संवत 2008 के प्रयाण एवं 2009 के आगमन की वेला में भारतीय राजनीति
तस्वीर धुन्धली है
साल 2008 के कैनवास पर भारतीय राजनीति का रंग यकीनन जिस प्रकार विचित्र ढंग से बिखड़ा है उसमें 2009 के लिए कोई नििश्चत तस्वीर उकेरना जोखिम भरा है। किंतु यह कैनवास ही उसकी आधारभूमि है जिस पर अगले साल की राजनीतिक तस्वीर बनेगी-बिगड़ेगी। एक रंग आतंकवाद विरोधी युद्ध मेें राजनीतिक एकता का है। वषोZं बाद भारतीय राजनीति में एकजुटता के कर्णप्रिय स्वर सुनाई पड़े हैं जिसका अर्थ यह है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। राजनीतिक दलों एवं नेताअों के बड़े वर्ग में राष्ट्रनिष्ठा एवं सद्विवेक का इतना अंश मौजूद हैं कि संकट की घड़ी में वे हाथ मिला सकते हैं। 2008 का यह संदेश सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। किंतु दूसरी ओर इस एकजुटता के रहते एक दूसरे पर राजनीतिक हमला की प्रवृत्ति राजनीति की आम विकृत छवि को ही प्रस्तुत करती है। साल 2009 में आम राजनीतिक व्यवहार इन्हीं दो विपरीत एवं भारतीय राजनीति की दृिष्ट से स्वाभाविक प्रवृत्तियों से संचालित होगी। वैेसे भी एकजुटता केवल आतंकवाद विरोध पर है, अन्यथा तीखा राजनीतिक विभाजन एवं इसके आधार पर उभरते और तिरोहित होते राजनीतिक समीकरणों का अनुक्रम पूर्वानुरुप ही हैं। सिंहावलोकन किया जाए तो साल 2008 भारी राजनीतिक परिवर्तनों का साल नजर आएगा। मायावती का केन्द्र सरकार से समर्थन वापसी, कांग्रेस बसपा के बीच तीखी जुगलबंदी, तमिलनाडु में द्रमुक नेतृत्व से पीएमके का अलग होना, प. बंगाल में वाममोर्चा के घटक फारवर्ड बलॉक के साथ माकपा का सीधा संघशZ, जम्मू कश्मीर सरकार से पीडीपी का समर्थन वापसी एवं गुलाम नबी आजाद सरकार का पतन, फिर केन्द्र सरकार से वामदलों की समर्थन वापसी, विश्वास मत प्रस्ताव पर दलीय निष्ठा के परित्याग के कारनामे आदि 2008 के कैनवास पर निश्चय ही बदरंगी तस्वीर उभारते हैं। साल 2009 की समग्र तस्वीर इससे भिन्न नहीं हो सकती।नाभिकीय समझौते की राजनीति ने सत्तारुढ़ संप्रग के साथ चार साल से कायम समीकरण को बदल दिया। साल के आरंभ में ही साफ हो गया था कि कांग्रेस के लिए समझौता एवं वामदलों के समर्थन में से एक चुनना होगा। प्रधानमंत्री ने जून में यह कहकर कि नाभिकीय करार राजनीति का िशकार हो गया है लेकिन वे निराश नहीं है साफ कर दिया कि वे आगे बढ़ने का मन बना चुके हैं। सरकार ने वामदलों के विरोध के बावजूद आणविक एजेंसी में जाने का संकेत दिया। कांग्रेस ने कहा कि के वे समझोैते की ओर बढ़ रहे हैं और समय का चयन वे स्वयं करेंगे। 30 जून को प्रधानमंत्री का वक्तव्य आ गया एवं माकपा ने समथर्न वापसी का एलान कर दिया। लेकिन 8 जुलाई को औपचारिक समर्थन वापसी से किसी प्रकार का राजनीतिक धमाका नहीं हुआ क्योंकि तब तक कांग्रेस के लिए वामदलोंं पर निर्भरता की विवशता का अंत हो गया था। सपा का समर्थन कांग्रेस को मिल चुका था। वास्तव में इससे संप्रग सरकार ही नहीं भाजपा इतर भारतीय राजनीति का वर्णक्रम बदल गया। सपा की पहल पर निर्मित संयुक्त राष्ट्रीय प्रगतिशील गठबंधन या यूएनपीए जिसे भविष्य का तीसरा मोर्चा कहा जा रहा था, दफन हो गया। इसके पूर्व माकपा के नेतृत्व में वामदलों ने यूएनपीए के साथ मिलकर गैर कांग्रेस गैर भाजपा राजनीतिक विकल्प के गठन पर काम करना आरंभ कर दिया था। इस प्रकार सशक्त तीसरे विकल्प की संभावना नाभिकीय समझौते पर वामदलों की अड़ियल राजनीति का िशकार हो गया।