गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

गोलमा का लोकतंत्र
राजस्थान में राज्य मंत्री बनने वाली गोलमा देवी निरक्षर हैं। इस कारण शपथ सामरोह के दौरान न वे लिखा हुआ शपथ पढ़ सकीं और न हस्ताक्षर ही कर सकीं। इसमें दोष किसका है? गोलमा का? हमारी राजनीति का जिसमें चुनाव जीतने के लिए कोई आदशZ मापदंड नहीं है? या फिर हमारे देखने के नजरिए में दोष है? वस्तुत: पढ़े-लिखे एवं संभ्रांत वर्ग के लिए यह भारतीय लोकतंत्र का उपहास है जहां कोई अनपढ़, गंवार भी जाति, वर्ण, संप्रदाय आदि का लाभ उठाकर चुनाव जीत सकता है। यह सही है कि अगर गोलमा देवी किरोड़ीमल मीणा की पत्नी नहीं होतीं तो न वे चुनाव लड़तीं और न मंत्री बनतीं। किरोड़ीमल को भाजपा का विरोधी बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह दांव खेला है। किंतु क्या शैक्षणिक डिग्री एवं संभ्रांत शैली ही किसी के जनप्रतिनिधि होने की कसौटी हो सकती है? देश आज जिन दुरवस्थाओं का िशकार है उसमें पढ़े-लिखे लोगोें की ही तो भूमिका है। किसी के िशक्षित होने का मापदंड केवल अक्षर ज्ञान कैसे हो सकता है? अगर किसी किसान को खेती के बारे में पूरी जानकारी रखता है तो अक्षर ज्ञान का उसके लिए क्या उपयोग हो सकता है? यह तो हमारी व्यवस्था का दोश है कि हमने अक्षर ज्ञान को िशक्षा का ही मापदंड नहीं बना दिया, पूरे तंत्र को अक्षर ज्ञान वालों के हाथों सिमटने की स्थति बना दी। इसमें सामान्य किसानों से लेकर छोटे िशल्पकारों के नीति-नियमों और उनके सहयोग की योजनाएं तक उन्हें श्रवण शैली में पहुंचाने की व्यवस्था नहीं है। इसलिए दोष उनका नहीं जो निरक्षर हैं, उनका है जिन्होेेंने निरक्षर को विजातीय बना देने की व्यवस्था खड़ी की और उसे सशक्त कर रहे हैं। गांधी जी कहते थे कि िशक्षा का मापदंड अक्षर ज्ञान नहीं हो सकता। उनके अनुसार अक्षर ज्ञान की भूमिका शरीर पर आभूषण सदृश ही होनी चाहिए। यानी वह ज्ञान का श्रृंगार या अलंकार ही हो सकता है। हमने इसके विपरीत मापदंड बना लिया जहां गोलमा जैसी महिला के शपथ ग्रहण के दौरान शमीZंदगी उठानी पड़ती है। आखिर शपथ की एक ही भाषा वह भी लिखी हुई क्यों होनी चाहिए? शपथ तो कर्तव्यों के प्रति वचनबद्धता की याद दिलाने के लिए है। अगर गोलमा को यह सिखा दिया जाता कि आप अपको ईश्वर का नाम लेकर यह शपथ लेना है कि आप अपनी जिम्मेदारी का पालन ईमानदारी पूर्वक करेंगी तो वे अपनी स्थानीय बोली में आसानी से ऐसा कर देेतीं। लेकिन नौकरशाही तंत्र पर निर्भर हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में स्वाभाविक लचीलापन का लोप हो चुका है जिसकी परिणति गोलमा शपथ प्रकरण है। अगर अक्षर ज्ञान ही िशक्षा की कसौटी है और सरकार ने निरक्षरता उन्मूलन का लक्ष्य तय किया हुआ है तो फिर गोलमा जैसी एक महिला जो कि प्रदेश के एक कद्दावर नेता की पत्नी है, साक्षर क्यों नहीं हो सकी? इसका दोष तो सरकारी तंत्र के सिर ही जाएगा।

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