14 वीं लोकसभा का उत्तराधिकार
मंत्रिमंडल की अंतिम बैठक के बाद प्रधानमंत्री द्वारा इस्तीफा सौंपने एवं लोकसभा भंग करने की सिफारिश के साथ 14 वीं लोकसभा एवं संप्रग सरकार का औपचारिक अंत हो गया। दूसरी ओर चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव में विजेताओं की सूची सौंपने के साथ 15 वीं लोकसभा के गठन की प्रक्रिया भी आरंभ हो गई। 14 वीं लोकसभा की नींव पर खड़ी हो रही नई लोकसभा उसके प्रभावों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती। इस लोकसभा के राजनीतिक समीकरणों का जनता के मनोविज्ञान पर यकीनन प्रभाव पड़ा और उसकी परिणति हमने एक स्थिर सरकार के जनादेश के रुप में देखा है। 14 वीं लोकसभा पहली लोकसभा थी जिसमें कोई कम्युनिस्ट अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचा और अंतिम अवधि में उसे पार्टी का आदेश न मानने पर निश्काशित किया गया। अध्यक्ष और विपक्ष के बीच सीधा टकराव का वाकया भी इसी लोकसभा ने देखा। इसके पहले कभी अध्यक्ष के रवैये से नाराज होकर विपक्ष ने बहिर्गमन नहीं किया था। 11 सांसदों को उनके कार्यकाल में बखाZस्त करके भी इस लोकसभा ने अभूतपूर्व कदम उठाया। सांसदों की खरीद-फरोख्त के आरोप के साथ रुपए के बंडल सदन के पटल पर लहराने का कारनामा भी इसी लोकसभा में हुआ। ये ऐसे वाकये हैं जिनकी पुनरावृत्ति कोई नहीं चाहेगा। हमारी उम्मीद भी है और दुआ भी कि 15 वीं लोकसभा ऐसे शर्मनाक वाकयों से मुक्त होकर लोकतंत्र के पवित्र मंदिर की छवि पुनस्थाZपित करने में सफल हो। देश का एक-एक नागरिक यही चाहेगा कि 14 वीं लोकसभा की तरह कार्यवाही के निर्धारित समय में से 423 घंटे हंगामें एवं बहिर्गमन की भेंट न चढ़े। इस संसद ने अपनी निर्धारित बैठकों में से करीब एक चौथाई यानी 24 प्रतिशत समय व्यर्थ गंवा दिया। हमारे राजनेता यदि देश में अपने रवैये के खिलाफ बढ़ रही जुगुप्सा को समझेंगे तो यकीनन उनका रवैया बदला होगा। 15 वीं लोकसभा इस मायने में अपने पूर्वज से भिन्न होगी कि इसमें बहुमत के लिए सरकार को बाहर से किसी के समर्थन की अपरिहार्यता नहीं है। साथ ही सरकार को बनाए रखने के लिए बहुत ज्यादा दलों को मंत्रिमंडल का अंग बनाने की भी आवश्यकता नहीं। ऐसे मेें सरकार बचाने की विवशता में किसी अवांछित कदम की संभावना यूं भी नहीं है। पूर्व की तुलना में सदन का संचालन ज्यादा आसान होगा। विपक्ष को भी पराजय के आघात से सीख मिली होगी। ऐसे कई सांसद इस लोकसभा में नहीं होंगे जो कि हंगामों के लिए जाने जाते थे। लेकिन संसदीय मर्यादा का पालन करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चन्द्रशेखर तथा विरोध को भी मर्यादित शब्द देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी इस लोकसभा में नहीं होंगे। युवा एवं नए चेहरों की काफी संख्या वाली इस लोकसभा में हमें उम्मीद है कि सांसदों का व्यवहार बदला होगा और हमें उत्कृश्ट संसदीय कार्यव्यवहार देखने को मिलेगा।
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