शुक्रवार, 15 मई 2009

Nitish Modi handshake

रैली बड़ी या नीतीश मोदी मिलन?

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की लुधियाना महारैली में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से हाथ मिलाना सबसे बड़ी खबर थी या रैली का आयोजन एवं उसमें नेताओं के एकजुट रहने का भाषण ? देश के आम नागरिक के लिए इसका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है, रैली एवं नेताओं की एकजुटता। किंतु, राजनीति एवं मीडिया ने इस सवाल को उलझा दिया है। राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और मीडिया के कुछ हलकों की सुिर्खयों के अनुसार तो नीतीश मोदी का एकता प्रदशZन ही सबसे महत्वपूर्ण बात थी। क्यों? इस सवाल के जवाब के लिए यह देखना जरुरी होगा कि नीतीश मोदी के हाथ मिलाने को मुद्दा बनाने वाले हैं कौन? इसका सबसे तीखा विरोध लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान एवं राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की ओर से हुआ है। इन्होंने नीतीश कुमार को धोखेबाज तक कह दिया है। हम आप सब जानते हैं कि इन दोनों पार्टियों ने पिछला लोकसभा में चुनाव गुजरात दंगा और नरेन्द्र मोदी को सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया था। हालांकि 2005 के विधानसभा चुनाव में भी इन्होंने मोदी एवं दंगे को मुद्दा बनाया, किंतु इन्हें लोकसभा चुनाव के अनुसार सफलता नहीं मिली। भाजपा के संदर्भ में मुसलमानों की भयग्रंथि को घनीभूत बनाए रखने में ही लालू की रजनीति का तानाबना टिका है। पासवान तो अपने सेक्युलर चरित्र का सबूत ही यह कहकर देते हैं कि उन्होंने गुजरात दंगों के विरुद्ध ही राजग का दामन छोड़ा था। ऐसी राजनीति और मीडिया की कृपा से मोदी सक्रिय मुसलमानों के बीच आतंक बन चुके हैं। नीतीश ने बिहार मुसलमान वोट बैंक को दरकाकर वैसे भी इनको कमजोर किया है। जाहिर है, इनके लिए नीतीश पर तीखा हमला अस्वाभाविक नहीं है। हालांकि यह बात सही है कि नीतीश एवं जद-यू के अध्यक्ष शरद यादव राजग में होते हुए भी मोदी के साथ एक मंच पर आने से अब तक बचते रहे हैं। नीतीश के आग्रह पर ही भाजपा की सबसे ज्यादा चुनावी सभाएं संबोधित करने वाले मोदी न 2004 में बिहार गए, न 2005 में एवं न इस बार। पिछले दिनों एक टी। वी. साक्षात्कार में जब नीतीश से यह पूछा गया कि वे मोदी के साथ मंच पर आएंगे तो उन्होंने इसका जवाब दिया, नहीं, जरा भी नहीं। इस परिप्रेक्ष्य में लुधियाना की तस्वीर उनके पूर्व रवैये के विपरीत दिखती है। किंतु हम यह न भूलें कि लुधियाना में राजग की रैली थी और उसका एक घटक होने के नाते नीतीश की वहां उपस्थिति लाजिमी थी। निश्चय ही इस रैली के पीछे भाजपा की ही भूमिका थी लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल मेजबान थे और उनके प्रकट आमंत्रण पर ही सारे नेताआंें ने िशरकत किया। जब वहां राजग के सभी मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति तय थी तो फिर मोदी आएंगे या नहीं ऐसी कयास ही बेमानी थी। विरोधियों की इच्छानुसार यदि नीतीश या दूसरे नेता वहां नहीं जाते तो इससे राजग में अनेकता का संदेश जाता और यही लोग उसका उपहास उड़ाते। लोकसभा चुनाव में यदि ये एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं तो इनके बीच एकता दिखनी ही चाहिए थी। लालू, पासवान या अन्य विरोधियों की इच्छा से तो जद-यू एवं भाजपा का गठबंधन नहीं बना हुआ है। यह गठबंधन ही इन सारे विरोधियों के विरुद्ध है। मंच पर यदि मोदी का हाथ बढ़ा तो क्या सामने वाला यह कहकर हाथ खींच लेगा नहीं मैं आपसे हाथ नहीं मिला सकता? आखिर केन्द्र सरकार द्वारा आहूत बैठकों में मोदी आते हैं और जिनसे वे चाहते हैं हाथ मिलाते हैं। प्रधानमंत्री सहित जिन मंत्रियों की उनमें उपस्थिति अनिवार्य होती है वे वहां रहते हैं और उनसे भी सहज ढंग से मोदी मिलते हैं। मीडिया के जिस वर्ग ने छाती पीटने का माहौल बनाया हुआ है उनके पत्रकार भी बाजाब्ता मोदी से हाथ मिलाते हैं। कहा जा सकता है कि दोनों हाथ मिलाने में अंतर है। किसी सामान्य मुलाकात में हाथ मिलाने एवं चुनावी रैली में हाथ मिलाकर एकता प्रदशZन करने का संदेश बिल्कुल अलग जाता है। रैली में जिस प्रकार मोदी ने नीतीश से हाथ मिलाते हुए उन्हें उठाया एवं जनता के बीच एकता दशाZयी उसका संदेश