हालांकि कांग्रेस-सपा नजदीकियों का संकेत संप्रग सरकार के चार साल पूरा होने के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए रात्रि भोज में मिल गया जब स्वयं प्रधानमंत्री ने अमर सिंह को विशेश महत्व दिया। लोकसभा में विश्वास मत के दौरान अंदर एवं बाहर सरकार का मुख्य संकटमोचक सपा ही बनी। यह एक नई राजनीतिक एकता थी जिसका स्वरुप में हमें लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में अवश्य दिखाई देगा। दूसरी ओर यह माकपा के लिए विशेश धक्का था, क्योंकि मार्च के अंत में कोयम्बटूर में अयोजित पार्टी के 19 वें महाधिवेशन में महासचिव प्रकाश करात ने राजनीतिक समीकरण के संभावित दलों में केवल सपा का ही उल्लेख किया था। माकपा के साथ भाकपा ने भी हैदराबाद में आयोजित 20 वीं राष्ट्रीय कांग्रेस में गैर भाजपा गैर कांग्रेस राजनीतिक समीकरण का प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद यूएनपीए एवं वाम एकता संसद के भीतर भी दिखा था। इसके बाद माकपा के सामने तीसरे विकल्प के लिए नए सिरे से कोिशश की विवशता आ गई। करात केवल अन्नाद्रमुक की जयललिता को ही आगामी गठबंधन के लिए तैयार कर पाए हैं। यह कहना मुिश्कल है कि वाकई यह एकता लोकसभा चुनाव एवं उसके बाद कायम रहेगा। यह साल किसी एक दल के प्रभाव के सबसे ज्यादा क्षरण वाला साबित हुआ तो वह माकपा है। नंदीग्राम एवं सिंगूर ने माकपा की पिछले 12 सालों से तीसरी धारा के बीच कायम उसकी धाक को तोड़ दिया है। वाममोर्चा के उसके साथी दलों तक ने उसकी खिलाफत की। स्थानीय निकाय के चुनावों में उसे कई जगह तृणमूल के हाथों पराजय मिली। समर्थन वापसी के कारण संप्रग के तीसरे मोर्चे के दल भी उससे नाराज होकर उसके विरुद्ध बयानवाजी की। इसका असर 2009 में अवश्य दिखाई पड़ेगा। फारवर्ड ब्लॉक एवं आरएसपी माकपा के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं। त्रिपुरा में एक भी स्थान न जीतने के कारण फारवर्ड ब्लॉक का स्वर धीमा हुआ है, लेकिन अकेले चुनाव लड़ने का कदम ही वाम एकता के कमजोर होने का प्रमाण था।कांग्रेस एवं भाजपा के लिए 2008 अगले साल की पूर्वपीठिका तैयार कर गया है। सोनिया गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष के रुप में दस साल पूरा करने को जिस प्रकार ऐतिहासिक बताया गया उससे साफ हो गया कि वे जब तक चाहेंगी इस पद पर बनी रहेंगी। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के योग्य बताने के वरिष्ठ नेता अजुZन सिंह के अभियान का करारा प्रत्युत्तर पार्टी की ओर से दिया जाना इस बात का संकेत था कि निकट भविष्य में मनमोहन सिंह के नेतृत्व को चुनौती नहीं है। लोकसभा चुनाव पार्टी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ेगी। राहुल गांधी ने दलितों, आदिवासियों, किसानों, छोटे िशल्पकारों आदि के बीच जाने का जो सिलसिला शुरु किया वह अगले साल भी जारी रहेगा भले चुनाव परिणाम जो भी हो। अमरनाथ जमीन विवाद पर पहले किंकर्तव्यविमूढ़ कांग्रेस ने बाद में जिस प्रकार इसका हल निकाला उससे उसकी परिपक्वता साबित हुई। इसी प्रकार मुंबई हमले के बाद स्वयं को संभालने तथा आतंक विरोधी कदमों का राजनीतिक रणनीति के रुप में प्रयोग कर कांग्रेस ने अपनी गिरती साख को जिस तरह थामा है उसका असर जनमानस पर पड़ा। कर्नाटक चुनावों में पराजित पार्टी की साल का अंत आते-आते दिल्ली में लगातार तीसरी बार वापसी एवं राजस्थान में बहुमत के निकट पहुंचने के चुनाव परिणाम ने उसमें जिस आशावाद का संचार किया है उससे लोकसभा चुनाव में उसकी भाव-भंगिमा निर्धारित हो गई है। भाजपा में इस साल अटलबिहारी वाजपेयी के शीषZ पर विराजमान रहने के युग का अंत एवं लालकृष्ण आडवाणी युग का आरंभ हो गया। जनवरी में भाजपा कार्यकारिणी एवं राष्ट्रीय परिषद का समापन पहली बार आडवाणी के भाषण से हुआ। राष्ट्रीय परिषद ने नेता के रुप में उनके नाम का अनुमोदन कर उनके एकल वर्चस्व की पुिष्ट कर दी। 2009 का लोकसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा जाना तो सुनििश्चत हुआ ही, यह भी स्पष्ट हो गया कि चुनाव परिणाम चाहे जो हो, उनके सक्रिय रहने तक पार्टी की रीति-नीति का अंतिम सूत्र उनके हाथों ही होगा। आडवाणी ने मेरा जीवन मेरा देश आत्मकथा के माध्यम से अपनी सोच से देश को अवगत कराने की कोिशश की। भाजपा के लिए कर्नाटक विजय से दक्षिण में अपनी बदौलत सरकार बनाने की ऐतिहासिक घटना हुई। इससे केवल उत्तर तक सीमित पार्टी की छवि टूटी। लेकिन दूसरे राज्यों में इसका कितना प्रभाव होगा यह कतई साफ नहीं है। समग्र राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो संप्रग की एकता बहुत हद तक कायम है एवं वह राजग से ज्यादा विस्तृत है। किंतु बसपा की नीति, माकपा द्वारा कांग्रेस नीत चुनावी गठबंधन में शामिल नहीं होने के एलान, आंध्र में चिरंजीवी के रुप में तेलुगू देशम के समानांतर एक नई शक्ति का उदय, प. बंगाल में तृणमूल का अनिश्चय भरा तेवर आदि से भावी राजनीति की धुंधली तस्वीर ही बनती है।
तस्वीर धुन्धली है
साल 2008 के कैनवास पर भारतीय राजनीति का रंग यकीनन जिस प्रकार विचित्र ढंग से बिखड़ा है उसमें 2009 के लिए कोई नििश्चत तस्वीर उकेरना जोखिम भरा है। किंतु यह कैनवास ही उसकी आधारभूमि है जिस पर अगले साल की राजनीतिक तस्वीर बनेगी-बिगड़ेगी। एक रंग आतंकवाद विरोधी युद्ध मेें राजनीतिक एकता का है। वषोZं बाद भारतीय राजनीति में एकजुटता के कर्णप्रिय स्वर सुनाई पड़े हैं जिसका अर्थ यह है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। राजनीतिक दलों एवं नेताअों के बड़े वर्ग में राष्ट्रनिष्ठा एवं सद्विवेक का इतना अंश मौजूद हैं कि संकट की घड़ी में वे हाथ मिला सकते हैं। 2008 का यह संदेश सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। किंतु दूसरी ओर इस एकजुटता के रहते एक दूसरे पर राजनीतिक हमला की प्रवृत्ति राजनीति की आम विकृत छवि को ही प्रस्तुत करती है। साल 2009 में आम राजनीतिक व्यवहार इन्हीं दो विपरीत एवं भारतीय राजनीति की दृिष्ट से स्वाभाविक प्रवृत्तियों से संचालित होगी। वैेसे भी एकजुटता केवल आतंकवाद विरोध पर है, अन्यथा तीखा राजनीतिक विभाजन एवं इसके आधार पर उभरते और तिरोहित होते राजनीतिक समीकरणों का अनुक्रम पूर्वानुरुप ही हैं। सिंहावलोकन किया जाए तो साल 2008 भारी राजनीतिक परिवर्तनों का साल नजर आएगा। मायावती का केन्द्र सरकार से समर्थन वापसी, कांग्रेस बसपा के बीच तीखी जुगलबंदी, तमिलनाडु में द्रमुक नेतृत्व से पीएमके का अलग होना, प. बंगाल में वाममोर्चा के घटक फारवर्ड बलॉक के साथ माकपा का सीधा संघशZ, जम्मू कश्मीर सरकार से पीडीपी का समर्थन वापसी एवं गुलाम नबी आजाद सरकार का पतन, फिर केन्द्र सरकार से वामदलों की समर्थन वापसी, विश्वास मत प्रस्ताव पर दलीय निष्ठा के परित्याग के कारनामे आदि 2008 के कैनवास पर निश्चय ही बदरंगी तस्वीर उभारते हैं। साल 2009 की समग्र तस्वीर इससे भिन्न नहीं हो सकती।नाभिकीय समझौते की राजनीति ने सत्तारुढ़ संप्रग के साथ चार साल से कायम समीकरण को बदल दिया। साल के आरंभ में ही साफ हो गया था कि कांग्रेस के लिए समझौता एवं वामदलों के समर्थन में से एक चुनना होगा। प्रधानमंत्री ने जून में यह कहकर कि नाभिकीय करार राजनीति का िशकार हो गया है लेकिन वे निराश नहीं है साफ कर दिया कि वे आगे बढ़ने का मन बना चुके हैं। सरकार ने वामदलों के विरोध के बावजूद आणविक एजेंसी में जाने का संकेत दिया। कांग्रेस ने कहा कि के वे समझोैते की ओर बढ़ रहे हैं और समय का चयन वे स्वयं करेंगे। 30 जून को प्रधानमंत्री का वक्तव्य आ गया एवं माकपा ने समथर्न वापसी का एलान कर दिया। लेकिन 8 जुलाई को औपचारिक समर्थन वापसी से किसी प्रकार का राजनीतिक धमाका नहीं हुआ क्योंकि तब तक कांग्रेस के लिए वामदलोंं पर निर्भरता की विवशता का अंत हो गया था। सपा का समर्थन कांग्रेस को मिल चुका था। वास्तव में इससे संप्रग सरकार ही नहीं भाजपा इतर भारतीय राजनीति का वर्णक्रम बदल गया। सपा की पहल पर निर्मित संयुक्त राष्ट्रीय प्रगतिशील गठबंधन या यूएनपीए जिसे भविष्य का तीसरा मोर्चा कहा जा रहा था, दफन हो गया। इसके पूर्व माकपा के नेतृत्व में वामदलों ने यूएनपीए के साथ मिलकर गैर कांग्रेस गैर भाजपा राजनीतिक विकल्प के गठन पर काम करना आरंभ कर दिया था। इस प्रकार सशक्त तीसरे विकल्प की संभावना नाभिकीय समझौते पर वामदलों की अड़ियल राजनीति का िशकार हो गया।हालांकि कांग्रेस-सपा नजदीकियों का संकेत संप्रग सरकार के चार साल पूरा होने के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए रात्रि भोज में मिल गया जब स्वयं प्रधानमंत्री ने अमर सिंह को विशेश महत्व दिया। लोकसभा में विश्वास मत के दौरान अंदर एवं बाहर सरकार का मुख्य संकटमोचक सपा ही बनी। यह एक नई राजनीतिक एकता थी जिसका स्वरुप में हमें लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में अवश्य दिखाई देगा। दूसरी ओर यह माकपा के लिए विशेश धक्का था, क्योंकि मार्च के अंत में कोयम्बटूर में अयोजित पार्टी के 19 वें महाधिवेशन में महासचिव प्रकाश करात ने राजनीतिक समीकरण के संभावित दलों में केवल सपा का ही उल्लेख किया