। लेकिन पहले उत्तर प्रदेश में सपा कांग्रेस के बीच सीटों पर तालमेल न हो सका, उसके बाद बिहार का नंबर आया, फिर झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ लंबी बातचीत के बाद बना-बनाया गठजोड़ दरक गया और अब तमिलनाडु में पीएमके छिटक गया। इनमें पीएमके का बिखरना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि यह अब संप्रग से बाहर चला गया है। शेश पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ते हुए भी स्वयं को कांग्रेस नेतृत्व वाले संप्रग का घटक कह रही है। ये न कांग्रेस की आलोचना कर रहे हैं और न प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की। इस समय की परिस्थितियों में ऐसा लगता भी है कि ये चुनाव के बाद संप्रग में ही बने रहेंगे। हां, यदि चुनाव परिणाम कंाग्रेस के लिए प्रतिकूल रहा तो ये क्या करेंगे कहना कठिन है। किंतु इस समय ये केवल चुनाव अलग लड़ रहे हैं, कांग्रेस या संप्रग से इनका स्थायी विलगाव नहीं हुआ है। इसके समानांतर पीएमके का अन्नाद्रमुक के साथ जाना राश्ट्रीय स्तर पर संप्रग के लिए बहुत बड़ी क्षति है। जयललिता यद्यपि अभी तक स्वयं तीसरे मोर्चे के सम्मेलन में नहीं गईं, लेकिन उन्होंने अपने प्रतिनिधि को भेजकर भावी राजनीतिक दिशा का संकेत दे दिया। हालांकि एक समय उन्होंने कांग्रेस के नेताओं से अपने रिश्ते की बात कहते हुए उसे द्रमुक से अलग होने का भी सुझाव दिया, किंतु कांग्रेस ने द्रमुक के साथ दृढ़ता से बने रहने का बयान दे दिया। वस्तुत: जयललिता इस समय कांग्रेस विरोधी खेमे की अंग हैं यह मानने में कोई संकोच नहीं है।वैसे पीएमके का तमिलनाडु के अन्नाद्रमुक गठजोड़ में जाना बिल्कुल तय था। पिछले साल ही पीएमके प्रदेश मेे द्रमुक नेतृत्व वाले गठजोड़ से अलग हो चुकी थी। हां, केन्द्र सरकार में वह बनी हुई थी। स्वयं करुणानिधि ने भी कह दिया था कि अगर वह केन्द्र सरकार में बनी रहती है तो इससे उन्हें कोई समस्या नहीं है। केन्द्र की मजबूरी थी कि पांच लोकसभा सदस्यों वाले पीएमके को वह अलग नहीं कर सकती थी। खासकर वामदलोें द्वारा समर्थन वापसी के बाद जहां एक-एक सांसद का महत्व बढ़ गया था उसके लिए किसी प्रकार का जोखिम उठाना संभव ही नहीं था। इस प्रकार पीएमके के अंबुमणि रामदोस को मंत्री बनाए रखना उसकी मजबूरी थी। कहा जा सकता है कि पीएमके को भी केवल चुनाव की प्रतीक्षा थी एवं अन्नाद्रमुक की जयललिता द्वारा लोकसभा चुनाव में सात स्थान एवं एक राज्य सभा सीट के साथ समझौता हो गया। अन्नाद्रमुक और पीएमके का साथ आना दोनों के लिए लाभकारी है। अन्नाद्रमुक अगर तमिलनाडु के दक्षिण में मजबूत है तो पीएमके का उत्तर एवं मध्य में जनाधार है। वनियार समुदाय का इसका आधार ऐसा है जिसका लाभ अन्नाद्रमुक को मिल सकता है। इस परिवर्तन के बाद तमिलनाडु में अब संप्रग के रुप में केवल द्रमुक एवं कांग्रेस है। तमिलनाडु में 2004 को लोकसभा चुनाव पूरी तरह द्रमुक नेतृत्व वाले संप्रग के पक्ष में गया था। उसने सभी 39 स्थानों पर कब्जा कर लिया था। अन्नाद्रमुक की बुरी पराजय हुई एवं उसे एक भी स्थान नहीं मिला था। तब द्रमुक नेतृत्व वाले संप्रग में कांग्रेस, एमडीएमके, पीएमके, भाकपा एवं माकपा शामिल थी। यह अन्नाद्रमुक के खिलाफ एक व्यापक गठजोड़ था। द्रमुक ने 24.60 प्रतिशत एवं 16 स्थान, कांग्रेस ने 14.40 प्रतिशत मत एवं 10 स्थान, पीएमके ने 6.71 प्रतिशत मत एवं पंाच स्थान, एमडीएमके