वाकई अलग था। यह भी साफ था कि सब कुछ मोदी की ओर से ही हुआ और उन्होंने पूर्व योजना के अनुसार भूमिका अदा की। किंतु यह जिन्हें भी अजूबा एवं आपत्तिजनक लगा उनकी अपनी मानसिकता के कारण। मोदी को हौव्वा एवं तथाकथित सेक्यूलर दुनिया में अछूत बनाने वालों ने बिल्कुल अव्यावहारिक तरीके का माहौल बनाया हुआ है। ऐसा लगता था मानो मोदी और नीतीश के मंच पर आने से कुछ अजूबा घटित हो जाएगा। जिस भाजपा के नेतृत्व में राजग गठित है उसके मोदी बड़े नेता हैं, पार्टी का एक वर्ग तो उन्हें अगला प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तक बना रहा है। कोई पार्टी या नेता भाजपा के साथ रहते हुए मोदी के साथ अछूत का बर्ताव करता रहे यह संभव ही नहीं है। इस प्रकार नीतीश का पूर्व रवैया ही गलत था। यदि उन्हें भाजपा स्वीकार है तो मोदी भी स्वीकार्य होना चाहिए। दोनों बातें एक साथ चल भी नहीं सकतीं। यह तो हमारे युग का नैतिक पतन है कि मोदी को खलनायक बनाकर अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ लिया गया है। मुसलमानों का हितैशी साबित करने का मतलब मोदी का आक्रामक विरोध या उनसे घोशित दूरी। आपको और कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं है। मुसलमानों के अंदर भयगं्रंथि पैदा करके राजनीति करनेे वाले बुनियादी सवालों से बचने के लिए हमेशा ऐसा कोई प्रतीक ढूंढते हैं, जिनसे उन्हें बरगलाया जा सके। किंतु इनके अनुसार यदि राजनीति संचालित हो तो न भाजपा के साथ कोई दल होना चाहिए और न आम जनता का मत ही उसे मिलना चाहिए। ये दोनों बातें नहीं हो रहीं हैं। किसी को चाहे जितना नागवार गुजरे लुधियाना में एक मंच पर नौ दलों का इकट्ठा होना चुनाव प्रक्रिया के अंतिम दौर की सबसे बड़ी घटना थी। अगर संप्रग एवं तीसरे मोर्चे से तुलना करें तो इस रैली के बाद राजग सबसे बड़ा गठजोड़ है। ये दोनों घटक चाहकर भी चुनाव के बीच कोई रैली नहीं कर सके। इनकी सारी उम्मीदें चुनाव बाद के समीकरण पर है। कल तक तीसरे मोर्चे का भाग माने जाने वाले तेलांगना राश्ट्र समिति के प्रमुख चन्द्रशेखर राव का राजग के साथ आना तो वामदलों के लिए भी तगड़ा झटका है। राजग के नजरिए से यह शत-प्रतिशत रैली थी। इससे दोनों समूहों का तिलमिलाना स्वाभाविक है। निश्चय ही कुछ लोग इस सफलता से ध्यान हटाने के लिए भी नीतीश मोदी मिलन को मुद्दा बना रहे हैं। नीतीश तो सुिर्खयां ही इसलिए बने, क्योंकि कांग्रेस एवं वाममोर्चा दोनों ने उनकी ओर दाना डाला था। माहौल ऐसा बनाने की कोिशश की गई थी मानो नीतीश अपना सेक्यूलर चरित्र प्रमाणित करने के लिए भाजपा से अलग होने को मजबूर हो जाएंगे। माकपा नेता एवं प. बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने सार्वजनिक भाशण में यह कहा कि नीतीश से हमारी बातचीत चल रही है और वे भी भाजपा को छोड़कर आ जाएंगे। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने तो भावी साझेदारों के रुप में नीतीश का विशेश तौर पर उल्लेख किया। इस एक रैली ने इन आशाओं पर तुशारापात कर दिया। जब हमारी कामना ही गलत होगी तो उसका परिणाम मनोनुकूल कैसे आ सकता है। हालांकि सबसे बड़े समूह के रुप में होने का प्रमाण देने के बावजूद यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि इस रैली से राजग के लिए सत्ता की दावेदारी पुख्ता हो गई है। वास्तव मेें किसी को बहुमत न मिलने की संभावनाओं के बीच इससे अगली सरकार को लेकर अनिश्चय बढ़ा है। बहुमत न मिलने की स्थिति में भी यदि राजग के ये घटक अपनी घोषणा के अनुरुप एकजुट रहते हैंं तो फिर दूसरे समूहों के लिए भी बहुमत के लिए साथी कम पड़ जाएंगे। यह नहीं भूलिए कि कांग्रेस की प्रतिक्रिया काफी सधी हुई है। पहले पार्टी प्रवक्ता अभिशेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह सवाल नीतीश से ही पूछना चाहिए। कांग्रेस के दूसरे प्रवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि यह राजनीति है और लुधियाना की रैली में नीतीश का जाना अपेक्षित था। कांग्रेस और उनके पर्व साझेदारों नीतीश एवं पासवान की प्रतिक्रिया में ऐसे अंतर को समझना कठिन नहीं है। कांग्रेस चुनाव बाद के समीकरण को ध्यान में रखकर बयान दे रही है, जबकि लालू पासवान की नजर बिहार में अपने चरमराते जनाधार की ओर है।

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