इस जनादेश से नये राजनीतिक युग की नींव पड़ी है
वाह रे जनादेश! सारे आकलन और अनुमान एकबारगी धाराशायी। 15 वीं लोकसभा चुनाव परिणाम का सबसे बड़ा निश्कशZ यही है कि देश की जनता राश्ट्रीय स्तर पर स्पश्ट निर्णायक जनादेश की पहल कर चुकी है। यह कहा जा सकता है कि 1989 के साथ राश्ट्रीय राजनीति में जो चक्र आरंभ हुआ वह अब पूरा हो रहा है। संप्रग का अकेले बहुमत के करीब पहुंचना एवं अपने पूर्व साथियों के साथ स्पश्ट बहुमत पाना समस्त कल्पनाओं से परे है। कांग्रेस अपने साथी दलों के साथ सबसे ज्यादा स्थान पाएगी यह तो साफ था लेकिन सारे विश्लेशकों का मानना यही था कि उसे अंतत: वामदलों व तीसरे मोर्चे के नाम से एकत्रित दलों से समर्थन की दरकार पड़ेगी। इसी सोच के तहत बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विचार-विमशZ के केन्द्र में आ गए थे। मायावती, जयललिता, चन्द्रबाबू नायडू, देवेगौड़ा सबका राजनीतिक महत्व इतना बढ़ गया था कि इनके बगैर किसी सरकार की कल्पना तक नहीं की जा रही थी। चुनाव परिणामों ने इन सबको राश्ट्रीय राजनीति के हािशए में पटक दिया है। बिहार में जनदा दल-यू एवं भाजपा के गठबधन का अच्छा प्रदशZन भी राजग के काम नहीं आया और उन्हें विपक्ष में ही अपनी भूमिका निभानी होगी। कांग्रेस ने 1991 के बाद पहली बार इतनी अधिक सीटें जीतीं है और उसने भाजपा के 1998 1999 के आंकड़े को भी पार कर दिया है। देश की राजनीति जितनी विखंडित हो गई थी उसमें स्वयं कांग्रेस भी इतनी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं कर रही थी। इसका प्रमाण उसका स्वयं का चुनाव बाद सर्वेक्षण परिणाम था जिसमें 161 सीटें मिलने का आकलन था। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक वामदलों का रिझाने वाले वक्तव्य दे रहे थे। इस प्रकार यह मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि कुछेक स्थानों को छोड़कर बहुसंख्य मतदाता ने लंबे समय की चलायमान राजनीति से उबकर देश की राजनीति को स्थिर करने के लिए मतदान किया है। चुनाव परिणामों का कई प्रकार से विश्लेशण किया जा सकता है, लेकिन अंतिम अंकगणित को कोई नकार नहीं सकता। गहराई से देखेंगे तो इस चुनाव में राजनीतिक अस्थिरता के लिए जिम्मेवार ज्यादातर दलों को जनता ने नकार दिया है। इसमें सबसे पहला स्थान वामदलों का आएगा। पिश्चम बंगाल एवं केरल का लाल दुर्ग दरक चुका है। इन दोनों राज्यों में माकपा न अकेले सबसे बड़ी पार्टी रही और न उसके नेतृत्व वाला मोर्चा। मनमोहन सिंह सरकार से 18 जुलाई 2008 को समर्थन वापसी के बाद से इनका दावा था कि ये अगले चुनाव में गैर कांग्रेस एवं गैर भाजपा सरकार बनाएंगे। आज ये एक ताकतवर विपक्ष की भूमिका निभाने की हालत तक में नहीं है। यह भारतीय राजनीति की बहुत बड़ी घटना है। दोनों राज्यों में कांग्रेस एवं उसके सहयोगी तृणमूल द्वारा वामदलों के स्थानापन्न का राश्ट्रीय महत्व बिल्कुल स्पश्ट है। निस्संदेह, प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस गठजोड़ की विजय के स्थानीय कारण हैं और इसका सेहरा ममता बनर्जी के सिर जाएगा, किंतु यह भी साफ है कि जनता ने वामदलों विशेशकर माकपा के हाथ से राश्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका का सूत्र छीन लिया है। यह 1989 के बाद पहली बार होगा जब माकपा दोनों में से किसी पक्ष में प्रभावी भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं होगी। कांग्रेस के भीतर जो नेता वामदलों के साथ मेलमिलाप कर चुनाव में उनके साथ उतरने के हिमायती थे वे गलत साबित हुए। वास्तव में कोई पार्टी जनता के अंतर्मन को पूरी तरह भांपने मे सफल नहीं रही। साफ है कि देश और दुनिया जिस अवस्था से गुजर रही है उसमें लोग केन्द्र में एक स्थिर सरकार चाहते थे। जयललिता, चन्द्रबाबू नायडू.... आदि का तीसरे मोर्चा के नाम से वामदलों के साथ एकत्रित होने से जनता के बीच विपरीत संदेश गया। तमिलनाडु एवं आंध्रप्रदेश का परिणाम हमारे सामने है। सारे अनुमानों में जयललिता का गठजोड़ आगे था और करुणानिधि के द्रमुक