था। माकपा के साथ भाकपा ने भी हैदराबाद में आयोजित 20 वीं राष्ट्रीय कांग्रेस में गैर भाजपा गैर कांग्रेस राजनीतिक समीकरण का प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद यूएनपीए एवं वाम एकता संसद के भीतर भी दिखा था। इसके बाद माकपा के सामने तीसरे विकल्प के लिए नए सिरे से कोिशश की विवशता आ गई। करात केवल अन्नाद्रमुक की जयललिता को ही आगामी गठबंधन के लिए तैयार कर पाए हैं। यह कहना मुिश्कल है कि वाकई यह एकता लोकसभा चुनाव एवं उसके बाद कायम रहेगा। यह साल किसी एक दल के प्रभाव के सबसे ज्यादा क्षरण वाला साबित हुआ तो वह माकपा है। नंदीग्राम एवं सिंगूर ने माकपा की पिछले 12 सालों से तीसरी धारा के बीच कायम उसकी धाक को तोड़ दिया है। वाममोर्चा के उसके साथी दलों तक ने उसकी खिलाफत की। स्थानीय निकाय के चुनावों में उसे कई जगह तृणमूल के हाथों पराजय मिली। समर्थन वापसी के कारण संप्रग के तीसरे मोर्चे के दल भी उससे नाराज होकर उसके विरुद्ध बयानवाजी की। इसका असर 2009 में अवश्य दिखाई पड़ेगा। फारवर्ड ब्लॉक एवं आरएसपी माकपा के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं। त्रिपुरा में एक भी स्थान न जीतने के कारण फारवर्ड ब्लॉक का स्वर धीमा हुआ है, लेकिन अकेले चुनाव लड़ने का कदम ही वाम एकता के कमजोर होने का प्रमाण था।कांग्रेस एवं भाजपा के लिए 2008 अगले साल की पूर्वपीठिका तैयार कर गया है। सोनिया गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष के रुप में दस साल पूरा करने को जिस प्रकार ऐतिहासिक बताया गया उससे साफ हो गया कि वे जब तक चाहेंगी इस पद पर बनी रहेंगी। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के योग्य बताने के वरिष्ठ नेता अजुZन सिंह के अभियान का करारा प्रत्युत्तर पार्टी की ओर से दिया जाना इस बात का संकेत था कि निकट भविष्य में मनमोहन सिंह के नेतृत्व को चुनौती नहीं है। लोकसभा चुनाव पार्टी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ेगी। राहुल गांधी ने दलितों, आदिवासियों, किसानों, छोटे िशल्पकारों आदि के बीच जाने का जो सिलसिला शुरु किया वह अगले 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सक्रिय रहने तक पार्टी की रीति-नीति का अंतिम सूत्र उनके हाथों ही होगा। आडवाणी ने मेरा जीवन मेरा देश आत्मकथा के माध्यम से अपनी सोच से देश को अवगत कराने की कोिशश की। भाजपा के लिए कर्नाटक विजय से दक्षिण में अपनी बदौलत सरकार बनाने की ऐतिहासिक घटना हुई। इससे केवल उत्तर तक सीमित पार्टी की छवि टूटी। लेकिन दूसरे राज्यों में इसका कितना प्रभाव होगा यह कतई साफ नहीं है। समग्र राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो संप्रग की एकता बहुत हद तक कायम है एवं वह राजग से ज्यादा विस्तृत है। किंतु बसपा की नीति, माकपा द्वारा कांग्रेस नीत चुनावी गठबंधन में शामिल नहीं होने के एलान, आंध्र में चिरंजीवी के रुप में तेलुगू देशम के समानांतर एक नई शक्ति का उदय, प. बंगाल में तृणमूल का अनिश्चय भरा तेवर आदि से भावी राजनीति की धुंधली तस्वीर ही बनती है।
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