सही फैसला
उच्चतम न्यायालय द्वारा परिजनों के मुआवजे में वेतन के साथ महंगाई भत्ता एवं आवास भत्ता शामिल किए जाने के फैसले को सही न्याय कहना होगा। अभी तक दुघZटनाओं से अप्राकृतिक मौत के मामले में मोटर वाहन दुघZटना प्राधिकरण प्राय: मुआवजे की रािश की गणना मूल वेतन के आधार पर ही करते हैं। मृतक के परिजन भत्तों के रुप में प्राप्त होने वाली रािश से वंचित हो जाते हैं। यह दृिश्टकोण पूर्ण न्याय के सिद्धांत को नकारता है। आखिर परिवार के लिए वेतन में मिलने वाली रािश का महत्व होता है। वह मूल वेतन के रुप में मिला या भत्ते के रुप में इससे कर्मचारी या परिवार को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए महत्व इस बात का है कि उनके हाथों अंतिम रािश कितनी आई। हम जानते हैं कि महंगाई भत्ता या आवास भत्ता आदि की अवधारणा कई कारणों से पैदा हुईं हैं, अन्यथा पहले एकमुश्त रािश ही वेतन के रुप में मिलती थी। यह आय का ही भाग है। उच्चतम न्यायालय ने यही तो कहा है कि इसे भी आय में शामिल करना चाहिए। एक तो परिवार के आय का स्रोत चला गया और ऊपर से आप उसे मिलने वाली रािश में काट छांट कर देते हैं। क्या कर्मचारी को जिन मदों मेें भत्ते के नाम पर रािश मिलती हैं मृतक के परिजनों के लिए उन मदों की प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है? न तो उनके लिए महंगाई अप्रासंगिक होता है और न आवास का किराया ही। इसलिए इस रािश को काट लेना अन्याय है। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद मुआवजे के संदर्भ में वशोZं से चली आ रही यह विसंगति दूर हो जाएगी। आखिर स्थापित मानक के प्रभाव में ही तो मध्यप्रदेश की िशक्षिका की मृत्यु के मामले में पहले निचली अदालत ने भत्तों को आय मानने से इन्कार कर दिया एवं उच्च न्यायालय तक ने इसकी पुिश्ट कर दी। निश्चय ही अदालतों की सोच इससे बदलेगी और केवल महंगाई एवं आवास भत्ता नहीं, अन्य जो भी भत्ते मृतक को प्राप्त होते थे उन सबको आय मानकर मुआवजे की रािश में शामिल किया जाएगा। दुघZटना से मृत्यु के मामले में ऐसी कई विसंगतियां हैं जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। जिस मामले में यह फैसला दिया गया वह नवंबर 2002 का है। यानी परिजनों को मुआवजे की रािश पाने के लिए करीब साढ़े छ: वशZ प्रतीक्षा करनी पड़ी। यदि परिवार में एक ही व्यक्ति अर्जन करने वाला हो तो उसकी क्या दशा होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। 50 हजार की अंतरिम रािश में कितने दिन काम चलेगा। इसलिए ऐसे मामले में फैसले की समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। दूसरे, मृतक के उत्तराधिकारी को पेंशन के साथ दोबारा शादी न करने की शत्तZ नत्थी है और इसे आधार बनाते हुए न्यायालयों ने कई फैसलों में मुआवजे की रािश लेने के साथ यही शत्तZ लगा दिया है। यह भी उचित नहीं है। इस शत्तZ को भी समाप्त करना चाहिए।
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