सोमवार, 25 मई 2009

टीम मनमोहन

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ शपथ लेने वाली 19 सदस्यीय मंत्रिमंडल को बहुत हद तक जाने-पहचाने, अनुभवी, कसौटी पर खरे उतरे और राजनीतिक दृिश्ट से परिपक्व लोगों का समूह कहा जा सकता है। इसलिए मंत्रिमंडल की औसत उम्र 67 वशZ हो गई है। जिन विभागों की घोशणाएं हो गईं हैं उनमें भी अनुभव एवं योग्यता ही पैमाना बनाया गया है। अगर पी. चिदम्बरम के पास गृह मंत्रालय का प्रभार रहने दिया गया है तो उसका कारण उनके द्वारा मुंबई हमले के बाद अपनी नियुक्ति को सार्थक साबित करना ही है। इसी प्रकार प्रणब मुखजीै को यदि वित्त मंत्रालय का नेतृत्व दिया गया तो उसके पीछे प्रधानमंत्री का यह विश्वास ही है कि वे उनके साथ मिलकर आर्थिक समस्याओं से जूझती दुनिया से भारत को बचाकर बाहर निकालने में सक्षम होंगे। ए. के. एंटनी को भी रक्षा मंत्री के रुप में अपने बेहतर काम का इनाम मिला है। प्रधानमंत्री ने आतंकवाद से संघशZ एवं अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने को अपना प्रमुख उद्देश्य घोशित किया है। यह राहुल गांधी के युवा तर्क वाला मंत्रिमंडल नहीं है, लेकिन अभी आगे विस्तार होना है और उसमें निश्चय ही युवा चेहरे भी हमें दिखाई देंगे। वैसे भी मंत्रिमडल में अनुभवी एवं नए चेहरे के बीच संतुलन होना चाहिए। देश को सक्षम और संवेदनशील सरकार चाहिए जो कि सामने खड़ी चुनौतियों का मुकाबला कर उससे हमें बाहर निकाल सके। इसमें उम्र कहीं बाधा नहीं है। मंत्रियों ने जो कुछ कहा है उससे यह उम्मीद बनी है कि ये देश के लिए बेहतर काम करने का प्रयास करेंगे। लोकसभा का गणित भी इस बार प्रधानमंत्री का साथ दे रहा है जिसमें साथी दलों के अनावश्यक दबाव एवं धमकियों की संभावनाएं क्षीण हैं। हालांकि पहले चरण के शपथ ग्रहण में केवल कांग्रेस, राश्ट्रवादी कांग्र्रेस एवं तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों के शामिल होने के कारण देश के सामने विखंडित राजनीति की कमजोरियों का अहसास बना रहा, लेकिन यह राजनीतिक गणित ही है, जिस कारण कांग्रेस बगैर द्रमुक के ही ऐसा करने का साहस कर पाई। वर्तमान मंत्रिमंडल को सोनिया गांधी द्वारा नया कांग्रेस कहना अनुपयुक्त नहीं है। आखिर ये दोनों पार्टियां कांग्रेस से ही निकली है। अगर द्रमुक एवं नेशनल कॉन्फ्रेंस के मंत्री भी शामिल होते तो निश्चय ही यह कांग्रेस परिवार का शपथ ग्रहण नहीं माना जाता। अच्छा हो द्रमुक जनादेश का संदेश समझते हुए शीघ्र बातचीत में मध्यमार्गी रुख अपनाए एवं सरकार में शामिल हो जाए। आखिर मतदाताअों ने राजनीतिक सौदेबाजी के दौर के अंत के लिए तो कांग्रेस एवं उसके साथियों के पक्ष में ऐसा जनादेश दिया है। मंत्रिमंडल में किसे लेना और नहीं लेना है यह प्रधानमंत्री का विशेशोधिकार होना चाहिए। साथी दल के नाते द्रमुक अपनी ओर से नाम दे सकता था, लेकिन नेतृत्व प्रधानमंत्री के हाथों हैं इसलिए वे किसे और कितने को साथी बनाएं इसे आरोपित नहीं किया जाना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं: