अचरज नहीं
लन्दन से प्रकाशित द टाइम्स की इस रिपोर्ट पर अचरज का कोई कारण नहीं है कि लश्कर-ए-तैयबा आईएसआई द्वारा पैदा किया गया संगठन है। 1980 के दशक मेंंअफगानिस्तान से सोवियत संघ को बाहर करने के लिए अमेरिका तथाकथित मुजाहिद्दीनों की मदद करता था और इसका सूत्र पाकिस्तान था। पाकिस्तान ने इसे जम्मू कश्मीर को भारत से अलग करने के अवसर के रुप देखा और 1989-90 से आईएसआई ने ऐसे संगठनों को सभी प्रकार की मदद करनी आरंभ कर दी। इस रिपोर्ट में 1987-89 के बीच आईएसआई के प्रमुख रहे जनरल हामिद गुल और 1990-92 के बीच प्रमुख रहे जनरल असद दुर्रानी से बातचीत के जो अंष हैं वे भी इस बात की पुश्त करते हैें। मसलन, दुर्रानी ने कहा है कि पाकिस्तान से यह उम्मीद करना कि वह जम्मू कश्मीर से अपने को अलग कर लेगा गलत है। सवाल है कि जम्मू कश्मीर में आपकी गहरी अभिरुचि क्यों होनी चाहिए? उनकी इस बात से सहमत होना कठिन है कि आईएसआई ने जो किया किसी देष की खुफिया एजेंसी वही करती। हिंसा और आतंकवाद पैदा करने और उसे बढ़ावा देने की भूमिका निभाने वाली खुफिया एजेन्सी स्वयं उसी श्रेणी में खड़ी हो जाती है। यह स्वीकार किया जा सकता है कि लश्कर एक ऐसा जिन्न हो गया है जिसे भले आईएसआई ने पाला-पोसा लेकिन उसे अब बोतल में बंद करना उसके लिए कठिन हो गया है। यदि दुर्रानी की बात मानी जाए तो उनके कार्यकाल में लश्कर को समर्थन नहीं था, किंतु वे यह भी कहते हैं कि जम्मू कश्मीर में सक्रिय ऐसे समूहों के समर्थन में पाकिस्तान का हित निहित था। पाकिस्तान की यही गलत सोच तो समस्या की जड़ है। हालांकि इस रिपोर्ट से निश्चयात्मक तौर पर यह स्थापित नहीं होता कि लश्कर की पीठ पर अब भी आईएसआई का हाथ है या नहीं। भारतीय संसद पर हमले के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ के कार्यकाल में लश्कर से नाता तोड़ने की बात कही जाती है। मई 2002 में उन्होंने राष्ट्र के नाम संबोधन में लश्कर सहित अन्य संगठनों को प्रतिबंधित करने का एलान भी किया था। लश्कर सहित ऐसे कई संगठनों का आईएसआई एवं फौज के साथ इतना घनिष्ठ संबंध हो गया था जिसे पूरी तरह तोड़ना आसान नहीं। जाहिर है, आईएसआई ने पूरी तरह इनसे नाता तोड़ा हो या नहीं, जिन अधिकारियों के साथ लश्कर के नेताओं के रिष्ते बन गए थे वे पदों पर रहते अपने प्रभाव का उपयोग कर इन्हें सहायता दिलवाते रहे। सेवानिवृत्ति के बाद भी ऐसे अधिकारियों ने अपने तरीके से इनकी मदद की है। shasan की भूमिका के बिना निजी स्तर पर बहुत ज्यादा मदद करना संभव नहीं हो सकता। बहरहाल, इस रिपोर्ट से लश्कर एवं आईएसआई के rishton की ओर दुनिया का ध्यान पुन: आया है। लश्कर के कार्यालयों एवं सम्मेलनों में आईएसआई एवं सेना के लोग जाते रहे हैं। गुल ने मुरिदके स्थित उसके मुख्यालय जाने की बात स्वीकार की है।
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