जजिया का फरमान आधुनिक सभ्यता का अंत करने की सोच से पैदा हुई है
यह हिन्दुस्तान के लिए उठ खड़े होने का समय है
यह हिन्दुस्तान के लिए उठ खड़े होने का समय है
ओराकजाई पाकिस्तान के पिश्चमोत्तर इलाके के उन सात स्वायत्त क्षेत्रों में ‘ाामिल है जिसे मिलाकर फाटा यानी फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया या संघ प्रशासित कबिलाई क्षेत्र बना है। सरदार कल्याण सिंह के पूर्वज ओराकजाई के फीरोजखेल की विहंगम घाटी मेें न जाने कब बस गए। विभाजन के बाद भी उन लोगों ने उस क्षेत्र को छोड़ा नहीं। पाकिस्तान के बारे में आम सोच चाहे जो हो, कल्याण सिंह जैसे दूसरे सिख परिवारों को पिछले छ: दशकों में कभी मजहबी आधार पर भेदभाव नहीं झेेलना पड़ा। उस क्षेत्र के पख्तूनों ने उनके सहित दूसरे सिखों का पूरा ख्याल रखा। लेकिन 45 वशZ की आयु में उनके लिए सब कुछ बदल गया है। तहरीक-ए-तालिबान के प्रमुख बैतुल्ला मेहसूद के सहयोगी हकीमुल्ला मेहसूद ने यहां इस्लामी राज्य की घोशणा कर दी एवं उनके आतंक से सिख परिवारों को पेशावर भागना पड़ा। कल्याण सिंह ने फिर भी अपने पूर्वजों का घर नहीं छोड़ा। उन्हें विश्वास था कि ओराकजाई कबिलाओं के साथ वे पूर्णतया सुरक्षित हैं। किंतु एक दिन हकीमुल्ला स्वयं अपने लड़ाकों के साथ वहां उपस्थित हुआ एवं सिख समुदाय के सदस्यों को एकत्रित होने का आदेश दिया। उन्हें हुक्म सुनाया गया कि तुम सब गैर इस्लाम मजहब के हो, इसलिए या तो तुम जजिया कर दो या फिर इस्लाम कबूल करो। जजिया की रािश दस करोड़ बताई गई। कल्याण सिंह को तालिबान उठाकर ले गए, उन्हें दस दिनों तक कब्जे में रखा, यातनाएं दीं। बीच-बचाव एवं मिन्नत के बाद इन लोगों ने जजिया की रािश घटाकर 4 करोड़ एवं फिर डेढ़ करोड़ किया। कल्याण सिंह को रािश जुटाने के लिए रिहा किया गया, लेकिन उनके एवं अन्य 50 सिख पुरुश महिलाओं को जमानत के रुप में बंधक बनाकर रखा गया इस धमकी के साथ यदि तुमने भागने की कोिशश की तो इनका कत्ल कर दिया जाएगा या इन्हें मुसलमान बना दिया जाएगा। कल्याण सिंह अभी पेशावर में है और धन जुटाने की कोिशश कर रहे हैं। केवल अराकजाई नहीं, पूरे पिश्चमोत्तर क्षेत्र में जो करीब 10 हजार सिख रहते हैं उनके लिए इतनी बड़ी रािश अदा करना आसान नहीं है। ये मुख्यतया पेशावर में ही बसे हैं। इनमें कुछ तो अफगानिस्तान में मुजाहिद्दीनों एवं तालिबानों के आतंक के राज्य से बचकर यहां पहुंचे और कुछ पहले से ही हैं। ये मुख्यतया कपड़े के व्यापारी हैं या फिर कॉस्मेटिक्स के व्यापार में लगे हैं। ओराकजाई एवं ख्ौबर के सिख स्थानीय कबिलाओं की तरह हशीश का कारोबार करते हैं। हालांकि उलेमाओं की पंचायत यानी जिरगा की अपील के बाद उन परिवारों को रिहा किया गया लेकिन ‘ार्त यही कि ये 1.3 करोड़ जजिया अदा करें।भारत में बैठकर हम निश्चय ही पिश्चमोत्तर पाकिस्तान में सिखों की स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते। किंतु इस विवरण मात्र से जो तस्वीर हमारे-आपके जेहन में उतरती है उससे सिहरन तो पैदा होता ही है। जजिया इस्लामी ‘ाासन में गैर इस्लामी निवासियों जिन्हें इस्लामी कानून में धिम्मी कहा गया है, पर लगाया जाने वाला कर है। मध्यकालीन अरब एवं भारत के इतिहास में जजिया एक आतंकित करने वाला शब्द था। हालांकि हाल के वशोZं में कुछ विद्वानों ने जजिया की एक सामान्य कर के रुप में भी व्याख्या की है एवं यह बताने का प्रयास किया है कि इस्लाम के अनुसार जकात भी एक कर है जो कि मुसलमानों को देना पड़ता है। इसलिए गैर मुसलमानों पर यदि जजिया लगाया गया तो यह कतई अन्यायपूर्ण नहीं था। ऐसी दलीलों से सहमति कठिन है। ए.एस. ट्रिट्टन, मैिक्सम रौडिन्सन, बाट ये... जैसे विख्यात पिश्चमी इतिहासकारों ने यह बताया है कि आरंभिक इस्लामी साम्राज्यों मिस्र, सीरिया ... में इस्लाम धर्मावलंबी राज्य के खजाने में कुछ देते ही नहीं थे, क्योंकि उसमें विजीत धिम्मी ईसाइयों की भारी आबादी थी, जिनसे वसूले गए जजिया से पूरा खर्च चलता था। रॉडिन्सन ने तो मोहम्म्द साहब की जीवनी में यह लिखा है कि कई बार इस्लाम में धर्मांतरण इसलिए निशिद्ध किया गया है, क्योंकि इससे कर का आधार कमजोर होता है। वास्तव में जजिया की जकात से कोई तुलना नहीं थी। मध्यकाल में करों पर काम करने वालों ने इसके काफी विवरण दिए हैं। बेन शेमेश की टैक्सेशन इन इस्लाम, जा फर की किताब अल-खराज के अलावा के.एस. लाल की थ्योरी एंड प्रैिक्टस ऑफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया आदि से हमें इनकी पूरी जानकारी मिल जाती है। इसके अनुसार जकात अनिवार्य नहीं था, उसकी दर कम थी, भारत में संपत्ति पर ढाई प्रतिशत तक था, इसमें दाता को स्वयं अपनी संपत्ति या आय के बारे में बताना था और उसे स्वीकार किया जाता था। जकात कई बार केवल सीमा शुल्क के रुप में लिया जाता था। इसके विपरीत जजिया मनमाने ढंग से और जबरन वसूला जाता था। इसके साथ अपमान और उत्पीड़न जुड़ा था। मध्यकालीन शासकों ने न जाने कितने दूसरे मजहब के लोगों को जजिया न देनेे के कारण इस्लाम कबूलने को विवश किया। जाहिर है, जब तालिबान ने अफगानिस्तान के शासन पर कब्जा किया तो वहां इस्लामी कानून के नाम पर यही किया और स्वात में पाकिस्तान सरकार द्वारा शरीया कानून लागू करने को मान्यता देने के बाद इन्होंने यही करने की कोिशश की। जजिया न देने पर हकीमुल्ला मेहसूद के आदेश में कई घरों एवं दूकानों को ध्वस्त कर दिया गया। भारत द्वारा सिखों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करने के बाद पाकिस्तान का बयान है कि सिख उनके नागरिक हैं जिनकी रक्षा उसकी जिम्मेवारी है एवं भारत उसकी चिंता न करे। अगर पाकिस्तान वाकई रक्षा करने के काबिल होता तो उनकी ऐसी दुर्दशा ही नहीं होती कि उन्हें गुरुद्वारों में शरण लेनी पड़ती। क्या पाकिस्तान सरकार ने जब कट्टरपंथियों के साथ समझौता कर शरीया कानून लागू करने की बात मानी तब उसे इस बात का इल्म नहीं था कि वहां गैर इस्लामी लोगों के साथ ये पागल मुजरिमाना बर्ताव कर सकते हैं? जाहिर है, असली दोश तो पाकिस्तान की सरकार का है, जिसने आतंकवादियों के सामने घुटने टेके। अब स्वात क्षेत्र में हालांकि सेना आतंकवादियों के साथ युद्ध कर रही है और यह सही दिशा है। एक राज्य के भीतर दो कानून कैसे चल सकता है? किंतु उन्हें यहां तक पहुंचना ही एक राज्य के रुप में पाकिस्तान की विफलता है। हम जानते हैं कि कट्टरपन्न, आतंकवाद आदि के प्रति पाकिस्तानी सत्ता प्रतिश्ठान का नजरिया दुविधापूर्ण रहा है। इस्लाम के नाम पर भारत से टूटकर अलग हुआ यह मुल्क वास्तव में इसी कारण अपना कोई नििश्चत स्वरुप बना ही नहीं पाया। आधुनिक राज्य व्यवस्था का कोई दूसरा मुल्क मजहबी कानून की कतई इजाजत नहीं देता। इन्होंने केवल सिखों पर अत्याचार नहीं किया, स्वयं मुसलमानों में पढ़े-खिले आधुनिक सोच वाले भी इनका क्रूर िशकार हुए हैं। लड़कियों के विद्यालयों को ध्वस्त करना, लड़कियों के विद्यालय जाने पर निशेध, महिलाओं के अकेले बाहर निकलने की मनाही... और इसका उल्लंघन करने पर कठोर सजा। सजा के जो वाकये हमारे सामने आए हैं वे दिल दहलाने वाले हैं। इनकी तो घोशणा है कि पिश्चम के लोकतंत्र अपनाने के कारण पाकिस्तान नामक देश ही गैर इस्लामी हो चुका है जिसे पूर्ण इस्लामिक बनाना है। पाकिस्तान के नेताओं ने गैर इस्लामी कृत्य किया है। इस प्रकार ये केवल गैर इस्लामी समुदायों के ही नहीं, पूरी मानवी सभ्यता के दुश्मन हैं। जजिया का फरमान इस सभ्यता को नश्ट करने की उनकी सोच का ही अंग है। ओराकजाई कबिले के लोग जो स्वयं मुसलामान हैं, ने इनका विरोध किया। एक जिरगा में इनके विरोध की रणनीति पर बैठक बुलाई गई और तालिबानों न उसे ही उड़ा दिया जिसमें 160 से ज्यादा लोग मारे गए। उसके बाद ये भयवश खामोश हो गए। इसी प्रकार फीरोजखेल के बगल में कलाया है जहां के िशया तालिबान से लड़ रहे हैं। तालिबानों ने सबसे ज्यादा निशाना तो मुसलमानों को ही बनाया है। इस समय स्वात से घरबार छोड़कर कई लाख मुलसमान अपने ही देश में ‘ारणार्थी बन चुके हैं। कल्पना करिए, अगर इनका विस्तार हो गया तो ये किस प्रकार कोहराम मचाएंगे। इस प्रकार यह लड़ाई पूरी दुनिया की है। हिन्दुस्तान इससे सीधा प्रभावित है, इसलिए इसे इसके खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए।
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