कामरेड, आपकी राजनीति क्या है
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) या माकपा फिर राष्ट्रीय राजनीति की धूरी बनकर उसे अपने अनुसार आकार देने की रणनीति में लगी है। माकपा नेता लगातार संदेश दे रहे हैं कि भाजपा या कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनने की कोई संभावना नहीं है। जहां तक कांग्रेस की बात है तो वे बार-बार कह रहे हैं कि वामदल किसी सूरत में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन नहीं दे सकता। जाहिर है, इसके बाद तीसरा मोर्चा ही बचता है। माकपा द्वारा तीसरा मोर्चा के नाम से इकट्ठा किए गए 10 दलों के बीच दरार पड़ चुकी है। बावजूद इसके उसका दावा है कि उसने भाजपा एवं कांग्रेस के बीच सिमटी दो ध्रुवीय राजनीति को धक्का देकर त्रिध्रुवीय बनाने में सफलता पा ली है एवं चुनाव बाद इस धु्रव के नेतृत्व में ही गैर कांग्रेस गैर भाजपा सरकार बनेगी। वास्तव में पिछले दो दशक से वाममोर्चा का नेतृत्व करने वाली माकपा की मुख्य भूमिका यहीं तक सीमित है। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन देने के साथ जो प्रक्रिया आरंभ हुई वह 1996 में संयुक्त मोर्चा के गठन के साथ परवान चढ़ी। माकपा यद्यपि संयुक्त मोर्चा का भाग नहीं थी और सरकार में शामिल नहीं हुई, लेकिन ऐसा लगता था मानो मोर्चा एवं सरकार की मुख्य नियंता वही हो। राष्ट्रीय राजनीति में उसकी हैसियत एवं अहमियत 1996 में जिस प्रकार सुस्थापित हुई उसके मनोवैज्ञानिक असर से वह कभी मुक्त नहीं हो पाई। 1998 एवं 1999 में राजग की सरकार होने के कारण सत्ता समीकरण में उसकी हैसियत नहीं थी लेकिन विपक्षी समीकरण में उसका रुतबा कायम रहा। इसका परिणाम 2004 में भाजपा विरोधी संप्रग सरकार के गठन के रुप में आया। इससे सत्ता प्रतिष्ठान में माकपा सहित शेष वामदलों की जो हैसियत थी उसे बताने की आवश्यकता नहीं है। यह उस हैसियत का ही असर था कि बार-बार कांग्रेस एवं सरकार की नीतियों से मतभेद उभरने के बावजूद उसने चार वशZ दो महीने तक अपना समर्थन बनाए रखा। माकपा अपनी नीति को जो नाम दे वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी हैसियत बनाए रखने की कोिशश कर रही है। चुनावी अंकगणित में वामदलों की ऐसी ताकत नहीं है कि वे अपनी बदौलत सत्ता या विपक्ष की दिशा-दशा निर्धारित कर सकें। पिछले 2004 के लोकसभा चुनाव में माकपा ने 19 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में कुल 69 उम्मीदवार उतारे जिनने 43 स्थानों पर विजय प्राप्त की। इसे कुल 2 करोड़ 20 लाख 70 हजार 614 मत मिले जो कि कुल मतदान का 5.66 प्रतिशत था। इसे सबसे ज्यादा मत तीन राज्यों त्रिपुरा (68.80 प्रतिशत), प. बंगाल (38.57 प्रतिशत) एवं केरल (31.52 प्रतिशत) में प्राप्त हुआ। दो प्रतिशत से ज्यादा मत केवल एक राज्य तमिलनाडु (2.87 प्रतिशत) एवं केन्द्रशासित अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह (2.71 प्रतिशत) में आया। भाकपा ने कुल 34 उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से 10 विजयी हुए। इसे कुल 54 लाख 84 हजार 111 मत प्राप्त हुए जो कि कुल मत का मात्र 1.41 प्रतिशत था। इसमें मणिपुर में एक स्थान पर उम्मीदवार खड़ा करने के कारण उसे सबसे ज्यादा 10.11 प्रतिशत मत मिला था। उसके बाद केरल के उसके चार उम्मीदवारों ने 7.89 प्रतिशत, प. बंगाल में उसके 3 उम्मीदवारों ने 4.01 प्रतिशत, झारखंड के उसके एक उम्मीदवार ने 3.80 प्रतिशत, तमिलनाडु मे उसके दोनों उम्मीदवारों ने 2.97 प्रतिशत, पंजाब में उसके एक उम्मीदवार ने 2.55प्रतिशत, गोवा के उसके दो उम्मीदवारों ने 2.17 प्रतिशत, असम में उसके एक उम्मीदवार ने 1.66 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश के उसके एक उम्मीदवार ने 1.34 प्रतिशत, बिहार में उसके छ: उम्मीदवारों ने 1.17 प्रतिशत मत पाया। जिन 15 राज्यों में उसने उम्मीदवार खड़े किए उनमें पांच राज्यों में उसे 0.50 प्रतिशत से भी कम मत मिला। ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक ने पांच राज्यों में 10 उम्मीदवार मैदान में उतारे जिनमें से 3 प. बंगाल से विजयी हुए। इसे कुल 13 लाख 65 हजार 55 मत मिले जो कि कुल मतों का 0.35 प्रतिशत था। इसे केवल प. बंगाल में ही 3.66 प्रतिशत मत मिला, अन्यथा अन्य चार राज्यों में इसे 0.25 प्रतिशत से कम मत मिले। रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने तीन राज्यों में छ: उम्मीदवार खड़ा किया जिसमें से तीन जीते। इसने कुल 16 लाख 89 हजार 794 मत पाए जो कुल मतों का 0.43 प्रतिशत था। असम और उड़ीसा में इसे सामन रुप से 0.11 प्रतिशत मत मिला। भाकपा के 34 में से 18 उम्मीदवारों के जमानत जब्त हो गए। माकपा के जमानत जब्त होने वाले प्रत्यािशयों की संखा 15 थी। वामदलों का कुल मत प्रतिशत था 7.85 प्रतिशत। इसमें करीब दो प्रतिशत मत तो उम्मीदवार खड़ा करने के कारण मिल गया। तमिलनाडु में द्रमुक गठजोड़ का भाग होने से इन्हें मत एवं जीत नसीब हुई। इस समय प. बंगाल, केरल एवं त्रिपुरा तथा झारखंड के एक क्षेत्र को छोड़कर वामदलों का मजबूत जनाधार कहीं नहीं है। इन तीनों राज्यों में कुल 78 लोकसभा स्थान हैं। इनमें झारखंड के 14 हैं। इनमें से एक हटा दीजिए तो इनका प्रभाव क्षेत्र 65 स्थानों तक सीमित है। तमिलनाडु एवं आंध्र में ये बगैर सहयोगी कुछ करने की स्थिति में भी नहीं हैं। यह तो भारतीय राजनीति की विडम्बना है कि इतने कम स्थानों पर जनाधार रखने वाले चार दलों का वामोर्चा माकपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय राजनीति की तस्वीर बदलने पर उतारु है। वैेसे इन चारों दलों में पूर्ण वैचारिक एकता भी नहीं है। फारवर्ड ब्लॉक एवं आरएसपी तो माकपा के खिलाफ प. बंगाल में ऐसे अनेक आंदोलनों की अगुवाई कर रही है जैसा विपक्ष शासक दल के खिलाफ करता है। इनके बीच हत्या तक के दर्जनों मुकदमे चल रहे हैं। 2004 इनके लिए चुनावी सफलताओं का ऐतिहासिक वर्ष था। इसने 59 स्थानों पर विजय प्राप्त किया। जिस नीति पर ये चल रहे हैं उसमें इनकी सीटों एवं मतोें में और कमी ही आनी है। सारे आकलन 2009 के चुनावों में इनकी सीटों में कमी के संकेत दे रहे हैं। राश्ट्रीय राजनीति की जोड़तोड़ में उलझे रहने के कारण प. बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल ने इनके जनाधार को दरका दिया है। तो सीमित जनाधार और उसमें भी साफ दिख रहा क्षरण, अपने मोर्चे के भीतर उग्र द्वंद्व, यह इस समय वाममोर्चा की वस्तुस्थिति है। ऐसा लगता है कि सत्ता एवं विपक्ष की इस राजनीति में उलझे रहने के कारण वे अपना मूल राजनीतिक लक्ष्य भी हािशए में धकेल चुके हैं। आर्थिक एवं सामाजिक समानता के लिए वाममोर्चा का कोई आंदोलन अभियान आपको दिखाई नहीं देगा। माकपा सहित वामदल इस वैचारिक क्षरण को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं तो इसे विडम्बना ही कहा जाएगा। राश्ट्रीय राजनीति की हैसियत भी संख्याबल पर निर्भर करता है। संख्याबल के अभाव में ही वामदल ऐसे दलों का कुनबा खड़ा करने की कोिशश करते हैं जिनकी कोई राजनैतिक नैतिकता या नििश्चत राजनीतिक विचारधारा नहीं है। उनकी आर्थिक विचारधारा तक वामदलों के बिल्कुल उलट हैं। आखिर चन्द्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, मायावती, देवेगौड़ा, जयललिता..आदि की आर्थिक एवं सामाजिक नीतियां वामदलोंं की मूल सोच से कैसे मेल खा सकती है? ऐसी ओैर भी बातें हैं जो वामदलों के प्रयासों को सिद्धांतहीन सिद्ध करती हैं। फिर ऐसे प्रयोगों में राजनीतिक अस्थिरता अवश्यंभावी रुप से निहित हो जाता है। कांग्रेस एवं भाजपा को परे रखकर किसी सरकार के गठन का अर्थ ही है उसका असमय पतन। इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि कामरेड, आपकी राजनीति क्या है? आप देश की राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?
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