ने 5.85 प्रतिशत मत एवं चार स्थान, भाकपा ने 2.97 प्रतिशत मत एवं दो स्थान तथा माकपा ने 2.87 प्रतिशत मत एवं दो स्थान पाए थे। यानी इस गठजोड़ ने कुल 57.40 प्रतिशत मत प्राप्त किया। साफ है कि इनकी एकता के कारण इनके मताधार का भी धु्रवीकरण हुआ था। ऐसे ध्रुवीकरण के बाद अन्नाद्रमुक-भाजपा का सूपड़ा साफ होना ही था। अन्नाद्रमुक को केवल 29.77 प्रतिशत मत मिल तो भाजपा ने 5.07 प्रतिशत मत पाए। यानी कुल 34.84 प्रतिशत। इस प्रकार द्रमुक गठजोड़ 22.56 प्रतिशत के भारी अंतर से आगे था। लेकिन विधानसभ चुनाव में स्थिति काफी बदली। द्रमुक नेतृत्व वाले गठजोड़ को 234 में से 163 स्थान मिला तो जयललिता के नेतृत्व वाले गठजोड़ ने भी 61 स्थानों पर जीत दर्ज करा ली। एमडीएमके उस समय द्रमुक गठजोड़ में नहीं, बल्कि अन्नाद्रमुक के साथ था। इसने छ: तथा दलित पैंथर्स ने दो स्थान जीते। 234 सीटों वाले विधानसभा में द्रमुक को केवल 96 स्थान मिले जो कि बहुमत से 22 कम हैं। यानी लोकसभा चुनाव का माहौल बदल चुका था एवं दोनोेंं समूहों के बीच संघशZ काफी निकट का था। मतों की गणना यह बताती है कि विधानसभा चुनाव में केवल 4.75 प्रतिशत मतों के अंतर ने समीकरण बदला। द्रमुक गठजोड़ को 44.58 प्रतिशत तथा अन्नाद्रमुक गठजोड़ को 39.83 प्रतिशत मत आए। कहां 22.56 प्रतिशत और कहां 4.75 प्रतिशत। जाहिर है, पीएमके के निकलने के बाद मतों के मामले यह गठजोड़ आगे निकल चुका है।वास्तव में तमिलनाडु का राजनीतिक परिदृश्य काफी रोचक हो गया है। एमडीएमके किसी गठजोड़ में शामिल नहीं है। एमडीएमके, पीएमके, माकपा एवं भाकपा का लोकसभा चुनाव अनुसार कुल 18.40 प्रतिशत मत घट जाने तथा इसमें पीएमके का मत अन्नाद्रमुक के साथ जुड़ जाने से इसका पलड़ा भारी लगता है। विधानसभा चुनाव में प्राप्त मतों को आधार बनाकर अन्नाद्रमुक मेें पीएमके का मत जोड़ दें तो यह 46.56 प्रतिशत हो जाता है जो कि द्रमुक गठजोड़ से 7.56 प्रतिशत ज्यादा है। इसका असर पड़ना तय है। अभिनेता विजयकांत की पार्टी देसिया मुर्पोक्कु द्रविदर कजगम यानी डीएमडीके भी चुनाव मैदान मेें है। उसने विधानसभा चुनाव में पहली बार अपनी ताकत का परीक्षण किया एवं उसे 8.33 प्रतिशत मत मिला। अगर विजयकांत जयललिता वाले गठजोड़ में शामिल हो जाते तो विधानसभा चुनाव का परिणाम बदल जाता। इसकी बढ़त हो जाती। हालांकि विजयकांत की पार्टी पुन: सबसे अलग है। लोकसभा चुनाव में इसके प्रति जनता का रुख क्या होगा कहना कठिन है, किंतु विजयकांत भी शासन के खिलाफ असंतोश को ज्यादा हवा देने की कोिशश कर रहे हैं। केन्द्र एवं प्रदेश दोनों सरकारों के सत्ता विरोधी रुझान भी चुनाव में अपनी भूमिका निभाएंगे। एमडीएमके अपने प्रभावक्षेत्र में वैसे दोनों का मत काटेगा लेकिन इसमें द्रमुक का हिस्सा ज्यादा होगा। उसके नेता वाइको श्रीलंका सरकार के खिलाफ एवं लिट्टे के पक्ष मेंं जो अभियान चला रहे हैं वह केन्द्र एवं प्रदेश सरकार के भी विरुद्ध है। जाहिर है, इनकी ओर जो मत आएगा उसमें इनका बड़ा भाग शामिल होगा। पीएमके यदि द्रमुक के साथ रहती तो शायद ये कारक कुछ हद तक संतुलित होते। किंतु उसका अन्नाद्रमुक के साथ जाना संतुलन को भी मोड़ने वाला साबित हो सकता है। तमिलनाडु में संप्रग यदि चुनावी अंकगणित में फिसली, जिसकी संभावना बढ़ गई है तो इससे संसद में संप्रग का अंकगणित बुरी तरह गड़बड़ा जाएगा।

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