कांग्रेस गठजोड़ के सूपड़ा साफ होने की बात की जा रही थी। परिणाम ऐसा नहीं आया। अन्नाद्रमुक की 2004 के शून्य के मुकाबले लोकसभा में प्रतिनिधित्व हुआ, लेकिन राजनीति को प्रभावित करने की दृिश्ट से उनका होना और न होना बराबर है। आंध्र में कांग्रेस ने रिकॉर्ड जीत हासिल की और तीसरा मोर्चा धाराशायी हो गया। ध्यान रखने की बात है कि कांग्रेस के पक्ष में ऐसा ही परिणाम आंध्र विधानसभा चुनाव में नहीं आया। जाहिर है वहां सत्ता विरोधी रुझान था, किंतु केन्द्र में राजनीतिक अस्थिरता दूर करने की जन मन:स्थिति लोकसभा चुनाव में सब पर भारी पड़ गई। जम्मू कश्मीर में पीडीपी का सफाया एवं कांग्रेस नेशनल कांफ्रेंस गठजोड़ की सफलता को इसी सोच की परिणति मानी जाएगी। आखिर पीडीपी ने प्रदेश में सरकार से समर्थन वापस लिया था। इस जन मनोविज्ञान के रास्ते मायावती जैसी नेत्री की महत्वाकांक्षा भी बाधा बन रही थी। जिस प्रकार उनके समर्थकों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना दिया था, निश्चय ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की आशातीत सफलता के पीछे उसकी बहुत बड़ी भूमिका है। इसे हम कांग्रेस के रुप में विकल्प उपलब्ध होने के कारण मुसलमान, दलित एवं ब्राह्मण मतों का आंिशक धु्रवीकरण की परिणति कह सकते हैं। यह सही भी है कि कांग्रेस के ये परंपरागत मतदाता उसके अकेले मैदान में उतरने के कारण उ. प्र. एवं बिहार दोनों जगह उसकी ओर मुड़े हैं। बिहार में भले राजग की लहर में उसे सीटें नहीं मिलीं, लेकिन उसके मतों में कई गुणा बढ़ोत्तरी हुई है। ये मतदाता पिछले लंबे समय से विकल्प उपलब्ध न होने के कारण दूसरे दलों को मत देकर देश में राजनीतिक अस्थिरता का कारण बनते थे। इन्होंने अब अपना इरादा बदलने का संकेत दे दिया है। अगर कांग्रेस इसे आगे अपनी राजनीतिक रणनीति से सुदृढ़ करने में सफल रही तो निश्चय ही वह अकेले बहुमत पाने की स्थिति में पहुंच जाएगी। उसके परपंरागत मताधार पर राजनीति की जमीन खड़ी करने वाली पार्टियों के लिए यह खतरे की घंटी है। तो परिणाम के सबक साफ है। राश्ट्रीय पार्टियां छोटे दलों के दबाव में आए बगैर अपनी राजनीति करें। चुनाव परिणाम का सतही विश्लेशण भी साबित कर देता है कि ज्यादातर जगहों पर आम मतदाता ने अपने नजरिए से बेहतर राश्ट्रीय विकल्प का वरण किया है। उसे दोनों प्रमुख राश्ट्रीय धुरी में से जिसमें भी राजनीतिक स्थिरता की संभावना निहित लगी उसे समर्थन दिया है। बिहार एवं झारखंड में भाजपा-जद यू, या कर्नाटक, हिमाचल...आदि में भाजपा की सफलता भी राश्ट्रीय राजनीति में स्थिरता लाने का ही द्योतक है। हां, वहां यदि तीसरे चौथे विकल्प को समर्थन मिलता तो अवश्य इसका दूसरा राजनीतिक अर्थ होता। बिहार एवं झारखंड में लोजपा, राजद, के सफाए की क्या व्याख्या होगी? लालू यादव तक सारण से अंतिम समय में किसी प्रकार विजीत हुए, लेकिप राम विलास पासवान उस हाजीपुर सीट से हारे जहां से उन्होंने सबसे ज्यादा मतों से विजय का रिकॉर्ड बनाया था। यह कोई साधारण घटना नहीं है। इसी प्रकार झारखंड में झामुमो भी राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक बन चुकी थी। कर्नाटक में देवेगौड़ा एवं उनका जद-सेक्यूलर राजनीतिक स्थिरता का प्रतीक नहीं बन पाया था। उड़ीसा को छोड़कर तमाम परिणामों का एक ही स्वर है। कांग्रेस एवं भाजपा को यह स्वर सुनना चाहिए। इस चुनाव परिणाम ने दो ध्रुवीय राजनीति की ठोस नींव एवं दीवार खड़ी कर दिया है, जिसे सुदृढ़ करना राश्ट्रीय दलों का दायित्व है। आखिर सारी आशंकाओं के विपरीत दोनों मुख्य पार्टियों को करीब सवा तीन सौ सीटें तथा इनके गठजोड़ को करीब सवा चार सौ सीटें मिली हैं। इस प्रकार 15 वीं लोकसभा चुनाव से जिए नए चक्र की शुरुआत हुई है उसे मुकाम तक पहुंचाने की चुनौती दोनों प्रमुख दलों के सामने है। तो क्या ये इस चुनौती को स्वीकार कर युगांतकारी भूमिका निभाने को तैयार हैं? यह ऐसा प्रश्न है जिससे उत्तर पर देश की राजनीतिक नियति निर्भर करता है।
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